Chaturbhuj Roop Ka Darshan / चतुर्भुज रूप का दर्शन

अध्याय ग्यारह विराट रूप

Bhaybhit Huye Arjun Dwara Bhagwan Ki Stuti Aur Chaturbhuj Roop Ka Darshan Karanae Ke Liye Prarthna
भयभीत हुए अर्जुन द्वारा भगवान् की स्तुति और चतुर्भुज रूप का दर्शन कराने के लिए प्रार्थना

भयभीत हुए अर्जुन द्वारा भगवान् की स्तुति और चतुर्भुज रूप का दर्शन कराने के लिए प्रार्थना, Bhaybhit Huye Arjun Dwara Bhagvaan Ki Stuti Aur Chaturbhuj Roop Ka Darshan Karanae Ke Liye Prarthna- अर्जुन ने कहा — हे हृषीकेश ! आपके नाम के श्रवण से संसार हर्षित होता है और सभी लोग आपके प्रति अनुरक्त होते हैं। यद्यपि सिद्धपुरुष आपको नमस्कार करते हैं, किन्तु असुरगण भयभीत हैं और इधर-उधर भाग रहे हैं। यह ठीक ही हुआ है। हे महात्मा ! 

श्लोक 35 से 46

सञ्जय उवाच — 
एतच्छ्रुत्वा वचनं केशवस्य
कृताञ्जलिर्वेपमानः किरीटी ।
नमस्कृत्वा भूय एवाह कृष्णं
सगद्गदं भीतभीतः प्रणम्य ।। 35 ।।

सञ्जयः उवाच — संजय ने कहा; एतत् — इस प्रकार; श्रुत्वा — सुनकर; वचनम् — वाणी; केशवस्य — कृष्ण की; कृत-अञ्जलिः — हाथ जोड़कर; वेपमानः — काँपते हुए; किरीटी — अर्जुन ने; नमस्कृत्वा — नमस्कार करके; भूयः — फिर; एव — भी; आह — बोला; कृष्णम् — कृष्ण से; स-गद्गदम्  — अवरुद्ध स्वर से; भीत-भीतः — डरा-डरा सा; प्रणम्य — प्रणाम करके। 

तात्पर्य — संजय ने धृतराष्ट्र से कहा — हे राजा ! भगवान् के मुख से इन वचनों को सुनकर काँपते हुए अर्जुन ने हाथ जोड़कर उन्हें बारम्बार नमस्कार किया। फिर उसने भयभीत होकर अवरुद्ध स्वर में कृष्ण से इस प्रकार कहा।

अर्जुन उवाच — 
स्थाने हृषीकेश तव प्रकीर्त्या

जगत्प्रहृष्यत्यनुरज्यते च ।
रक्षांसि भीतानि दिशो द्रवन्ति
सर्वे नमस्यन्ति च सिद्धसङ्घाः ।। 36 ।।

अर्जुनः उवाच —  अर्जुन ने कहा; स्थाने — यह ठीक है ; हृषीक-ईश — हे इन्द्रियों के स्वामी; तव — आपके; प्रकीर्त्या — कीर्ति से; जगत् — सारा संसार; प्रहृष्यति — हर्षित हो रहा है; अनुरज्यते — अनुरक्त हो रहा है; च — तथा; रक्षांसि — असुरगण; भीतानि — डर से; दिशः — सारी दिशाओं से; द्रवन्ति — भाग रहे हैं ; सर्वे — सभी; नमस्यन्ति — नमस्कार करते हैं ; च — तथा; सिद्ध-सङ्घाः — सिद्धपुरुष। 

तात्पर्य — अर्जुन ने कहा — हे हृषीकेश ! आपके नाम के श्रवण से संसार हर्षित होता है और सभी लोग आपके प्रति अनुरक्त होते हैं। यद्यपि सिद्धपुरुष आपको नमस्कार करते हैं, किन्तु असुरगण भयभीत हैं और इधर-उधर भाग रहे हैं। यह ठीक ही हुआ है।

 कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन्
गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे ।
अनन्त देवेश जगन्निवास
त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत् ।। 37 ।।

कस्मात् — क्यों ; च — भी; ते — आपको; न — नहीं ; नमेरन् — नमस्कार  करें ; महा-आत्मन् — हे महापुरुष; गरीयसे — श्रेष्ठतर लोग; ब्रह्मणः — ब्रह्मा की अपेक्षा; अपि — यद्यपि; आदि-कर्त्रे — परम स्त्रष्टा को; अनन्त — हे अनन्त; देव-ईश — हे इशों के ईश; जगत्-निवास — हे जगत के आश्रय; त्वम् — आप हैं ; अक्षरम् — अविनाशी; सत्-असत् — कार्य तथा कारण; तत् परम् — दिव्य; यत् — क्योंकि। 

