Chitrkut Mein Niwas / चित्रकूट में निवास

श्रीरामचरितमानस अयोध्या काण्ड

Chitrkut Mein Niwas, Kol-Bhilon Ke Dwara Sewa
चित्रकूट में निवास, कोल-भीलों के द्वारा सेवा

Chitrkut Mein Niwas, Kol-Bhilon Ke Dwara Sewa, चित्रकूट में निवास, कोल-भीलों के द्वारा सेवा :- इस प्रकार मुनि श्रेष्ठ वाल्मीकिजी ने श्रीरामचन्द्रजी को घर दिखाये। उनके प्रेमपूर्ण वचन श्रीरामजी के मन को अच्छे लगे। फिर मुनि ने कहा – हे सूर्यकुल के स्वामी ! सुनिये, अब मैं इस समय के लिये सुखदायक आश्रम कहता हूँ ( निवास स्थान बतलाता हूँ )। आप चित्रकूट पर्वत पर निवास कीजिये, वहाँ आपके लिये सब प्रकार की सुविधा है। सुहावना पर्वत है और सुन्दर वन है। वह हाथी, सिंह, हिरन और पक्षियों विहारस्थल है। वहाँ पवित्र नदी है, जिसकी पुराणों में प्रशंसा की है, और जिसको अत्रि ऋषि की पत्नी अनसूयाजी अपने तपोबल से लायी थीं। वह गङ्गाजी की धारा है, उसका मन्दाकिनी नाम है। वह सब पापरूपी बालकों को खा डालने के लिये डाकिनी ( डाइन ) रूप है।


एहि बिधि मुनिबर भवन देखाए। बचन सप्रेम राम मन भाए ।।

कह मुनि सुनहु भानुकुलनायक। आश्रम कहउँ समय सुखदायक ।।

अर्थात् :- इस प्रकार मुनि श्रेष्ठ वाल्मीकिजी ने श्रीरामचन्द्रजी को घर दिखाये। उनके प्रेमपूर्ण वचन श्रीरामजी के मन को अच्छे लगे। फिर मुनि ने कहा – हे सूर्यकुल के स्वामी ! सुनिये, अब मैं इस समय के लिये सुखदायक आश्रम कहता हूँ ( निवास स्थान बतलाता हूँ )।

चित्रकूट गिरि करहु निवासू। तहँ तुम्हार सब भाँति सुपासू ।।
सैलु सुहावन कानन चारू। करि केहरि मृग बिहग बिहारू ।।

अर्थात् :- आप चित्रकूट पर्वत पर निवास कीजिये, वहाँ आपके लिये सब प्रकार की सुविधा है। सुहावना पर्वत है और सुन्दर वन है। वह हाथी, सिंह, हिरन और पक्षियों विहारस्थल है।

नदी पुनीत पुरान बखानी। अत्रिप्रिया निज तप बल आनी ।।
सुरसरि धार नाउँ मंदाकिनि। जो सब पातक पोतक डाकिनि ।।

अर्थात् :- वहाँ पवित्र नदी है, जिसकी पुराणों में प्रशंसा की है, और जिसको अत्रि ऋषि की पत्नी अनसूयाजी अपने तपोबल से लायी थीं। वह गङ्गाजी की धारा है, उसका मन्दाकिनी नाम है। वह सब पापरूपी बालकों को खा डालने के लिये डाकिनी ( डाइन ) रूप है।

अत्रि आदि मुनिबर बहु बसहीं। करहिं जोग जप तप तन कसहीं ।।
चलहु सफल श्रम सब कर करहू। राम देहु गौरव गिरीबिरहू ।।

अर्थात् :- अत्रि आदि बहुत-से श्रेष्ठ मुनि वहाँ निवास करते हैं, जो योग, जप और तप करते हुए शरीर को कसते हैं। हे रामजी ! चलिये, सबके परिश्रम को सफल कीजिये और पर्वतश्रेष्ठ चित्रकूट को भी गौरव दीजिये।

दो० — चित्रकूट महिमा अमित कही महामुनि गाइ ।
आइ नहाए सरित बर सिय समेत दोउ भाई ।। 132 ।।

अर्थात् :- महामुनि वाल्मीकिजी ने चित्रकूट की अपरिमित महिमा बखानकर कही। तब सीताजी सहित दोनों भाइयों ने आकर श्रेष्ठ नदी मन्दाकिनी में स्नान किया।

