Durga Devi Stuti / दुर्गा देवी स्तुति

Durga Devi Stuti
दुर्गा देवी स्तुति

Durga Devi Stuti, दुर्गा देवी स्तुति :- हे जगत् की माता ! हे देवि ! तुम्हारी जय हो, जय हो। देवता, मनुष्य, मुनि और असुर सभी तुम्हारी सेवा करते हैं। तुम भोग और मोक्ष दोनों को ही देनेवाली हो। भक्तों का भय दूर करने के लिये तुम कालिका हो। कल्याण, सुख और सिद्धियों की स्थान हो। तुम्हारा सुन्दर मुख पूर्णिमा के चन्द्र के सदृश है। तुम आध्यात्मिक, अधिभौतिक और आधिदैविक ताप रूपी अन्धकार का नाश करने के लिये मध्याह्न के तरूण सूर्य की किरण माला हो।  

जय जय जगजननि देवि सुर-नर-मुनि-असुर-सेवि,
भुक्ति-मुक्ति-दायिनी, भय-हरणि कालिका ।
मंगल-मुद-सिद्धि-सदनि, पर्वशर्वरीश-वदनि,
ताप-तिमिर-तरुण-तरणि-किरणमालिका ।। 1 ।।

अर्थात् :- हे जगत् की माता ! हे देवि ! तुम्हारी जय हो, जय हो। देवता, मनुष्य, मुनि और असुर सभी तुम्हारी सेवा करते हैं। तुम भोग और मोक्ष दोनों को ही देनेवाली हो। भक्तों का भय दूर करने के लिये तुम कालिका हो। कल्याण, सुख और सिद्धियों की स्थान हो। तुम्हारा सुन्दर मुख पूर्णिमा के चन्द्र के सदृश है। तुम आध्यात्मिक, अधिभौतिक और आधिदैविक ताप रूपी अन्धकार का नाश करने के लिये मध्याह्न के तरूण सूर्य की किरण माला हो।

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वर्म-चर्म कर कृपाण, शूल-शेल-धनुषबाण,
धरणि, दलनि दानव-दल, रण-करालिका ।
पूतना-पिशाच-प्रेत-डाकिनी-शाकिनि-समेत,
भूत-ग्रह-बेताल-खग-मृगालि-जालिका ।। 2 ।।

अर्थात् :- तुम्हारे शरीर पर कवच है। तुम हाथों में ढाल-तलवार, त्रिशूल, साँगी और धनुष-बाण लिये हो। दानवों के दल का संहार करने वाली हो, रण में विकराल रूप धारण कर लेती हो। तुम पूतना, पिशाच, प्रेत और डाकिनी-शाकिनियों के सहित भूत, ग्रह और बेताल रूपी पक्षी मृगों के समूह को पकड़ने के लिये जाल रूप हो।

जय महेश-भवानी, अनेक-रूप-नामिनी,
समस्त-लोक-स्वामिनी, हिमशैल-बालिका ।
रघुपति-पद परम प्रेम, तुलसी यह अचल नेम,
देहु ह्वै प्रसन्न पाहि प्रणत-पालिका ।। 3 ।।

अर्थात् :- हे शिवे ! तुम्हारी जय हो। तुम्हारे अनेक रूप और नाम हैं। तुम समस्त संसार की स्वामिनी और हिमाचल की कन्या हो। हे शरणागत की रक्षा करने वाली ! मैं तुलसीदास रघुनाथजी के चरणों में परम प्रेम और अचल नेम चाहता हूँ, सो प्रसन्न होकर मुझे दो और मेरी रक्षा करो।

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