Devi Stotra Ratnakar / देवी स्तोत्र रत्नाकर

Devi Stotra Ratnakar
देवी स्तोत्र रत्नाकर

Devi Stotra Ratnakar, देवी स्तोत्र रत्नाकर :- भक्त और उसके आराध्य का परस्पर नित्य सम्बन्ध है। भक्त की भावना के अनुसार भगवान् उसके सर्वविध कल्याण-मंगल के लिये सगुण-साकार रूप में प्रकट होते हैं और अनिर्वचनीय होते हुए भी वे भक्तों की वाणी के विषय बनते हैं। भक्त भगवान् की उस मंगलमयी मूर्ति को अपने हृदय देश में तो बैठा ही लेता है; साथ ही आराधना करने के लिये अर्चाविग्रह के रूप में मन्दिर आदि में प्रतिष्ठा भी कर लेता है।

मूलतः एक ही अद्वितीय सत्-तत्त्व सर्वत्र विद्यमान है- ‘एकैवाहं जगत्यत्र द्वितीया का मामापरा।’ उपासकों के रुचिभेद से (रुचीनां वैचित्र्यात्) कभी वह भगवत्तत्त्व के रूप में पूजित होता है तो कभी आदिशक्ति जगदम्बा के रूप में। जगदम्बा रूप मातृत्तत्त्वा है, इसलिये उसकी करुणा की, कृपा की कोई इयत्ता नहीं है। कुपुत्र पर भी माता का अपार स्नेह रहता है – ‘कुपुत्रो जायेत क्वचिदपि कुमाता न भवति।।’

अपने उपासक द्वारा कितना ही अपराध बन जाय, फिर भी माता उसका परित्याग नहीं करती- ‘अपराधपरम्परापरं न हि माता समुपेक्षते सुतम्।।’ माँ की उपासना की यह विशेष बात है कि जो उनकी शरण में चले जाते हैं, वे दूसरों को भी शरण देने योग्य- आश्रय देनेयोग्य हो जाते हैं- ‘त्वामाश्रिता ह्याश्रयतां प्रयान्ति।।’ इसी बात को देवगण महादेवी की स्तुति करते हुए कहते हैं- हे विश्वेश्वरि !

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आप विश्व का पालन करती हैं। आप विश्वरूपा हैं, इसलिये सम्पूर्ण विश्व को धारण करती हैं। आप विश्वनाथ की भी वन्दनीया हैं। जो लोग भक्तिपूर्वक आप के सामने मस्तक झुकाते हैं, वे सम्पूर्ण विश्व को आश्रय देनेवाले हो जाते हैं। –

विश्वेश्वरि त्वं परिपासि विश्वं विश्वात्मिका धारयसीति विश्वम् ।
विश्वेशवन्द्या भवती भवन्ति विश्वाश्रया ये त्वयि भक्तिनम्राः ।। (मार्कण्डेयपुराण)

एक बार देवगण भगवती के पास गये और उनसे पूछने लगे- हे महादेवी ! आप कौन हैं? कासि त्वं महादेवीति।’- इस पर वे बोलीं- ‘अहं ब्रह्मस्वरूपिणीमत्तः प्रकृतिपुरुषात्मकं जगत्। शून्यं चाशून्यं च।’ अर्थात् मैं ब्रह्मस्वरूप हूँ। मुझसे प्रकृति-पुरुषात्मक सद्रूप और असद्रूप जगत् उत्पन्न हुआ है।

यही एक शक्तितत्त्व अनेक नाम-रूपों में प्रतिष्ठित हैं। महाकाली, महालक्ष्मी तथा महासरस्वती उसी महादेवी के त्रिविध रूप हैं। दुर्गा, चण्डिका, भवानी, कात्यायनी, गौरी, पार्वती, गायत्री, अन्नपूर्णा, सीता तथा राधा आदि उन्हीं महाशक्ति के विविध नाम-रूप हैं। साधक अपनी अभिरुचि के अनुसार आराधना करता है।

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