Dashrath Sumantra Samwad / दशरथ सुमन्त्र संवाद

श्रीरामचरितमानस अयोध्या काण्ड

Dashrath Sumantra Samwad, Dashrath Maran
दशरथ सुमन्त्र संवाद, दशरथ मरण

Dashrath Sumantra Samwad, Dashrath Maran, दशरथ सुमन्त्र संवाद, दशरथ मरण :- राजा ने सुमन्त्रजी को हृदय से लगा लिया। मानो डूबते हुए आदमी को कुछ सहारा मिल गया हो। मन्त्री को स्नेह के साथ पास बैठाकर नेत्रों में जल भरकर राजा पूछने लगे। शोक से व्याकुल राजा फिर पूछने लगे – सीता, राम और लक्ष्मण का सँदेसा तो कहो। श्रीरामचन्द्रजी के रूप, गुण, शील और स्वभाव को याद कर-करके राजा हृदय में सोच करते हैं। राजा बार-बार मन्त्री से पूछते हैं – मेरे प्रियतम पुत्रों का सँदेसा सुनाओ। हे सखा ! तुम तुरंत वही उपाय करो जिससे श्रीराम, लक्ष्मण और सीताजी को मुझे आँखों दिखा दो। 


भूप सुमंत्रु लीन्ह उर लाई। बूड़त कछु अधार जनु पाई ।।

सहित सनेह निकट बैठारी। पूँछत राउ नयन भरि बारी ।।

अर्थात् :- राजा ने सुमन्त्रजी को हृदय से लगा लिया। मानो डूबते हुए आदमी को कुछ सहारा मिल गया हो। मन्त्री को स्नेह के साथ पास बैठाकर नेत्रों में जल भरकर राजा पूछने लगे। –

राम कुसल कहु सखा सनेही। कहँ रघुनाथु लखनु बैदेही ।।
आने फेरि कि बनहि सिधाए। सुनत सचिव लोचन जल छाए ।।

अर्थात् :- हे मेरे प्रेमी सखा ! श्रीराम की कुशल कहो ! बताओ, श्रीरामज, लक्ष्मणज और जानकी कहाँ हैं ? उन्हें लौटा लाये हो कि वन को चले गये ? यह सुनते ही मन्त्री के नेत्रों में जल भर आया।

सोक बिकल पुनि पूँछ नरेसू। कहु सिय राम लखन संदेसू ।।
राम रूप गुन सील सुभाऊ। सुमिरि सुमिरि उर सोचत राऊ ।।

अर्थात् :- शोक से व्याकुल राजा फिर पूछने लगे – सीता, राम और लक्ष्मण का सँदेसा तो कहो। श्रीरामचन्द्रजी के रूप, गुण, शील और स्वभाव को याद कर-करके राजा हृदय में सोच करते हैं।

राउ सुनाइ दीन्ह बनबासू। सुनि मन भयउ न हरषु हराँसू ।।
सो सुत बिछुरत गए न प्राना। को पापी बड़ मोहि समाना ।।

अर्थात् :- [ और कहते हैं – ] मैंने राजा होने की बात सुनाकर वनवास दे दिया, यह सुनकर भी जिस ( राम ) के मन में हर्ष और विषाद नहीं हुआ, ऐसे पुत्र के बिछुड़ने पर भी मेरे प्राण नहीं गये, तब मेरे समान बड़ा पापी कौन होगा ?

दो० — सखा रामु सिय लखनु जहँ तहाँ मोहि पहुँचाउ ।
नाहिं त चाहत चलन अब प्रान कहउँ सतिभाउ ।। 149 ।।

अर्थात् :- हे सखा ! श्रीराम, जानकी और लक्ष्मण जहाँ हैं, मुझे भी वहीं पहुँचा दो। नहीं तो मैं सत्य भाव से कहता हूँ कि मेरे प्राण अब चलना ही चाहते हैं।

पुनि पुनि पूँछत मंत्रिहि राऊ। प्रियतम सुअन सँदेस सुनाऊ ।।
करहि सखा सोइ बेगि उपाऊ। रामु लखनु सिय नयन देखाऊ ।।