तात्पर्य — हे महात्मा ! आप ब्रह्मा से भी बढ़कर हैं, आप आदि स्त्रष्टा हैं। तो फिर वे आपको सादर नमस्कार क्यों न करें ? हे अनन्त, हे देवेश,  जगन्निवास ! आप परम स्त्रोत, अक्षर, कारणों के कारण तथा इस भौतिक जगत् से परे हैं।

इसे भी पढ़ें :–

  1. अध्याय सात — भगवद्ज्ञान
  2. अध्याय आठ — भगवत्प्राप्ति
  3. अध्याय दस — श्रीभगवान् का ऐश्वर्य

त्वमादिदेवः पुरुषः पुराण-
स्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम् ।
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम
त्वया ततं विश्वमनन्तरूप ।। 38 ।।

त्वम् — आप; आदि-देवः — आदि परमेश्वर; पुरुषः — पुरुष; पुराणः — प्राचीन, सनातन; त्वम् — आप; अस्य — इस; विश्वस्य — विश्व का; परम् — दिव्य; निधानम् — आश्रय; वेत्ता — जानने वाला; असि — हो; वेद्यम् — जानने योग्य, ज्ञेय; च — तथा; परम् — दिव्य; च — और; धाम — वास, आश्रय; त्वया — आपके द्वारा; ततम् — व्याप्त; विश्वम् — विश्व; अनन्त-रूप — हे अनन्त रूप वाले।

तात्पर्य — आप आदि देव, सनातन पुरुष तथा इस दृश्यजगत के परम आश्रय हैं। आप सब कुछ जानने वाले हैं और आप ही वह सब कुछ हैं, जो जानने योग्य है। आप भौतिक गुणों से परे परम आश्रय हैं। हे अनन्त रूप ! यह सम्पूर्ण दृश्यजगत आपसे व्याप्त है।

 वायुर्यमोऽग्निर्वरुणः शशाङ्कः
प्रजापतिस्त्वं प्रपितामहश्च ।
नमो नमस्तेऽस्तु सहस्रकृत्वः
पुनश्च भूयोऽपि नमो नमस्ते ।। 39 ।।

वायुः — वायु; यमः — नियन्ता; अग्निः — अग्नि; वरुणः — जल; शश-अङ्कः — चन्द्रमा; प्रजापतिः — ब्रह्मा; त्वम् —  आप; प्रपितामहः — परबाबा; च — तथा; नमः — मेरा नमस्कार; नमः — पुनः नमस्कार; ते — आपको; अस्तु — हो; सहस्त्र-कृत्वः — हजार बार; पुनः च — तथा फिर; भूयः — फिर; अपि — भी; नमः — नमस्कार; नमः ते — आपको मेरा नमस्कार है।

तात्पर्य — आप वायु हैं तथा परम नियन्ता भी हैं। आप अग्नि हैं, जल हैं तथा चन्द्रमा हैं। आप आदि जीव ब्रह्मा हैं और आप प्रपितामह हैं। अतः आपको हजार बार नमस्कार है और पुनः – पुनः नमस्कार है।

 नमः पुरस्तादथ पृष्ठतस्ते
नमोऽस्तु ते सर्वत एव सर्व।
अनन्तवीर्यामितविक्रमस्त्वं
सर्वं समाप्नोषि ततोऽसि सर्वः ।। 40 ।।

नमः — नमस्कार; पुरस्तात् — सामने से; अथ — भी; पृष्ठतः — पीछे से; ते — आपको; नमः – अस्तु — मैं नमस्कार करता हूँ ; ते — आपको; सर्वतः — सभी दिशाओं से; एव — निस्सन्देह; सर्व — क्योंकि आप सब कुछ हैं ; अनन्त-वीर्य — असीम पौरुष; अमित-विक्रमः — तथा असीम बल; त्वम् — आप; सर्वम् — सब कुछ; समाप्नोषि — आच्छादित करते हो; ततः — अतएव; असि — हो; सर्वः — सब कुछ। 

तात्पर्य — आपको आगे, पीछे तथा चारों ओर से नमस्कार है। हे असीम शक्ति ! आप अनन्त पराक्रम के स्वामी हैं। आप सर्वव्यापी हैं, अतः आप सब कुछ हैं।

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