Chintamani Shatpadi Stotra / चिन्तामणि षट्पदी स्तोत्र

Chintamani Shatpadi Stotra
चिन्तामणि षट्पदी स्तोत्र


द्विरदवदन विषमरद वरद जयेशान शान्तवरसदन ।

सदनवसादन सादनमन्तरायस्य रायस्य ।। 1 ।।

अर्थात् :- हाथी के मुख वाले, एकदन्त, वरदायी, ईशान, परम शान्ति एवं समृद्धि के आश्रय, सज्जनों के क्लेशहर्ता और विघ्नविनाशक हे गणपति ! आपकी जय हो।

इन्दुकलकलितालिका सालिकशुम्भत्कपोलपालियुग ।
विकटस्फुटकटधाराधारोऽस्य प्रपञ्चस्य ।। 2 ।।

अर्थात् :- चन्द्रकला से सुशोभित भाल वाले एवं दोनों गण्डस्थल से देदीप्यमान आप इस विकट उलझनों से भरे संसार-प्रपंच के आधार हैं।

परपरशुपाणिपाणे पणितपणायेः पणायितोऽसि यतः ।
आरुह्य वज्रदन्तं विदधासि विपदन्तम् ।। 3 ।।

अर्थात् :- हे अंकुश और परशु को हाथ में धारण करने वाले ! सम्पत्तिप्रदाता तथा सर्ववन्द्य आप मुषक पर आरूढ़ होकर भक्तों की विपत्तियों का नाश करते हैं।

लम्बोदर दूर्वासन शयधृतसामोदमोदकाशनक ।
शनकैरवलोकय मां यमान्तरायापहारिदृशा ।। 4 ।।

अर्थात् :- हे लम्बोदर ! हे दूर्वा के आसन पर विराजमान ! हे प्रसन्नतापूर्वक लड्डुओं के भोग लगाने वाले आप कृपापूर्वक अपनी संकटनाशिनी दृष्टि मुझ पर डालिये।

आनन्दतुन्दिलाखिलवृन्दारकवृन्दवन्दिताङ्घ्रियुग ।
सुराप्रदण्डरसालो नागराजभालोऽतिभासि विभो ।। 5 ।।

अर्थात् :- आनन्द से भरे हुए देवगणों से पूजित चरणयुगल वाले हे विभो ! जलक्रीड़ा से स्निग्ध शुण्ड और गजमस्तक से आप सुशोभित हैं।

अगणेयगुणेशात्मज चिन्तकचिन्तामणे गणेशान ।
स्वचरणशरणं करुणावरुणालय पाहि मां दीनम् ।। 6 ।।

अर्थात् :- हे गणेश ! हे अगणित गुणों के भण्डार ! हे शिवपुत्र ! हे भक्तों के चिन्तामणि ! हे करुणा सागर ! अपने चरणों की शरण में आये मुझ दीन की आप रक्षा करें।

रूचिरवचोमृतरावोन्नीता नीता दिवस्तुतिः स्फीता ।
इति षट्पदी मदीया गणपतिपादाम्बुजे विशतु ।। 7 ।।

अर्थात् :- सुन्दर पदों से निर्मित, मधुर ध्वनि से सम्पन्न तथा आपके गुणगान से पवित्र मेरी यह षट्पदी भगवान् गणपति के चरणारविन्द में सुशोभित हो।

।। इस प्रकार चिन्तामणिषट्पदी सम्पूर्ण हुई ।।

 

वैदिक गणेश-स्तवन

गणानां त्वा गणपतिं हवामहे कविं कवीनामुपमश्रवस्तमम् ।
ज्येष्ठराजं ब्रह्मणां ब्रह्मणस्पत आ नः शृण्वन्नूतिभिः सीद सादनम् ।।

अर्थात् :- हे अपने गणों में गणपति ( देव ), क्रान्तदर्शियों में ( कवियों में ) श्रेष्ठ कवि, शिवा-शिव के प्रिय ज्येष्ठ पुत्र, अतिशय भोग और सुख आदि के दाता, हम आपका आवाहन करते। हैं। हमारी स्तुतियों को सुनते हुए पालनकर्ता के रूप में आप इस सदन में आसीन हों।

नि षु सीद गणपते गणेषु त्वामाहुर्विप्रतमं कवीनाम् ।
न ऋते त्वत्क्रियते किं चनारे महामर्कं मघवञ्चित्रमर्च ।।

अर्थात् :- हे गणपते ! आप स्तुति करने वाले हमलोगों के मध्य में भली प्रकार स्थित होइये। आपको क्रान्तदर्शी कवियों में अतिशय बुद्धिमान्-सर्वज्ञ कहा जाता है। आपके बिना कोई शुभाशुभ कार्य आरम्भ नहीं किया जाता। ( इसलिये ) हे भगवन् ( मधवन् ) ! ऋद्धि-सिद्धि के अधिष्ठाता देव ! हमारी इस पूजनीय प्रार्थना को स्वीकार कीजिये।

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