अर्थात् :- राजा बार-बार मन्त्री से पूछते हैं – मेरे प्रियतम पुत्रों का सँदेसा सुनाओ। हे सखा ! तुम तुरंत वही उपाय करो जिससे श्रीराम, लक्ष्मण और सीताजी को मुझे आँखों दिखा दो।

सचिव धीर धरि कह मृदु बानी। महाराज तुम्ह पंडित ग्यानी ।।
बीर सुधीर धुरंधर देवा। साधु समाजु सदा तुम्ह सेवा ।।

अर्थात् :- मन्त्री धीरज धरकर कोमल वाणी से बोले – महाराज ! आप पण्डित और ज्ञानी हैं। हे देव ! आप शूरवीर तथा उत्तम धैर्यवान् पुरुषों में श्रेष्ठ हैं। आपने सदा साधुओं के समाज का सेवन किया है।

जनम मरन सब दुख सुख भोगा। हानि लाभु प्रिय मिलन बियोगा ।।
काल करम बस होहिं गोसाईं। बरबस राति दिवस की नाईं ।।

अर्थात् :- जन्म-मरण, सुख-दुःख के भोग, हानि-लाभ, प्यारों का मिलना-बिछुड़ना, ये सब हे स्वामी ! काल और कर्म के अधीन रात और दिन की तरह बरबस होते रहते हैं।

सुख हरषहिं जड़ दुख बिलखाहीं। दोउ सम धीर धरहिं मन माहीं ।।
धीरज धरहु बिबेकु बिचारी। छाड़िअ सोच सकल हितकारी ।।

अर्थात् :- मूर्ख लोग सुख में हर्षित होते और दुःख में रोते हैं, पर धीर पुरुष अपने मन में दोनों को समान समझते हैं। हे सबके हितकारी ( रक्षक ) ! आप विवेक विचारकर धीरज धरिये और शोक का परित्याग कीजिये।

दो० — प्रथम बासु तमसा भयउ दूसर सुरसरि तीर ।
न्हाइ रहे जलपानु करि सिय समेत दोउ बीर ।। 150 ।।

अर्थात् :- श्रीरामजी का पहला निवास ( मुकाम ) तमसा के तट पर हुआ, दूसरा गङ्गातीर पर। सीताजी सहित दोनों भाई उस दिन स्नान करके जल पीकर ही रहें।

केवट किन्हि बहुत सेवकाई। सो जामिनि सिंगरौर गवाँई ।।
होत प्रात बट छीरु मगावा। जटा मुकुट निज सीस बनावा ।।

अर्थात् :- केवट ( निषादराज ) ने बहुत सेवा की। वह रात सिंगरौर ( शृंगवेरपुर ) में ही बितायी। दूसरे दिन सवेरा होते ही बड़का दूध मँगवाया और उससे श्रीराम-लक्ष्मणजी होने सिरों पर जटाओं के मुकुट बनाये।

राम सखाँ तब नाव मगाई। प्रिया चढ़ाइ चढ़े रघुराई ।।
लखन बान धनु धरे बनाई। आपु चढ़े प्रभु आयसु पाई ।।

अर्थात् :- तब श्रीरामचन्द्रजी के सखा निषादराज जी ने नाव मँगवायी। पहले प्रिया सीताजी को उस पर चढ़ाकर फिर श्रीरघुनाथजी चढ़े। फिर लक्ष्मणजी ने धनुष-बाण सजाकर रखे और प्रभु श्रीरामचन्द्रजी की आज्ञा पाकर स्वयं चढ़े।

बिकल बिलोकि मोहि रघुबीरा। बोले मधुर बचन धरि धीरा ।।
तात प्रनामु तात सन कहेहू। बार बार पद पंकज गहेहू ।।

अर्थात् :- मुझे व्याकुल देखकर श्रीरामचन्द्रजी ने धीरज धरकर मधुर वचन बोले – हे तात ! पिताजी से मेरा प्रणाम कहना और मेरी ओर से बार-बार उनके चरणकमल पकड़ना।

करबि पायँ परि बिनय बहोरी। तात करिअ जनि चिंता मोरी ।।
बन मग मंगल कुसल हमारें। कृपा अनुग्रह पुन्य तुम्हारें ।।

