Dono Senao Ki Shankh Dhwani / दोनों सेनाओं की शंख ध्वनि

अध्याय एक कुरुक्षेत्र के युद्धस्थल

Dono Senao Ki Shankh Dhwani
दोनों सेनाओं की शंख ध्वनि

Dono Senao Ki Shankh Dhwani Ka Kathan, दोनों सेनाओं की शंख ध्वनि का कथनभगवान् कृष्ण ने अपना पाञ्चजन्य शंख बजाया, अर्जुन ने देवदत्त शंख तथा अतिभोजी एवं अतिमानवीय कार्य करने वाले भीम ने पौण्ड्र नामक भयंकर शंख बजाया। हे राजन् ! कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर ने अपना अनंतविजय नामक शंख बजाया तथा नकुल और सहदेव ने सुघोष एवं मणिपुष्पक शंख बजाये।

श्लोक 12 से 19

तस्य सञ्जनयन्हर्षं कुरुवृद्धः पितामहः।
सिंहनादं विनद्योच्चैः शङ्खं दध्मौ प्रतापवान् ।। 12 ।।

तस्य — उसका; सञ्जनयन् — बढ़ाते हुए; हर्षम् — हर्ष; कुरु-वृद्धः — कुरुवंश के वयोवृद्ध ( भीष्म ); पितामहः — पितामह, बाबा; सिंह-नादम् — सिंह की सी गर्जना; विनद्य — गरज कर; उच्चैः — उच्च स्वर से; शङ्खम् — शंख; दध्मौ — बजाया; प्रताप-वान् — शक्तिशाली। 

तात्पर्य – तब कुरुवंश के वयोवृद्ध परम प्रतापी एवं वृद्ध पितामह ने सिंह-गर्जना की सी ध्वनि करने वाले अपने शंख को उच्च स्वर से बजाया, जिससे दुर्योधन को हर्ष हुआ।

ततः शङ्खाश्च भेर्यश्च पणवानकगोमुखाः ।
सहसैवाभ्यहन्यन्त स शब्दस्तुमुलोऽभवत् ।। 13 ।।

ततः — तत्पश्चात्; शङ्खाः — शंख; च — भी; भेर्यः — बड़े-बड़े ढोल, नगाड़े; च — तथा; पणव-आनक — ढोल तथा मृदंग; गो-मुखाः — शृंग; सहसा — अचानक; एव — निश्चय ही; अभ्यहन्यन्त — एक साथ बजाये गये; सः — वह; शब्दः — समवेत स्वर; तुमुलः — कोलाहलपूर्ण; अभवत् — हो गया। 

तात्पर्य – तत्पश्चात् शंख, नगाड़े, बिगुल, तुरही तथा सींग सहसा एक साथ बज उठे। वह समवेत स्वर अत्यन्त कोलाहपूर्ण था।

ततः श्वेतैर्हयैर्युक्ते महति स्यन्दने स्थितौ
माधवः पाण्डवश्चैव दिव्यौ शङ्खाै प्रदध्मतुः ।। 14 ।।

ततः — तत्पश्चात्; श्वेतैः — श्वेत; हयैः — घोड़ों से; युक्ते — युक्त; महति — विशाल; स्यन्दने — रथ में ; स्थितौ — आसीन; माधवः — कृष्ण ( लक्ष्मीपति ) ने; पाण्डवः — अर्जुन ( पाण्डुपुत्र ) ने; च — तथा; एव — निश्चय ही; दिव्यौ — दिव्य; शङ्खाै — शंख; प्रदध्मतुः — बजाये। 

तात्पर्य – दूसरी ओर से श्वेत घोड़ों द्वारा खींचे जाने वाले विशाल रथ पर आसीन कृष्ण तथा अर्जुन ने अपने-अपने दिव्य शंख बजाये।

इसे भी पढ़ें —

  1. 1 से 11 – दोनों सेनाओं के शूरवीरों की गणना
  2. 20 से 27 – अर्जुन द्वारा सेना निरिक्षण 

पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जयः ।
पौण्ड्रं दध्मौ महाशङ्खं भीमकर्मा वृकोदरः ।। 15 ।।