रघुबर कहेउ लखन भल घाटू। करहु कतहुँ अब ठाहर ठाटू ।।
लखन दीख पय उतर करारा। चहुँ दिसि फिरेउ धनुष जिमि नारा ।।

अर्थात् :- श्रीरामचन्द्रजी ने कहा – लक्ष्मण ! बड़ा अच्छा घाट है। अब यही कहीं ठहरने की व्यवस्था करो। तब लक्ष्मणजी ने पयस्विनी नदी के उत्तर के ऊँचे किनारे को देखा [ और कहा कि – ] इसके चारों ओर धनुष के-जैसा एक नाला फिर हुआ है।

नदी पनच सर सम दम दाना। सकल कलुष कलि साउज नाना ।।
चित्रकूट जनु अचल अहेरी। चुकइ न घात मार मुठभेरी ।।

अर्थात् :- नदी ( मन्दाकिनी ) उस धनुष की प्रत्यञ्चा ( डोरी ) है और शम, दम, दान, बाण हैं। कलियुग के समस्त पाप उसके अनेकों हिंसक पशु [ रूप निशाने ] हैं। चित्रकूट ही मानो अचल शिकारी है, जिसका निशाना कभी चुकता नहीं है, और जो सामने से मारता है।

अस कहि लखन ठाउँ देखरावा। थलु बिलोकि रघुबर सुख पावा ।।
रमेउ राम मनु देवन्ह जाना। चले सहित सुर थपति प्रधाना ।।

अर्थात् :- ऐसा कहकर लक्ष्मणजी ने स्थान दिखलाया। स्थान को देखकर श्रीरामचन्द्रजी ने सुख पाया। जब देवताओं ने जाना कि श्रीरामचन्द्रजी यहाँ रम गया तब वे देवताओं के प्रधान थवई ( मकान बनाने वाले ) विश्वकर्मा को साथ लेकर चले।

कोल किरात बेष सब आए। रचे परन तृन सदन सुहाए ।।
बरनि न जाहिं मंजु दुइ साला। एक ललित लघु एक बिसाला ।।

अर्थात् :- सब देवता कोल-भीलों के वेष में आये और उन्होंने [ दिव्य ] पत्तों और घासों के सुन्दर घर बना दिये। दो ऐसी सुन्दर कुटियाँ बनाई जिसका वर्णन नहीं हो सकता। उनमें एक बड़ी सुन्दर छोटी-सी थी और दूसरी बड़ी थी।

दो० — लखन जानकी सहित प्रभु राजत रुचिर निकेत ।
सोह मदनु मुनि बेष जनु रति रितुराज समेत ।। 133 ।।

अर्थात् :- लक्ष्मणजी और जानकीजी सहित प्रभु श्रीरामचन्द्रजी सुन्दर घास-पत्तों के घर में शोभायमान हैं। मानो कामदेव मुनि का वेश धारण करके पत्नी रति और वसन्त-ऋतु के साथ सुशोभित हो।

मासपारायण, सत्रहवाँ विश्राम

अमर नाग किन्नर दिसिपाला। चित्रकूट आए तेहि काला ।।
राम प्रनामु कीन्ह सब काहू। मुदित देव लहि लोचन लाहू ।।

अर्थात् :- उस समय देवता नाग, किन्नर और दिक्पाल चित्रकूट में आये और श्रीरामचन्द्रजी ने सब किसी को प्रणाम किया। देवता नेत्रों का लाभ पाकर आनन्दित हुए।

बरषि सुमन कह देव समाजू। नाथ सनाथ भए हम आजू ।।
करि बिनती दुख दुसह सुनाए। हरषित निज निज सदन सिधाए ।।

अर्थात् :- फूलों की वर्षा करके देवसमाज ने कहा – हे नाथ ! आज [ आपका दर्शन पाकर ] हम सनाथ हो गये। फिर विनती करके उन्होंने अपने दुःसह दुःख सुनाये और [ दुखोँ के नाश का आश्वासन पाकर ] हर्षित होकर अपने-अपने स्थानों को चले गये।

चित्रकूट रघुनंदन छाए। समाचार सुनि सुनि मुनि आए ।।
आवत देखि मुदित मुनिबृंदा। कीन्ह दंडवत रघुकुल चंदा ।।

अर्थात् :- श्रीरघुनाथजी चित्रकूट में आ बसे हैं, यह समाचार सुन-सुनकर बहुत से मुनि आये। रघुकुल के चन्द्रमा श्रीरामचन्द्रजी ने मुदित हुई मुनि मण्डली को आते देखकर दण्डवत् प्रणाम किया।

