Durga Saptashati Pancham Adhyay / सप्तशती पंचम अध्याय

Sri Durga Saptashati Pancham Adhyay
श्री दुर्गा सप्तशती पंचम अध्याय

देवताओं द्वारा देवी की स्तुति, चण्ड-मुण्ड के मुख से अम्बिका के रूप की प्रशंसा सुनकर शुम्भ का उनके पास दूत भेजना और दूत का निराश लौटना, Devtaon Dvara Devi Ki Stuti, Chanda-Munda Ke Mukh Se Ambika Ke Rup Ki Prashansa Sunkar Shumbh Ka Unke Paas Dut Bhejna Aur Dut Ka Nirash Lautna.

विनियोगः

ॐ अस्य श्रीउत्तरचरित्रस्य रूद्र ऋषिः, महासरस्वती देवता, अनुष्टुप् छन्दः, भीमा शक्तिः, भ्रामरी बीजम्, सूर्यस्तत्त्वम्, सामवेदः स्वरुपम्, महासरस्वतीप्रीत्यर्थे उत्तरचरित्रपाठे विनियोगः।

तात्पर्य — ॐ इस उत्तर चरित्र के रूद्र ऋषि हैं, महासरस्वती देवता हैं, अनुष्टुप् छन्द है, भीमा शक्ति है, भ्रामरी बीज है, सूर्य तत्त्व है और सामवेद स्वरुप है। महासरस्वती की प्रसन्नता के लिये उत्तर चरित्र के पाठ में इसका विनियोग किया जाता है।

ध्यानम्

ॐ घण्टाशूलहलानि शङ्खमुसले चक्रं धनुः सायकं
हस्ताबजैर्दधतीं घनान्तविलसच्छीतांशुतुल्यप्रभाम् ।
गौरीदेहसमुद्भवां त्रिजगतामाधारभूतां महा-
पूर्वामत्र सरस्वतीमनुभजे शुम्भादिदैत्यार्दिनीम् ।।

तात्पर्य — जो अपने कर कमलों में घण्टा, शूल, हल, शंख, मूसल, चक्र, धनुष और बाण धारण करती हैं, शरद् ऋतु के शोभा सम्पन्न चन्द्रमा के समान जिनकी मनोहर कान्ति है, जो तीनों लोकों की आधारभूता और शुम्भ आदि दैत्यों का नाश करने वाली हैं तथा गौरी के शरीर से जिनका प्राकट्य हुआ है, उन महासरस्वती देवी का मैं निरन्तर भजन करता हूँ।

‘ ॐ क्लीं ‘ ऋषिरुवाच ।। 1 ।।

पुरा शुम्भनिशुम्भाभ्यामसुराभ्यां शचीपतेः ।
त्रैलोक्यं यज्ञभागाश्च हृता मदबलाश्रयात् ।। 2 ।।

तात्पर्य — ऋषि कहते हैं — पूर्वकाल में शुम्भ और निशुम्भ नामक असुरों ने अपने बल के घमंड में आकर शचीपति इन्द्र के हाथ से तीनों लोकों का राज्य और यज्ञ भाग छीन लिये।

तावेव सूर्यतां तद्वदधिकारं तथैवन्दवम् ।
कौबेरमथ याम्यं च चक्राते वरुणस्य च ।। 3 ।।

तावेव पवनर्द्धिं च चक्रतुर्वह्निकर्म च ।
ततो देवा विनिर्धूता भ्रष्टराज्याः पराजिताः ।। 4 ।।

हृताधिकारास्त्रिदशास्ताभ्यां सर्वे निराकृताः ।
महासुराभ्यां तां देवीं संस्मरन्त्यपराजितम् ।। 5 ।।

तयास्माकं वरो दत्तो यथाऽऽपत्सु स्मृताखिलाः ।
भवतां नाशयिष्यामि तत्क्षणात्परमापदः ।। 6 ।।

तात्पर्य — वे ही दोनों सूर्य, चन्द्रमा, कुबेर, यम और वरुण के अधिकार का भी उपयोग करने लगे। उन दोनों ने सब देवताओं को अपमानित, राज्यभ्रष्ट, पराजित तथा अधिकार हीन करके स्वर्ग से निकाल दिया। उन दोनों महान् असुरों से तिरस्कृत देवताओं ने अपराजिता देवी का स्मरण किया और सोचा — ‘ जगदम्बा ने हम-लोगों को वर दिया था कि आपत्ति काल में स्मरण करने पर मैं तुम्हारी सब आपत्तियों का तत्काल नाश कर दूँगी।’