अर्थात् :- फिर पाँव पकड़कर विनती करना कि हे पिताजी ! आप मेरी चिन्ता न कीजिये। आपकी कृपा, अनुग्रह और पुण्य से वन में और मार्ग में हमारा कुशल-मङ्गल होगा।

छं० — तुम्हरें अनुग्रह तात कानन जात सब सुखु पाइहौं ।
प्रतिपालि आयसु कुसल देखन पाय पुनि फिरि आइहौं ।।
जननीं सकल परितोषि परि परि पायँ करि बिनती घनी ।
तुलसी करहु सोइ जतनु जेहिं कुसली रहहिं कोसलधनी ।।

अर्थात् :- हे पिताजी ! आपके अनुग्रह से मैं वन जाते हुए सब प्रकार का सुख पाऊँगा। आज्ञा का भलीभाँति पालन करके चरणों का दर्शन करने कुशलपूर्वक फिर लौट आऊँगा। सब माताओं के पैरों पड़-पड़कर उनका समाधान करके और उनसे बहुत विनती करके – तुलसीदास कहते हैं – तुम वही प्रयत्न करना जिसमें कोसलपति पिताजी कुशल रहें।

सो० — गुर सन कहब सँदेसु बार बार पद पदुम गहि ।
करब सोइ उपदेसु जेहिं न सोच मोहि अवधपति ।। 151 ।।

अर्थात् :- बार-बार चरणकमलों को पकड़कर गुरु वसिष्ठजी से मेरा सँदेसा कहना कि वे वही उपदेश दें जिसमें अवधपति पिताजी मेरा सोच न करें।

पुरजन परिजन सकल निहोरी। तात सुनाएहु बिनती मोरी ।।
सोइ सब भाँति मोर हितकारी। जातें रह नरनाहु सुखारी ।।

अर्थात् :- हे तात ! सब पुरवासियों और कुटुम्बियों से निहोरा ( अनुरोध ) करके मेरी विनती सुनाना कि वही मनुष्य मेरा प्रकार से हितकारी है किसकी चेष्टा से महाराज सुखी रहें।

कहब सँदेसु भरत के आएँ। नीति न तजिअ राजपदु पाएँ ।।
पालेहु प्रजहि करम बन बानी। सेएहु मातु सकल सम जानी ।।

अर्थात् :- भरत के आने पर उनको मेरा सँदेसा कहना कि राजा का पद पा जाने पर नीति न छोड़ देना ; कर्म, वचन और मन से प्रजा का पालन करना और सब माताओं को समान जानकार उनकी सेवा करना।

ओर निबाहेहु भायप भाई। करि पितु मातु सुजन सेवकाई ।।
तात भाँति तेहि राखब राऊ। सोच मोर जेहिं करै न काऊ ।।

अर्थात् :- और हे भाई ! पिता, माता और स्वजनों की सेवा करके भाईपने को अन्त तक निबाहना। हे तात ! राजा ( पिताजी ) को उसी तरह रखना जिससे वे कभी ( किसी तरह भी ) मेरा सोच न करें।

लखन कहे कछु बचन कठोरा। बरजि राम पुनि मोहि निहोरा ।।
बार बार निज सपथ देवाई। कहबि न तात लखन लरिकाई ।।

अर्थात् :- लक्ष्मणजी ने कुछ कठोर वचन कहे। किन्तु श्रीरामचन्द्रजी ने उन्हें बरजकर फिर मुझसे अनुरोध किया और बार-बार अपनी सौगंध दिलायी [ और कहा – ] हे तात ! लक्ष्मण का लड़कपन वहाँ न कहना।

दो० — कहि प्रनामु कछु कहन लिय सिय भइ सिथिल सनेह ।
थकित बचन लोचन सजल पुलक पल्लवित देह ।। 152 ।।

अर्थात् :- प्रणाम कर सीताजी भी कुछ कहने लगी थीं, परन्तु स्नेहवश वे शिथिल हो गयीं। उनकी वाणी रुक गयी, नेत्रों में जल भर आया और शरीर रोमाञ्च से व्याप्त हो गया।

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