Chanakya niti chapter one 1 / चाणक्य नीति प्रथम अध्याय

Chanakya niti chapter one
चाणक्य नीति प्रथम अध्याय

Chanakya niti chapter one, चाणक्य नीति प्रथम अध्याय :- चाणक्य ने कहा है कि जो उनके ग्रन्थ अथवा राजनीति के सम्बद्ध उनकी बातों को जान लेगा, वह राजनीति शास्त्र प्रकांड पण्डित हो जाएगा। आचार्य चाणक्य ने जितने विश्वास से यह बात कही है, उससे सिद्ध होता है कि वे कितने आत्मविश्वासी थे और जो कुछ उन्होंने अपने नीतिशास्त्र में लिखा है, वह सब ओर से सामान्यजन के लिए उपयोगी है। वे कामना करते थे कि भारतवर्ष का प्रत्येक व्यक्ति इस ग्रन्थ का अध्ययन कर सर्वज्ञ बने। 

प्रणम्य शिरसा विष्णुं त्रैलोक्याधिपतिं प्रभुम् ।
नानाशास्त्रोद्धृतं वक्ष्ये राजनीति समुच्चयम् ।। 1 ।।

अर्थात् :- तीनों लोकों के स्वामी, श्री विष्णु के चरणों में शीश झुकाकर प्रणाम करके वेद आदि अनेक शास्त्रों में वर्णित राजनीति के सिद्धांतों का वर्णन करता हूँ।

व्याख्या :- भारतीय ग्रन्थकार प्राचीनकाल से ही अपने उद्देश्य को निर्विघ्न पूर्ण करने के लिए सदा ही अपने इष्ट को नमन कर उसकी स्तुति करते थे, चाणक्य भी अपने ग्रन्थ राजनीति समुच्चय का वर्णन करने से पूर्व इसी परम्परा का निर्वाह करते हैं। पाठकगण ध्यान दें कि आचार्य चाणक्य ने अपने इस ग्रन्थ की रचना ‘राजनीति समुच्चय’ के नाम से की थी। कालांतर में यह नाम गौण हो गया और चाणक्य का प्रभाव इतना बढ़ा कि इस ग्रन्थ को ‘चाणक्य नीति’ के नाम से ख्याति मिली।

आचार्य चाणक्य का यह ग्रन्थ कल्पना मात्र नहीं है, वरन् ग्रन्थाकार ने अपने अनुभवों का सार निकालकर इस नीति ग्रन्थ की रचना की है।

अधीत्येदं यथाशास्त्रं नरो जानाति सत्तमः ।
धर्मोपदेशविख्यातं कार्याऽकार्यं शुभाऽशुभम् ।। 2 ।।

अर्थात् :- इस नीतिशास्त्र का अध्ययन कर व्यक्ति यह जान लेता है कि कौन-सा कार्य उसके करने योग्य है और कौन-सा न करने योग्य। उसे उचित-अनुचित परिणामों का ज्ञान हो जाता है, वह व्यवहार-कुशल हो जाता है। करने अथवा न करने योग्य कार्य का धर्मोपदेश कहा गया है।

व्याख्या :- बहुत से लोग बिना सोचे-समझे, परिणामों की परवाह किये बिना कुछ ऐसे कार्य कर बैठते हैं जो उनके लिए दुःखदायी सिद्ध होते हैं, अतः शास्त्रों में करने योग्य कार्यों का स्पष्ट निर्देश किया गया है किन्तु आम जन की शास्त्रों तक पहुँच नहीं होती, इसी तथ्य को दृष्टिगत रखकर आचार्य चाणक्य ने अपने इस नीतिशास्त्र में करने और न करने योग्य कार्यों का स्पष्ट निर्देश किया है। राजा एवं प्रजा जब-जब भी धर्म विरुद्ध कार्य करती है, तब-तब उसे कष्ट उठाना पड़ता है।

तदहं संप्रवक्ष्यामि लोकानां हितकाम्यया ।
येन विज्ञानमात्रेण सर्वज्ञत्वं प्रपद्यते ।। 3 ।।

अर्थात् :- मैं जन समुदाय के हित के लिए राजनीति के उन गूढ़ रहस्यों का वर्णन करता हूँ, जिन्हें जान लेने से ही व्यक्ति अपने आपको सर्वज्ञ समझ सकता है।

व्याख्या :- चाणक्य ने यह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण बात कही है कि मनुष्य को यदि राजनीति के सूक्ष्म रहस्यों का ज्ञान हो जाए, तो वह अपने सर्ववेत्ता होने का मार्ग प्रशस्त कर सकता है। अनेक धर्म और मत इस बात को एकमत होकर स्वीकार करते हैं कि कोई व्यक्ति सम्पूर्ण बातें नहीं जान सकता अर्थात् उसे सभी बातों का ज्ञान नहीं हो सकता, पर उसे अधिकांश विषयों की अच्छी जानकारी तो हो ही सकती है।