मुनि रघुबरहि लाइ उर लेहीं। सुफल होन हित आसिष देहीं ।।
सिय सौमित्रि राम छबि देखहिं। साधन सकल सफल करि लेखहिं ।।

अर्थात् :- मुनिगण श्रीरामजी को हृदय से लगा लेते हैं और सफल होने के लिए आशीर्वाद देते हैं वे सीताजी, लक्ष्मणजी और श्रीरामचन्द्रजी की छवि देखते हैं और अपने सारे साधनों का सफल हुआ समझते हैं।

दो० — जथाजोग सनमानि प्रभु बिदा किए मुनिबृंद ।
करहिं जोग जप जाग तप निज आश्रमन्हि सुछंद ।। 134 ।।

अर्थात् :- प्रभु श्रीरामचन्द्रजी ने यथायोग्य सम्मान करके मुनि मण्डली को विदा किया। [ श्रीरामचन्द्रजी के आ जाने से ] वे सब अपने-अपने आश्रमों में अब स्वतन्त्रता के साथ योग, जप, यज्ञ और तप करने लगे।

यह सुधि कोल किरातन्ह पाई। हरषे जनु नव निधि घर आई ।।
कंद मूल फल भरि भरि दोना। चले रंक जनु लूटन सोना ।।

अर्थात् :- यह ( श्रीरामजी के आगमन का ) समाचार जब कोल-भीलों ने पाया, तो वे ऐसे हर्षित हुए मानो नवों निधियाँ उनके घर ही पर आ गयी हों। वे दोनों में कन्द, मूल, फल भर-भरकर चले। मानो दरिद्र सोना लूटने चले हों।

तिन्ह महँ जिन्ह देखे दोउ भ्राता। आओर तिन्हहि पूँछहिं मगु जाता।।
कहत सुनत रघुबीर निकाई। आइ सबन्हि देखे रघुराई ।।

अर्थात् :- उनमें से जो दोनों भाइयों को [ पहले ] देख चुके थे, उनसे दुसरे लोग रास्ते में जाते हुए पूछते हैं। इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजी की सुन्दरता कहते-सुनते सबने आकर श्रीरघुनाथजी के दर्शन किये।

करहिं जोहारु भेंट धरि आगे। प्रभुहि बिलकोहिं अति अनुरागे ।।
चित्र लिखे जणू जहँ तहँ ठाढ़े। पुलक सरीर नयन जल बाढ़े ।।

अर्थात् :- भेंट आगे रखकर वे लोग जोहार करते हैं और अत्यन्त अनुराग के साथ प्रभु को देखते हैं। वे मुग्ध हुए जहाँ-के-तहाँ मानो चित्र लिखे से खड़े हैं। उनके शरीर पुलकित हैं और नेत्रों में प्रेमाश्रुओं के जल की बाढ़ आ रही है।

राम सनेह मगन सब जाने। कहि प्रिय बचन सकल सनमाने ।।
प्रभुहि जोहारि बहोरि बहोरि। बचन बिनीत कहहिं कर जोरी ।।

अर्थात् :- श्रीरामजी ने उन सबको प्रेम में मग्न जाना, और प्रिय वचन कहकर सबका सम्मान किया। वे बार- बार प्रभु श्रीरामचन्द्रजी को जोहार हाथ जोड़कर विनीत वचन कहते हैं —

दो ० — अब हम नाथ सनाथ सब भए देखि प्रभु पाय ।।
भाग हमारें आगमनु राउर कोसलराय ।। 135 ।।

अर्थात् :- हे नाथ ! प्रभु ( आप ) के चरणों का दर्शन पाकर अब हम सब सनाथ हो गये। हे कोसलराज ! हमारे ही भाग्य से आपका यहाँ शुभागमन हुआ है।

धन्य भूमि बन पंथ पहारा। जहँ जहँ नाथ पाउ तुम्ह धारा ।।
धन्य बिहग मृग काननचारी। सफल जनम भए तुम्हहि निहारी ।।

अर्थात् :- हे नाथ ! जहाँ-जहाँ आपने अपने चरण रखे हैं, वे पृथ्वी, वन, मार्ग और पहाड़ धन्य हैं, वे वन में विचरने वाली पक्षी और पशु धन्य हैं, जो आपको देखकर सफल जन्म हो गये।

हम सब धन्य सहित परिवारा। दीख दरसु भरि नयन नयन तुम्हारा ।।
कीन्ह बासु भल ठाउँ बिचारी। इहाँ सकल रितु रहब सुखारी ।।

