Chanakya niti chapter three-3 / चाणक्य नीति तीसरा अध्याय

Chanakya niti chapter three
चाणक्य नीति तीसरा अध्याय

Chanakya niti chapter three-3 , चाणक्य नीति तीसरा अध्याय :- आचार्य चाणक्य ने यह बड़ी ही सुन्दर बात कही है। सागर को बड़ा ही धीर-गंभीर माना जाता है, उसकी उपमाएँ दी जाती हैं, किन्तु चाणक्य कहते हैं कि धीर-गम्भीर पुरुष सागर से भी श्रेष्ठ है। सागर ज्वार-भाटा आने पर, प्रलय आने पर अपनी मर्यादा तोड़ देता है। तटों को लांघकर भारी तबाही मचा देता है, किन्तु धीर-गम्भीर पुरुष संकटों के पहाड़ टूटने पर भी अपनी धीरता एवं गम्भीरता का त्याग नहीं करते।

कस्य दोषः कुले नास्ति व्याधिनः को न पीडितः ।
व्यसनं केन न प्राप्तं कस्य सौख्यं निरन्तरम् ।। 1 ।।

अर्थात् :- किसके कुल में दोष नहीं है ? रोग के द्वारा कौन पीड़ित नहीं हुआ ? कष्ट किसको नहीं मिला ? सदैव सुखी कौन रहता है ?

व्याख्या :- आचार्य चाणक्य कहते हैं कि संसार में ऐसा कोई नहीं है जिसके कुल में कोई दोष नहीं हो। पूर्व में प्रत्येक कुल किसी न किसी दोष अवगुण के कारण अवश्य ही अपयश को प्राप्त हुआ है। यह अलग बात है कि आज वह दोष विस्मृत हो गया हो। यह बात चाणक्य ने विशेषतया उन लोगों के लिए कही है जो अपने कुल पर अभिमान करते हैं।

जो लोग रोग से पीड़ित होकर ईश्वर को दोष देते हैं, उनके लिए चाणक्य कहते हैं कि संसार में ऐसा कोई नहीं जो कभी न कभी किसी न किसी रोग से पीड़ित न हुआ हो। रोग यह न सोचे कि उस पर अन्याय हो रहा है। कफ, वायु और प्रित्त से भरा हुआ यह शरीर अवश्य ही रोगमुक्त होगा। अतः प्रत्येक व्यक्ति कभी न कभी अवश्य ही रोग से पीड़ित होता है।

कुछ लोगों को भाग्य की शिकायत रहती है कि उनके भाग्य में दुःख ही दुःख लिखे हैं। चाणक्य कहते हैं कि संकट किस पर नहीं आया। प्रत्येक प्राणी को संकट झेलने पड़ते हैं।

सुख निरन्तर किसी के भाग्य में नहीं रहता। सुख-दुःख दिन-रात की भाँति आते-जाते रहते हैं। यही प्रकृति का नियम है। अतः व्यक्ति को चाहिए कि न तो दुःख में अधीर हो और न ही सुख में अभिमान करे।

आचारः कुलमाख्याति देशमाख्याति भाषणम् ।
सम्भ्रमः स्नेहमाख्याति वपुराख्याति भोजनम् ।। 2 ।।

अर्थात् :- मनुष्य का आचार उसके कुल-शील को प्रदर्शित करता है, बोल-चाल आदि व्यक्ति के देश अथवा प्रांत को बतलाती है, मन के भाव प्रेम को प्रकट करते हैं और शरीर का गठन उसके द्वारा सेवन किए जाने वाले अन्न का परिचय देते हैं।

व्याख्या :- किसी व्यक्ति का आचार-व्यवहार देखकर समझदार लोग सहज ही अनुमान लगा लेते हैं कि वह व्यक्ति किस कुल से सम्बन्ध रखता है अथवा कुलीन है या अकुलीन। ऊँचे कुल का है या नीचे कुल का। यहाँ यह समझने वाली बात है कि जुबानी जमा-खर्च करके व्यक्ति भले ही अपने आपको कितने ही उच्चकुल का बताए लेकिन ज्ञानी जनों के समक्ष उसका आचार-व्यवहार (बोलचाल, उठना, बैठना, खान-पान और विचारादि) उसकी पोल खोल देते हैं।

कुलीन व्यक्ति का आचार-व्यवहार वैसा ही होगा और अकुलीन व्यक्ति का उसके अनुसार। आचार्य चाणक्य कहते हैं कि व्यक्ति की भाषा से उसके प्रान्त विशेष का पता चलता है। भाषा से ही हम समझ जाते हैं कि वह व्यक्ति गुजराती है या बंगाली, बिहारी है या मद्रासी।