चाणक्य ने कहा है कि जो उनके ग्रन्थ अथवा राजनीति के सम्बद्ध उनकी बातों को जान लेगा, वह राजनीति शास्त्र प्रकांड पण्डित हो जाएगा। आचार्य चाणक्य ने जितने विश्वास से यह बात कही है, उससे सिद्ध होता है कि वे कितने आत्मविश्वासी थे और जो कुछ उन्होंने अपने नीतिशास्त्र में लिखा है, वह सब ओर से सामान्यजन के लिए उपयोगी है। वे कामना करते थे कि भारतवर्ष का प्रत्येक व्यक्ति इस ग्रन्थ का अध्ययन कर सर्वज्ञ बने।

मूर्खशिष्योपदेशेन दुष्टस्त्रीभरणेन च ।
दुःखितैः सम्प्रयोगेण पण्डितोऽप्यवसीदति ।। 4 ।।

अर्थात् :- मूर्ख शिष्य को उपदेश देने से, दुष्ट स्त्री का भरण-पोषण करने से और दुःखी जनों की संगत करने से बुद्धिमान व्यक्ति भी कष्ट उठाता है।

व्याख्या :- आचार्य चाणक्य कहते हैं कि मूर्ख शिष्य को भली बात के लिए प्रेरित नहीं करना चाहिए। इसी प्रकार दुष्ट आचरण करने वाली स्त्री का भरण-पोषण करना अनुचित है और दुःखी व्यक्तियों के पास उठने-बैठने से, उनसे व्यवहार करने से पण्डितों अर्थात् बुद्धिमान पुरुषों को भी कष्ट उठाना पड़ता है।

इस बात को अत्यधिक गम्भीरता पूर्वक समझें – सोए हुए व्यक्ति को जगाया जा सकता है, जागे हुए को नहीं। इसी प्रकार किसी अज्ञानी को आप ज्ञान का बोध करा सकते हैं, किन्तु जो मूर्ख है और स्वयं को ज्ञानी समझता है, उसे आप उसके हित की बात भी कहेंगे तो वह मूर्ख क्रोध अथवा अहंकार वश आपका ही अहित करेगा। इस बात को पंचतंत्र में जो आचार्य चाणक्य द्वारा ही लिखी गई है इस कथा के माध्यम से बताया गया है –

बरसात के मौसम में कहीं से एक बंदर एक वृक्ष पर आया। चिड़िया अपने घोंसले में दुबकी बैठी थी। बंदर को ठंड से काँपते देखकर उसे तरस आ गया। चिड़िया ने उसे सीख दी कि तुम्हें ईश्वर ने हाथ दिए हैं, अपना कोई घर क्यों नहीं बनाते। इस पर मूर्ख बंदर को लगा कि चिड़िया उसका उपहास कर रही है। अतः क्रोधित होकर उसने चिड़िया का घोंसला नष्ट कर डाला। इसलिए चाणक्य कहते हैं कि मूर्ख को उपदेश मत दो।

कहा जाता है कि जिस व्यक्ति को किसी भी बात का ज्ञान नहीं है, उसे प्रत्येक बात सरलता से समझाई जा सकती है, जो व्यक्ति बहुत कुछ जनता हो, चतुर हो, उसे कोई भी बात सरलतापूर्वक समझाई जा सकती है, किन्तु मूर्ख व्यक्ति को कोई भी बात समझाना अत्यन्त कठिन है।

आचार्य चाणक्य का कहना है कि दुष्ट स्त्री का संग करना अथवा उसका पालन-पोषण करना भी दुख का कारण बन सकता है। आचार्य चाणक्य की यह बात बड़ी ही गूढ़ है। जिसकी पत्नी दुष्ट है, उसका जीवन नर्क है। महान दार्शनिक सुकरात की पत्नी बड़ी दुष्ट थी, सुकरात जीवन भर उसके अत्याचारों से त्रस्त रहे। ऊपरी तौर पर वे शान्त दिखते थे, किन्तु उसके मन की सही स्थिति कौन जान सकता था।

इसी बात को दूसरे संदर्भ में भी लिया जा सकता है। यहाँ कदाचित आचार्य का संकेत उन स्त्रियों के लिए भी हो सकता है जो अपने पति के साथ विश्वासघात करती हैं। ऐसी स्त्री संबंध रखने वाला व्यक्ति भले ही बुद्धिमान या ज्ञानी  क्यों न हो, अंत में कष्ट उठाएगा क्योंकि ऐसे संबंध सदा ही अपकीर्ति को जन्म देते हैं।