 इति कृत्वा मतिं देवा हिमवन्तं नगेश्वरम् ।
जग्मुस्तत्र ततो देवीं विष्णुमायां प्रतुष्टुवुः ।। 7 ।।

तात्पर्य — यह विचार कर देवता गिरिराज हिमालय पर गये और वहाँ भगवती विष्णु माया की स्तुति करने लगे।

देवा ऊचुः ।। 8 ।।

नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः ।
नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्म ताम् ।। 9 ।।

तात्पर्य — देवता बोले — देवी को नमस्कार है , महादेवी शिवा को सर्वदा नमस्कार है। प्रकृति एवं भद्रा को प्रणाम है। हमलोग नियम पूर्वक जगदम्बा को नमस्कार करते हैं।

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  1. श्रीदुर्गासप्तशती पाठविधिः
  2. तन्त्रोक्तं रात्रिसूक्तम्

रौद्रायै नमो नित्यायै गौर्ये धात्र्यै नमो नमः ।
ज्योत्स्नायै चेन्दुरूपिण्यै सुखायै सततं नमः ।। 10 ।।

तात्पर्य — रौद्रा को नमस्कार है। नित्या, गौरी एवं धात्री को बारम्बार नमस्कार है। ज्योत्स्नामयी, चन्द्ररूपिणी एवं सुखस्वरूपा देवी को सतत प्रणाम है।

कल्याण्यै प्रणतां वृद्ध्यै सिद्ध्यै कुर्मो नमो नमः ।
नैर्ऋत्यै भूभृतां लक्ष्म्यै शर्वाण्यै ते नमो नमः ।। 11 ।।

तात्पर्य — शरणागतों का कल्याण करने वाली वृद्धि एवं सिद्धि रूपा देवी को हम बारंबार नमस्कार करते हैं। नैर्ऋती ( राक्षसों की लक्ष्मी ), राजाओं की लक्ष्मी तथा शर्वाणी (शिवपत्नी)- स्वरूपा आप जगदम्बा को बार-बार नमस्कार है।

दुर्गायै दुर्गपारायै सारायै सर्वकारिण्यै ।
ख्यात्यै तथैव कृष्णायै धूम्रायै सततं नमः ।। 12 ।।

तात्पर्य — दुर्गा, दुर्गपारा ( दुर्गम संकट से पार उतारने वाली ), सारा ( सबकी सारभूता ), सर्वकारिणी, ख्याति, कृष्णा और धूम्रा देवी को सर्वदा नमस्कार है।

अतिसौम्यातिरौद्रायै नतास्तस्यै नमो नमः
नमो जगत्प्रतिष्ठायै देव्यै कृत्यै नमो नमः ।। 13 ।।

तात्पर्य — अत्यन्त सौम्य तथा अत्यन्त रौद्र रूपा देवी को हम नमस्कार करते हैं, उन्हें हमारा बारंबार नमस्कार है।

या देवी सर्वभूतेषु विष्णुमायेति शब्दिता ।
नमस्तस्यै।।14।। नमस्तस्यै।।15।। नमस्तस्यै नमो नमः ।। 16 ।।

तात्पर्य — जो देवी सब प्राणियों में विष्णुमाया के नाम से कही जाती हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है।

या देवी सर्वभूतेषु चेतनेत्यभिधीयते ।
नमस्तस्यै।।17।। नमस्तस्यै।।18।। नमस्तस्यै नमो नमः ।। 19 ।।

तात्पर्य — जो देवी सब प्राणियों में चेतना कहलाती हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है।

या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै।।20।। नमस्तस्यै।।21।। नमस्तस्यै नमो नमः ।। 22 ।।

तात्पर्य — जो देवी सब प्राणियों में बुद्धि रूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है।

या देवी सर्वभूतेषु निद्रारूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै।।23।। नमस्तस्यै।।24।। नमस्तस्यै नमो नमः ।। 25 ।।

तात्पर्य — जो देवी सब प्राणियों में निद्रा रूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है।

