Chaturbhuj Roop Ke Darshan / चतुर्भुज रूप के दर्शन

बिना अनन्य भक्ति के चतुर्भुज रूप के दर्शन की दुर्लभता और फलसहित अनन्य भक्ति का कथन
Bina Ananya Bhakti Ke Chaturbhuj Roop Ke Darshan Ki Durlabhta Aur Falsahit Ananya Bhakti Ka Kathan

श्लोक 51 से 55

अर्जुन उवाच — 
दृष्ट्वेदं मानुषं रूपं तव सौम्यं जनार्दन ।
इदानीमस्मि संवृत्तः सचेताः प्रकृतिं गतः ।। 51 ।।

अर्जुनः उवाच — अर्जुन ने कहा; दृष्ट्वा — देखकर; इदम् — इस; मानुषम् — मानवी; रूपम् — रूप को; तव — आपके; सौम्यम् — अत्यन्त सुन्दर; जनार्दन — हे शत्रुओं को दण्डित करने वाले; इदानीम् — अब; अस्मि — हूँ ; संवृत्तः — स्थिर; स-चेताः — अपनी चेतना में ; प्रकृतिम् — अपनी प्रकृति को; गतः — पुनः प्राप्त हूँ।

तात्पर्य — जब अर्जुन ने कृष्ण को उनके आदि रूप में देखा तो कहा — हे जनार्दन ! आपके इस अतीव सुन्दर मानवी रूप को देखकर मैं अब स्थिरचित्त हूँ और मैंने अपनी प्राकृत अवस्था प्राप्त कर ली है।

श्रीभगवानुवाच —
सुदुर्दर्शमिदं रूपं दृष्टवानसि यन्मम

देवा अप्यस्य रूपस्य नित्यं दर्शनकाङ्क्षिणा ।। 52 ।।

श्री-भगवान्-उवाच — श्रीभगवान् ने कहा; सु-दुर्दर्शम् — देख पाने में अत्यन्त कठिन; इदम् — इस; रूपम् — रूप को; दृष्टवान् असि — जैसा तुमने देखा; यत् — जो; मम — मेरे; देवाः — देवता; अपि — भी; अस्य — इस; रूपस्य — रूप का; नित्यम् — शाश्वत; दर्शन-काङ्क्षिणा — दर्शनाभिलाषी ।

तात्पर्य — श्रीभगवान् ने कहा — हे अर्जुन ! तुम मेरे जिस रूप को इस समय देख रहे हो, उसे देख पाना अत्यन्त दुष्कर है। यहाँ तक कि देवता भी इस अत्यन्त प्रिय रूप को देखने की ताक में रहते हैं।

नाहं वेदैर्न तपसा न दानेन न चेज्यया ।
शक्य एवंविधो द्रष्टुं दृष्टवानसि मां यथा ।। 53 ।।

न — कभी नहीं ; अहम् — मैं ; वेदैः — वेदाध्ययन से; न — कभी नहीं ; तपसा — कठिन तपस्या द्वारा; न — कभी नहीं ; दानेन — दान से; न — कभी नहीं ; च — भी; इज्यया — पूजा से; शक्यः — सम्भव है ; एवम्–विधः — इस प्रकार से; द्रष्टुम् — देख पाना; दृष्टवान् — देख रहे; असि — तुम हो; माम् — मुझको; यथा — जिस प्रकार ।

तात्पर्य — तुम अपने दिव्य नेत्रों से जिस रूप का दर्शन कर रहे हो, उसे न तो वेदाध्ययन से, न कठिन तपस्या से, न दान से, न पूजा से ही जाना जा सकता है। कोई इन साधनों के द्वारा मुझे मेरे रूप मे नहीं देख सकता ।

इसे भी पढ़ें —

  1. अध्याय दस — श्रीभगवान् का ऐश्वर्य 
  2. अध्याय बारह — भक्तियोग 
  3. अध्याय तेरह — प्रकृति, पुरुष तथा चेतना 

भक्त्या त्वनन्यया शक्य अहमेवंविधोऽर्जुन
ज्ञातुं द्रष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परन्तप ।। 54 ।।

भक्त्या — भक्ति से; तु — लेकिन; अनन्यया — सकामकर्म तथा ज्ञान से रहित; शक्यः — सम्भव; अहम् — मैं ; एवम्-विधः — इस प्रकार; अर्जुन — हे अर्जुन; ज्ञातुम् — जानने; द्रष्टुम् — देखने; च — तथा; तत्त्वेन — वास्तव में ; प्रवेष्टुम् — प्रवेश करने; च — भी; परन्तप —  हे बलिष्ठ भुजाओं वाले।

तात्पर्य — हे अर्जुन ! केवल अनन्य भक्ति द्वारा मुझे उस रूप में समझा जा सकता है, जिस रूप में मैं तुम्हारे समक्ष खड़ा हूँ और इसी प्रकार मेरा साक्षात् दर्शन भी किया जा सकता है। केवल इसी विधि से तुम मेरे ज्ञान के रहस्य को पा सकते हो।

मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः ।
निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव ।। 55 ।।

मत्-कर्म-कृत् — मेरा कर्म करने में रत; मत्-परमः — मुझको परम मानते हुए; मत्-भक्तः — मेरी  भक्ति में रत; सङ्ग-वर्जितः — सकाम कर्म तथा मनोधर्म के कल्मष से मुक्त; निर्वैरः — किसी से शत्रुता रहित; सर्व-भूतेषु — समस्त जीवों में ; यः — जो; सः — वह; माम् — मुझको; एति — प्राप्त करता है; पाण्डव — हे पाण्डु के पुत्र। 

तात्पर्य — हे अर्जुन ! जो व्यक्ति सकाम कर्मों तथा मनोधर्म के कल्मष से मुक्त होकर, मेरी शुद्ध भक्ति में तत्पर रहता है, जो मेरे लिए ही कर्म करता है, जो मुझे ही जीवन-लक्ष्य समझता है और जो प्रत्येक जीव से मैत्रीभाव रखता है, वह निश्चय ही मुझे प्राप्त करता है। 

आगे के श्लोक :–

इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीता के ग्यारहवें अध्याय ” विराट रुप ” का भक्तिवेदान्त तात्पर्य पूर्ण हुआ।

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