इसी प्रकार दुःखी व्यक्ति की संगत का प्रभाव भी बुद्धिमान जन पर पड़ेगा। उनकी निराशा, हताशा दूसरे व्यक्ति को भी निराशा-हताश कर सकती है।

दुष्टा भार्या शठं मित्रं भृत्यश्चोत्तरदायकः ।
ससर्पे च गृहे वासो मृत्युरेव न संशयः ।। 5 ।।

अर्थात् :- जिसकी स्त्री दुष्ट हो, मित्र नीच स्वभाव के हों, सेवक जवाब देने वाले हों और जिस घर में सर्प रहता हो, ऐसे घर में रहने वाला व्यक्ति निश्चय ही मृत्यु के निकट रहता है अर्थात् ऐसे व्यक्ति की मृत्यु किसी भी समय हो सकती है।

व्याख्यता :- आचार्य चाणक्य कहते हैं कि दुष्टा अर्थात् कटु बोलने वाली दुराचारिणी स्त्री, धूर्त मित्र से अर्थ धूर्त स्वभाव वाला मित्र और सामने बोलने वाला या जवाब देने वाला नौकर ये सहने योग्य नहीं होते हैं। इन्हें स्वयं से दूर कर देना चाहिए। ये किसी भी समय मृत्यु-तुल्य हानि पहुँचा सकते हैं। इनकी तुलना घर में रहने वाले सर्प से की गई है, जो कभी भी डस सकता है।

किसी भी व्यक्ति के लिए उसकी पत्नी का दुष्ट होना उसके लिए नरक के समान है। यदि पत्नी अपने पति के प्रति श्रद्धापूर्वक समर्पण भावना नहीं रखती, तो व्यक्ति तनाव में रहता है। तनावग्रस्त होकर वह आत्महत्या तक के लिए प्रेरित हो जाता है। इसी भाँति मित्र की नीचता,, नौकर का मुँहफट होना, यह बातें मृत्यु के समान दुखदायी हैं। व्यक्ति को इस प्रकार के लोगों से यथासंभव निजात पा लेनी चाहिए।

देखने में आता है कि कुछ स्त्रियाँ इस कदर मुँहफट होती हैं कि पति को उनके संबंधियों और मित्रों के सामने भी झिड़क देती हैं और अपमानित करती हैं, इससे व्यक्ति आहत होता है। कुछ मित्र ऊपर से मीठे बने रहते हैं और पीठ में छुरा घोंपते हैं, नौकर का सामने जवाब देना भी ठीक नहीं अतः इनसे यथाशीघ्र किनारा कर लेना चाहिए।

आपदर्थे धनं रक्षेद् दारान् रक्षेद्धनैरपि ।
आत्मानं सततं रक्षेद् दारैरपि धनैरपि ।। 6 ।।

अर्थात् :- मनुष्य को आकस्मिक विपत्ति के लिए धन संचित करना चाहिए, किन्तु धन के बदले यदि स्त्रियों की रक्षा करनी पड़े, तो धन का व्यय अथवा त्याग कर देना चाहिए। व्यक्ति को अपनी रक्षा के लिए इन दोनों चीजों का भी त्याग करना पड़े, तो इनका त्याग करने से नहीं चूकना चाहिए।

व्याख्या :- आचार्य चाणक्य का मत है कि संकट-आपदा के लिए धन का संग्रह करें, धन से भी पूर्व पत्नी की रक्षा करनी चाहिए। पत्नी की रक्षा के लिए धन का व्यय करना पड़े तो इसमें संकोच नहीं करना चाहिए। कुछ लोग धन को स्त्री (पत्नी) से अधिक महत्त्व देते हैं यह उचित नहीं है किन्तु उनका यह भी मत है कि यदि अपने प्राण संकट में पड़ जाएँ और धन और स्त्री का त्याग करके भी यदि उनकी रक्षा करनी पड़े तो इन दोनों का ही त्याग करने में संकोच नहीं करना चाहिए।

सोचने वाली बात यह है कि यदि स्वयं का विनाश होता दिखाई दे रहा हो तो धन और स्त्री का प्रयोजन ही क्या रह जाएगा। संकट पड़ने पर व्यक्ति धन देकर इस संकट को टाल सकता है। पर उनका यह भी कहना है कि परिवार स्त्रियों का महत्त्व धन से कई गुना अधिक होता है। उनकी मान-मर्यादा की रक्षा होती है। व्यक्ति का अपना महत्त्व सबसे अधिक है। जीवन-मरण की बात आ पड़े, तो सब कुछ त्यागकर अपनी रक्षा करनी चाहिए।

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