पाञ्जजन्यम् — पाञ्जजन्य नामक; हृषीक-ईशः — हृषीकेश ( कृष्ण जो भक्तों की इन्द्रियों को निर्देश करते हैं ) ने; देवदत्तम् — देवदत्त नामक शंख; धनम्-जयः — धनञ्जय ( अर्जुन, धन को जीतने वाला ) ने; पौण्ड्रम् — पौण्ड्र नामक शंख; दध्मौ — बजाया; महा-शङ्खम् — भीषण शंख; भीम-कर्मा — अतिमानवीय कर्म करने वाले; वृक-उदरः — ( अतिभोजी ) भीम ने।  

तात्पर्य – भगवान् कृष्ण ने अपना पाञ्चजन्य शंख बजाया, अर्जुन ने देवदत्त शंख तथा अतिभोजी एवं अतिमानवीय कार्य करने वाले भीम ने पौण्ड्र नामक भयंकर शंख बजाया।

अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिरः ।
नकुलः सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ ।। 16 ।।

काश्यश्च परमेष्वासः शिखण्डी च महारथः ।  
धृष्टधुम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजितः ।। 17 ।।

द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वशः पृथिवीपते ।
सौभद्रश्च महाबाहुः शङ्खांद्धमुः पृथक्पृथक् ।। 18 ।।

अनन्त-विजयम् — अनन्त विजय नामक शंख; राजा — राजा; कुन्ती-पुत्रः — कुन्ती के पुत्र; युधिष्ठिरः — युधिष्ठिर; नकुलः — नकुल; सहदेवः — सहदेव ने; च — तथा; सुघोष-मणिपुष्पकौ — सुघोष तथा मणिपुष्पक नामक शंख; काश्यः — काशी ( वाराणसी ) के राजा ने; च — तथा; परम-इषु-आसः — महान धनुर्धर; शिखण्डी — शिखण्डी ने; च — भी; महा-रथः — हजारों से अकेले लड़ने वाले; धृष्टद्युम्नः — धृष्टद्युम्न ( राजा द्रुपद के पुत्र ) ने; विराटः — विराट ( राजा जिसने पाण्डवों को उनके अज्ञात-वास के समय शरण दी ) ने; च — भी; सात्यकिः — सात्यकि ( युयुधान, श्रीकृष्ण के साथी ) ने; च — तथा; अपराजितः — कभी न जीता जाने वाला, सदा विजयी; द्रुपदः — द्रुपद, पंचाल के राजा ने; द्रोपदेयाः — द्रोपदी के पुत्रों ने; च — भी; सर्वशः — सभी; पृथिवी-पते — हे राजा; सौभद्रः — सुभद्रापुत्र अभिमन्यु ने; च — भी; महा-बाहुः — विशाल भुजाओं वाला; शङ्खान् — शंख; दध्मुः — बजाए; पृथक्-पृथक् — अलग-अलग।  

तात्पर्य – हे राजन् ! कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर ने अपना अनंतविजय नामक शंख बजाया तथा नकुल और सहदेव ने सुघोष एवं मणिपुष्पक शंख बजाये। महान धनुर्धर काशीराज, परम योद्धा शिखण्डी, धृष्टद्युम्न, विराट, अजेय सात्यकि, द्रुपद, द्रौपदी के पुत्र तथा सुभद्रा के महाबाहु पुत्र आदि सबों ने अपने-अपने शंख बजाये।

स घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यादारयत् ।
नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलोऽभ्यनुनादयन् ।। 19 ।।

सः — उस; घोषः — शब्द ने; धार्तराष्ट्राणाम् — धृतराष्ट्र के पुत्रों के; हृदयानि — हृदयों को; व्यदारयत् — विदीर्ण कर दिया; नभः — आकाश; च — भी; पृथिवीम् — पृथ्वीतल को; च — भी; एव — निश्चय ही; तुमुलः — कोलाहलपूर्ण; अभ्यनुनादयन् — प्रतिध्वनित करता, शब्दायमान करता।  

तात्पर्य – इन विभिन्न शंखों की ध्वनि कोलाहलपूर्ण बन गई जो आकाश तथा पृथ्वी को शब्दायमान करती हुई धृतराष्ट्र के पुत्रों के हृदयों को विदीर्ण करने लगी।

आगे के श्लोक —

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