Devi Stotram / देवी स्तोत्रम्

Devi Stotram
देवी स्तोत्रम्

Devi Stotram, देवी स्तोत्रम् :- हे जननि ! मैंने जान लिया कि यह समस्त विश्व आप में समाहित है तथा सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की सृष्टि एवं संहार भी आप ही करती हैं। इस ब्रह्माण्ड के निर्माण में आपकी विस्तृत प्रभाववाली शक्ति ही मुख्य हेतु है, अतः मुझे अब ज्ञात हो गया कि आप ही सम्पूर्ण लोक में व्याप्त हैं। इस सत् एवं असत् रूप सम्पूर्ण जगत् का विस्तार करके उस चिद्ब्रह्म पुरुष के समक्ष यथासमय आप इसे समग्र रूप से प्रस्तुत करती हैं। इस प्रकार अपनी प्रसन्नता के लिये सोलह तथा अन्य सात तत्त्वों के साथ आपकी क्रीडा हमें इन्द्रजाल के समान मनोरंजनकारिणी प्रतीत होती है।  

श्रीभगवानुवाच

नमो देव्यै प्रकृत्यै च विधात्र्यै सततं नमः ।
कल्याण्यै कामदायै च वृद्ध्यै सिद्ध्यै नमो नमः ।। 1 ।।

सच्चिदानन्दरूपिण्यै संसारारणये नमः ।
पञ्चकृत्यविधात्र्यै ते भुवनेश्यै नमो नमः ।। 2 ।।

अर्थात् :- भगवान् विष्णु ने कहा – प्रकृति एवं विधात्री देवी को मेरा निरन्तर नमस्कार है। कल्याणी, कामदा, वृद्धि तथा सिद्धि देवी को बार-बार नमस्कार है। सच्चिदानन्दरूपिणी तथा संसार की योनिस्वरूपा देवी को नमस्कार है। आप पंचकृत्यविधात्री तथा श्रीभुवनेश्वरी को बार-बार नमस्कार है।

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सर्वाधिष्ठानरूपायै कूटस्थायै नमो नमः ।
अर्धमात्रार्थभूतायै हृल्लेखायै नमो नमः ।। 3 ।।

अर्थात् :- समस्त संसार की एकमात्र अधिष्ठात्री तथा कुटस्थरूपा देवी को बार-बार नमस्कार है। ब्रह्मानन्दमयी अर्धमात्रात्मिका एवं हृल्लेखारूपिणी देवी को बार-बार नमस्कार है।

ज्ञातं मयाऽखिलमिदं त्वयि सन्निविष्टं
त्वत्तोऽस्य सम्भवलयावपि मातरद्य ।
शक्तिश्च तेऽस्य करणे विततप्रभावा
ज्ञाताऽधुना सकललोकमयीति नूनम् ।। 4 ।।

अर्थात् :- हे जननि ! मैंने जान लिया कि यह समस्त विश्व आप में समाहित है तथा सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की सृष्टि एवं संहार भी आप ही करती हैं। इस ब्रह्माण्ड के निर्माण में आपकी विस्तृत प्रभाववाली शक्ति ही मुख्य हेतु है, अतः मुझे अब ज्ञात हो गया कि आप ही सम्पूर्ण लोक में व्याप्त हैं।

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विस्तार्य सर्वमखिलं सदसद्विकारं
सन्दर्शयस्यविकलं पुरुषाय काले ।
तत्त्वैश्च षोडशभिरेव च सप्तभिश्च
भासीन्द्रजालमिव नः किल रञ्जनाय ।। 5 ।।

अर्थात् :- इस सत् एवं असत् रूप सम्पूर्ण जगत् का विस्तार करके उस चिद्ब्रह्म पुरुष के समक्ष यथासमय आप इसे समग्र रूप से प्रस्तुत करती हैं। इस प्रकार अपनी प्रसन्नता के लिये सोलह तथा अन्य सात तत्त्वों के साथ आपकी क्रीडा हमें इन्द्रजाल के समान मनोरंजनकारिणी प्रतीत होती है।

न त्वामृते किमपि वस्तुगतं विभाति
व्याप्यैव सर्वमखिलं त्वमवस्थिताऽसि ।
शक्तिं विना व्यवहृतो पुरुषोऽप्यशक्तो
बम्भण्यते जननि बुद्धिमता जनेन ।। 6 ।।

अर्थात् :- हे जननि ! आपसे रहित यहाँ कोई भी वस्तु दिखायी नहीं देती; आप ही समस्त जगत् को व्याप्त करके स्थित रहती हैं। बुद्धिमान् पुरुषों का कथन है कि आपकी शक्ति के बिना वह परमपुरुष भी कुछ भी करने में असमर्थ है।

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प्रीणासि विश्वमखिलं सततं प्रभावैः
स्वैस्तेजसा च सकलं प्रकटीकरोषि ।
अस्त्येव देवि तरसा किल कल्पकाले
को वेद देवि चरितं तव वैभवस्य ।। 7 ।।

अर्थात् :- हे माता ! आप अपने कृपा प्रभाव से सारे संसार का सदा कल्याण करती हैं। हे देवि ! आप ही अपने तेज से सृष्टिकाल में सम्पूर्ण जगत् को उत्पन्न करती हैं तथा प्रलयकाल में इसका शीघ्र ही संहार कर डालती हैं। हे देवि ! आपके वैभव के लीला-चरित्र को भलीभाँति जानने में कौन समर्थ है ?

त्राता वयं जननि ते मधुकैटभाभ्यां
लोकाश्च ते सुवितताः खलु दर्शिता वै ।
नीताः सुखस्य भवने परमां च कोटिं
यद्दर्शनं तव भवानि महाप्रभावम् ।। 8 ।।

अर्थात् :- हे जननि ! मधु-कैटभ नामक दोनों दानवों से आपने हमारी रक्षा की है, आपने ही हमलोगों को अपने अनेक विस्तृत लोक दिखाये तथा अपने-अपने भवन में हमें परमानन्द का अनुभव कराया; हे भवानि ! यह आपके दर्शन का ही महान् प्रभाव है।

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नाहं भवो न च विरिञ्चि विवेद मातः
कोऽन्यो हि वेत्ति चरितं तव दुर्विभाव्यम् ।
कानीह सन्ति भुवनानि महाप्रभावे
ह्यस्मिन्भवानि रचिते रचनाकलापे ।। 9 ।।

अर्थात् :- हे माता ! जब मैं (विष्णु), शिव तथा ब्रह्मा भी आपके अपूर्व चरित्र को जानने में समर्थ नहीं हैं, तब अन्य कोई कैसे जान सकेगा ? हे महिमामयी भवानि ! आपके रचे हुए इस सृष्टि प्रपंच में न जाने कितने लोक भरे पड़े हैं।

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