Durga Ashtami Ki Vrat Katha / दुर्गा अष्टमी की व्रत कथा

Durga Ashtami Ki Vrat Katha
दुर्गा अष्टमी की व्रत कथा


दुर्गा अष्टमी की व्रत कथा, Durga Ashtami Ki Vrat Katha :- हिन्दुओं के प्राचीन शास्त्रों के अनुसार दुर्गा देवी नौ रूपों में प्रकट हुई हैं। उन सब रूपों की पृथक्-पृथक् कथाएँ इस प्रकार हैं।

  1. Mahakali, महाकाली :-

एक बार जब पूरा संसार प्रलय से ग्रस्त हो गया था। चारों ओर पानी ही पानी दिखाई देता था। उस समय भगवान् विष्णु की नाभि से एक कमल उत्पन्न हुआ। उस समय कमल से ब्रह्मा जी उत्पन्न हुए। इसके अलावा भगवान् नारायण जब निद्रा में थे तो उनके कानों में से कुछ मैल निकला, उस मैल से मधु और कैटभ नाम के दो दैत्य उत्पन्न हुए। जब उन दैत्यों ने चारों ओर देखा तो ब्रह्मा जी के अलावा उन्हें कुछ भी दिखाई न दिया। ब्रह्मा जी को देखकर वे दैत्य उनको मारने के लिए दौड़े। तब भयभीत हुए ब्रह्मा जी ने भगवान् विष्णु की स्तुति की।

स्तुति से विष्णु भगवान् की आँखों में जो महामाया ब्रह्मा की योगनिद्रा के रूप में निवास करती थीं वह लोप हो गई और विष्णु भगवान् की नींद खुल गई। उनके जागते ही दोनों दैत्य भगवान् विष्णु से लड़ने लगे।  पाँच हजार वर्षों तक युद्ध चलता रहा।

अन्त में भगवान् की रक्षा के लिए महामाया ने असुरों की बुद्धि को बदल दिया। तब वे असुर विष्णु भगवान् से बोले — हम आपके युद्ध से प्रसन्न हैं जो चाहे वह वर माँग लें। भगवान् ने मौका पाया और कहने लगे — यदि हमें वर देना है तो वर दो कि दैत्यों का नाश हो। दैत्यों ने कहा — ऐसा ही होगा। ऐसा कहते ही महाबली दैत्यों का नाश हो गया। जिसने असुरों की बुद्धि को बदला था वह ‘ महाकाली ‘ थीं।

  1. Mahalakshmi, महालक्ष्मी :-

एक समय महिषासुर नाम का एक दैत्य हुआ। उसने समस्त राजाओं को हराकर पृथ्वी और पटल पर अपना अधि कार जमा लिया। जब वह देवताओं से युद्ध करने लगा तो देवता भी उससे युद्ध में हराकर भागने लगे। भागते-भागते वे भगवान् विष्णु के पास पहुँचे और उस दैत्य से बचने के लिए स्तुति करने लगे। देवताओं की स्तुति करने से भगवान् विष्णु और शंकर जी सब प्रसन्न हुए, तब उनके शरीर से एक तेज निकला जिसने महालक्ष्मी का रूप धारण कर लिया। इन्हीं महालक्ष्मी ने महिषासुर दैत्य को युद्ध में मार कर देवताओं का कष्ट दूर किया।

  1. Mahasaraswati Ya Chamunda, महासरस्वती या चामुण्डा :-

एक समय शुम्भ-निशुम्भ नाम के दो दैत्य बहुत बलशाली थे। उनसे युद्ध में मनुष्य तो क्या देवता तक हार गये। जब देवताओं ने देखा कि अब युद्ध में नहीं जीत सकते, तब वे स्वर्ग छोड़कर भगवान् विष्णु की स्तुति करने लगे। उस समय भगवान् विष्णु के शरीर में से एक ज्योति प्रकट हुई जो कि महासरस्वती थीं। महासरस्वती अत्यन्त रूपवान थीं। उनका रूप देखकर वे दैत्य मुग्ध हो गये और अपना सुग्रीव नाम का दूत उस देवी के पास अपनी इच्छा प्रकट करते हुए भेजा। उस दूत को देवी ने वापिस कर दिया। इसके बाद उन दोनों ने कुछ सोच-समझकर अपने सेनापति धूम्राक्ष को सेना सहित भेजा, जो देवी द्वारा सेना सहित मार दिया गया। फिर चण्ड-मुण्ड लड़ने आये और वे भी मार डाले गये। इसके बाद रक्तबीज लड़ने आया, जिसके रक्त की एक बूँद जमीन पर गिरने से एक वीर पैदा होता था। वह बहुत बलवान था। उसे भी देवी ने मार गिराया।

अन्त में चामुण्डा से शुम्भ-निशुम्भ स्वयं दोनों लड़ने आये और देवी के हाथों मारे गये। सभी देवता दैत्यों की मृत्यु के बाद बहुत खुश हुए और अपना-अपना कार्य करने लगे।          

  1. Yogmaya, योगमाया :-

अब कंस ने वसुदेव-देवकी के छह पुत्रों का वध कर दिया था और सातवें गर्भ में शेषनाग बलराम जी आये जो रोहिणी के गर्भ में प्रवेश होकर प्रकट हुए। तब आठवाँ जन्म श्री कृष्ण जी का हुआ। साथ ही साथ गोकुल में यशोदा जी के गर्भ में योगमाया का जन्म हुआ जो वसुदेव जी के द्वारा कृष्ण के बदले मथुरा में लाई गई थीं।

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