व्यक्ति के हाव-भाव उसके मन की भावनाओं को प्रकट कर देते हैं। किस व्यक्ति में कितनी दया है, कितना प्रेम है अथवा कितनी क्रूरता है, इन सब बातों का पता उसके हाव-भाव एवं कार्यों से चल जाता है, ज्ञानी पुरुष इसके द्वारा ही व्यक्ति की परख करते हैं।

आगे चाणक्य कहते हैं कि शरीर से व्यक्ति के खान-पान का पता चलता है। खाते-पीते घर के व्यक्ति का शरीर-सौष्ठव अलग ही होता है और भुकमरी के शिकार व्यक्ति का अलग। इससे व्यक्ति की आर्थिक स्थिति का बोध होता है।

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सुकुले योजयेत्कन्यां पुत्रं विद्यासु योजयेत् ।
व्यसने योजयेच्छत्रुं मित्रं धर्मे नियोजयेत् ।। 3 ।।

अर्थात् :- कन्या (पुत्री) को उत्तम कुल में देना चाहिए तथा पुत्र को विद्या में लगाना चाहिए। शत्रु को बुरी आदतों में फंसाना चाहिए और मित्र को धर्म में नियुक्त करना चाहिए।

व्याख्या :- आचार्य चाणक्य कहते हैं कि अपने कुल की कन्या का विवाह अच्छे परिवार, ऊँचे कुल में करे। यहाँ ऊँचे कुल से मतलब धनवान परिवार से नहीं है। चाणक्य संस्कारों से युक्त कुल को ही उच्चकुल मानते हैं।

संतान (पुत्र) के सम्बन्ध में आचार्य का स्पष्ट निर्देश है – कि उसे अच्छी शिक्षा दे। खूब पढ़ाए-लिखाए, उसे योग्य बनाए।

तीसरी बात चाणक्य ने बड़ी ही गूढ़नीति की कही है। वे कहते हैं कि व्यक्ति अपने शत्रु को व्यसनों में फंसा दे। यहाँ यह बात विशेष ध्यान देने वाली है। चाणक्य शत्रु से प्रत्यक्ष लड़ाई के पक्षधर नहीं हैं। वे कहते हैं कि शत्रु को किसी व्यसन में फंसा दो। व्यसन में फंसा व्यक्ति स्वयं ही खत्म हो जाता है। उसके व्यसन ही उसे ले डूबते हैं।

जहाँ शत्रु के लिए चाणक्य ने व्यसन में फंसाने की बात कही है, वहीं मित्र के लिए उनका आदेश है कि मित्र को धर्म के कार्यों में लगाना चाहिए, यहाँ धर्म के कार्यों से तात्पर्य अच्छे कर्मों से है।

दुर्जनस्य च सर्पस्य वरं सर्पो न दुर्जनः ।
सर्पो दंशति कालेन दुर्जनस्तु पदे पदे ।। 4 ।।

अर्थात् :- दुष्ट व्यक्ति की और सर्प की समानता की जाए तो चाणक्य कहते हैं कि इन दोनों में सर्प श्रेष्ठ है क्योंकि सर्प तो समय आने पर ही काटता है किन्तु दुष्ट व्यक्ति पग-पग पर काटता है, हानि पहुंचता है, बुराई करता है।

व्याख्या :- इस श्लोक में आचार्य चाणक्य ने बड़ी ही मौके की बात कही है। वे दुर्जन अर्थात् दुष्ट व्यक्ति को विषैले सर्प से भी अधिक विषैला मानते हैं। उनका कहना है कि यदि इन दोनों में से किसी एक के संग रहने का विचार करना पड़े तो व्यक्ति को चाहिए कि दुष्ट का परित्याग करे और सर्प को अपना ले।

उनके कथानुसार सर्प तो कभी क्रोधित होने अथवा अहित होने पर ही काटेगा किन्तु दुष्ट व्यक्ति सदा ही डसता रहेगा। उसके दंश को आचार्य सर्पदंश से भी अधिक घातक मानते हुए जन सामान्य को सचेत कर रहे हैं कि दुष्ट के साथ रहने से अच्छा है कि मृत्यु का वरण कर लिया जाए। अतः व्यक्ति को दुष्ट की संगत से सदा बचना चाहिए।

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एतदर्थ कुलीनानां नृपाः कुर्वन्ति संग्रहम् ।
आदिमध्याऽवसानेषु न त्यजन्ति च ते नृपम् ।। 5 ।।

अर्थात् :- राजा लोग कुलीन पुरुषों को अपने यहाँ (सेवकों आदि के रूप में) इसलिए रखते थे कि संस्कार युक्त होने के कारण वे राजा का कभी साथ नहीं छोड़ते। न प्रारम्भ में, न मध्य में और न अंत में।