अर्थात् :- हम सब भी परिवार सहित धन्य हैं, जिन्होंने नेत्र भरकर आपका दर्शन किया। आपने बड़ी अच्छी जगह विचारकर निवास किया है। यहाँ सभी ऋतुओं में सुखी रहियेगा।

हम सब भाँति करब सेवकाई। करि केहरि अहि बाघ बराई ।।
बन बेहड़ गिरि कंदर खोहा। सब हमार प्रभु पग पग जोहा ।।

अर्थात् :- हमलोग सब प्रकार से हाथी, सिंह, सर्प और बाघों से बचाकर आपकी सेवा करेंगे। हे प्रभो ! यहाँ के बीहड़ वन, पहाड़, गुफाएँ और खोह ( दर्रे ) सब पग-पग हमारे देखे हुए हैं।

तहँ तहँ तुम्हहि अहेर खेलाउब। सर निरझर जलठाउँ देखाउब ।।
हम सेवक परिवार समेता। नाथ न सकुचब आयसु देता ।।

अर्थात् :- हम वहाँ-वहाँ ( उन-उन स्थानों में ) आपको शिकार खिलावेंगे और तालाब, झरने आदि जलाशयों को दिखावेंगे। हम कुटुम्ब समेत आपके सेवक हैं। हे नाथ ! इसलिये हमें आज्ञा देने में संकोच न कीजियेगा।

दो० — बेद बचन मुनि मन अगम ते प्रभु करुना ऐन ।
बचन किरातन्ह के सुनत जिमि पितु बालक बैन ।। 136 ।।

अर्थात् :- जो वेदों के वचन और मुनियों के मन को भी अगम हैं, वे करुणा के धाम प्रभु श्रीरामचन्द्रजी भीलों के वचन इस तरह सुन रहे हैं जैसे पिता बालकों के वचन सुनता है।

रामहि केवल प्रेमु पिआरा। जानि लेउ जो जाननिहारा ।।
राम सकल बनचर तब तोषे। कहि मृदु बचन प्रेम परितोषे ।।

अर्थात् :- श्रीरामचन्द्रजी को केवल प्रेम प्यारा है ; जो जानने वाला हो ( जानना चाहता हो ), वह जान ले। तब श्रीरामचन्द्रजी ने प्रेम से परिपुष्ट हुए ( प्रेमपूर्ण ) कोमल वचन कहकर उन सब वन में विचरण करने वाले लोगों को संतुष्ट किया।

बिदा किए सिर नाइ सिधाए। प्रभु गुन कहत सुनत घर आए ।।
एहि बिधि सिय समेत दोउ भाई। बसहिं बिपिन सुर मुनि सुखदाई ।।

अर्थात् :- फिर उनको विदा किया। वे सिर नवाकर चले और प्रभु के गुण कहते-सुनते घर आये। इस प्रकार देवता और मुनियों को सुख देनेवाले दोनों भाई सीताजी समेत वन में निवास करने लगे।

जब तें आइ रहे रघुनायकु। तब तें भयउ बनु मंगलदायकु ।।
फूलहिं फलहिं बिटप बिधि नाना। मंजु बलित बर बेलि बिताना ।।

अर्थात् :- जब से श्रीरघुनाथजी वन में आकर रहे तब से वन मङ्गलदायक हो गया। अनेकों प्रकार के वृक्ष फूलते और फलते हैं और उनपर लिपटी हुई सुन्दर बेलों के मण्डप तने हैं।

सुरतरु सरिस सुभायँ सुहाए। मनहुँ बिबुध बन परिहरि आए ।।
गुंज मंजुतर मधुकर श्रेनी। त्रिबिध बयारि बहइ सुख देनी ।।

अर्थात् :- वे कल्पवृक्ष के समान स्वाभाविक ही सुन्दर हैं। मानो वे देवताओं के वन ( नन्दनवन ) को छोड़कर आये हों। भौंरों की पंक्तियाँ बहुत ही सुन्दर गुंजार करती है और सुख देनेवाली शीतल, मन्द, सुगन्धित हवा चलती रहती है।

दो० — नीलकंठ कलकंठ सुक चातक चक्क चकोर ।
भाँति भाँति बोलहिं बिहग श्रवन सुखद चित चोर ।। 137 ।।

अर्थात् :- नीलकण्ठ, कोयल, तोते, पपीहे, चकवे और चकोर आदि पक्षी कानों को सुख देनेवाली और चित्त को चुरानेवाली तरह-तरह की बोलियाँ बोलते हैं।

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