व्याख्या :- राजा लोग, राजपुरुष आदि अपने निकटस्थ पदों पर सदा कुलीन व्यक्तियों की नियुक्ति करने के पक्षधर होते हैं, इसका कारण यही होता है कि वे जानते हैं कि अपने अच्छे संस्कारों, अच्छी शिक्षा-दीक्षा के कारण वे उनकी उन्नति में सहायक होंगे, सामान्य अवस्था में भी वे अच्छे सहयोगी सिद्ध होंगे और कठिन समय संकट आदि आने पर भी उसका साथ देंगे।

कुलीन व्यक्ति सदा स्वामिभक्त होते हैं जबकि अकुलीन व्यक्ति बड़े लोगों से केवल स्वार्थवश जुड़ते हैं और ज्यों ही स्वामी पर विपरीत समय (संकटकाल) आता है, वे किनारा कर जाते हैं। कुलीन घराने के लोग उन्नति के समय स्वामी के साथ चिपके रहते हैं। अतः व्यक्ति को चाहिए कि अपने जीवन में मित्र बनाने हों या सेवक रखने हों तो उनमें कुलीन घराने के पुरुषों को ही प्राथमिकता दें। नीच अथवा ओछे लोगों को न अपना मित्र बनाएँ न उन्हें अपने संस्थान में महत्वपूर्ण पदों पर आसीन करें।

सारांश यही है कि कुलीनों के साथ सम्पर्क रखने से मनुष्य की उन्नति होती है।

प्रलये भिन्नमर्यादा भवन्ति किल सागराः ।
सागरा भेदमिच्छन्ति प्रलयेऽपि न साधवः ।। 6 ।।

अर्थात् :- प्रलय आने पर समुद्र भी अपनी मर्यादा को त्याग देता है। वह भेद अलगाव की भी इच्छा रखता है अर्थात् तटों को लांघ जाता है, किन्तु भद्र लोग प्रलय आने पर भी अपनी मर्यादा का त्याग नहीं करते।

व्याख्या :- आचार्य चाणक्य ने यह बड़ी ही सुन्दर बात कही है। सागर को बड़ा ही धीर-गंभीर माना जाता है, उसकी उपमाएँ दी जाती हैं, किन्तु चाणक्य कहते हैं कि धीर-गम्भीर पुरुष सागर से भी श्रेष्ठ है। सागर ज्वार-भाटा आने पर, प्रलय आने पर अपनी मर्यादा तोड़ देता है। तटों को लांघकर भारी तबाही मचा देता है, किन्तु धीर-गम्भीर पुरुष संकटों के पहाड़ टूटने पर भी अपनी धीरता एवं गम्भीरता का त्याग नहीं करते।

अतः संत पुरुष, साधुजन कभी भी अपनी मर्यादा का उल्लंघन नहीं करते। यहाँ संत-साधु का तात्पर्य गेरुए वस्त्र धारण किए जोगी से नहीं है बल्कि उनसे है जो स्वभाव से साधू है, सुकर्म करने वाले, नेक और दयालु है।

मूर्खस्तु परिहर्तव्यः प्रत्यक्षो द्विपदः पशुः ।
भिनत्ति वाक्शल्येन अदृष्टः कण्टको यथा ।। 7 ।।

अर्थात् :- मूर्ख का सदा त्याग कर देना चाहिए क्योंकि वह दो पैरों वाले पशु जैसा होता है तथा अपने बेंध देने वाले वाक्यों से उसी प्रकार हृदय को कष्ट पहुँचाता रहता है जैसे दिखाई न देने वाला कांटा पांव में चुभकर पीड़ा पहुँचाता रहता है।

व्याख्या :- आचार्य चाणक्य कहते हैं कि मूर्ख का संग कदापि नहीं करना चाहिए। बुद्धिहीन, मूर्ख व्यक्ति दो पैरों वाले पशु से अधिक नहीं होता। जिस प्रकार पशु को अच्छे-बुरे समय-असमय का ज्ञान नहीं होता, उसी प्रकार मूर्ख को भी इन बातों का ज्ञान नहीं होता।

वह अपनी वाणी से सज्जनों को सदा ही पीड़ा पहुँचाता है क्योंकि उसे समझ नहीं होती कि उसे क्या कहना है और क्या नहीं कहना। वह कभी भी कुछ भी बक देता है और उसकी वाणी इस प्रकार आहत करती रहती है जिस प्रकार पांव में चुभा कांटा दिखाई न देने पर भी आहत करता रहता है, पीड़ा पहुँचाता रहता है।

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