या देवी सर्वभूतेषु क्षुधारूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै।।26।। नमस्तस्यै।।27।। नमस्तस्यै नमो नमः ।। 28 ।।

तात्पर्य — जो देवी सब प्राणियों में क्षुधा रूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है।

या देवी सर्वभूतेषु सर्वभूतेषुच्छायारूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै।।29।। नमस्तस्यै।।30।। नमस्तस्यै नमो नमः ।। 31 ।।

तात्पर्य — जो देवी सब प्राणियों में छाया रूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है।

या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै।।32।। नमस्तस्यै।।33।। नमस्तस्यै नमो नमः ।। 34 ।।

तात्पर्य — जो देवी सब प्राणियों में शक्ति रूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है।

या देवी सर्वभूतेषु तृष्णारूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै।।35।। नमस्तस्यै।।36।। नमस्तस्यै नमो नमः ।। 37 ।।

तात्पर्य — जो देवी सब प्राणियों में तृष्णा रूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है।

या देवी सर्वभूतेषु क्षान्तिरूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै।।38।। नमस्तस्यै।।39।। नमस्तस्यै नमो नमः ।। 40 ।।

तात्पर्य — जो देवी सब प्राणियों में क्षान्ति (क्षमा)- रूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है।

या देवी सर्वभूतेषु जातिरूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै।।41।। नमस्तस्यै।।42।। नमस्तस्यै नमो नमः ।। 43 ।।

तात्पर्य — जो देवी सब प्राणियों में जाति रूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है।

या देवी सर्वभूतेषु लज्जारूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै।।44।। नमस्तस्यै।।45।। नमस्तस्यै नमो नमः ।। 46 ।।

तात्पर्य — जो देवी सब प्राणियों में लज्जा रूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है।

या देवी सर्वभूतेषु शान्तिरूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै।।47।। नमस्तस्यै।।48।। नमस्तस्यै नमो नमः ।। 49 ।।

तात्पर्य — जो देवी सब प्राणियों में शान्ति रूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है।

या देवी सर्वभूतेषु श्रद्धारूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै।।50।। नमस्तस्यै।।51।। नमस्तस्यै नमो नमः ।। 52 ।।

तात्पर्य — जो देवी सब प्राणियों में श्रद्धा रूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है।

या देवी सर्वभूतेषु कान्तिरूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै।।53।। नमस्तस्यै।।54।। नमस्तस्यै नमो नमः ।। 55 ।।

तात्पर्य — जो देवी सब प्राणियों में कान्ति रूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है।

या देवी सर्वभूतेषु लक्ष्मीरूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै।।56।। नमस्तस्यै।।57।। नमस्तस्यै नमो नमः ।। 58 ।।

तात्पर्य — जो देवी सब प्राणियों में लक्ष्मी रूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है।

या देवी सर्वभूतेषु वृत्तिरूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै।।59।। नमस्तस्यै।।60।। नमस्तस्यै नमो नमः ।। 61 ।।

तात्पर्य — जो देवी सब प्राणियों में वृत्ति रूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है।

या देवी सर्वभूतेषु स्मृतिरूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै।।62।। नमस्तस्यै।।63।। नमस्तस्यै नमो नमः ।। 64 ।।

तात्पर्य — जो देवी सब प्राणियों में स्मृति रूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है।

या देवी सर्वभूतेषु दयारूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै।।65।। नमस्तस्यै।।66।। नमस्तस्यै नमो नमः ।। 67 ।।

तात्पर्य — जो देवी सब प्राणियों में दया रूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है।

या देवी सर्वभूतेषु तुष्टिरूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै।।68।। नमस्तस्यै।।69।। नमस्तस्यै नमो नमः ।। 70 ।।

तात्पर्य — जो देवी सब प्राणियों में तुष्टि रूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है।

या देवी सर्वभूतेषु मातृरूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै।।71।। नमस्तस्यै।।72।। नमस्तस्यै नमो नमः ।। 73 ।।

तात्पर्य — जो देवी सब प्राणियों में माता रूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है।

या देवी सर्वभूतेषु भ्रान्तिरूपेण संस्थिता ।
नमस्तस्यै।।74।। नमस्तस्यै।।75।। नमस्तस्यै नमो नमः ।। 76 ।।

तात्पर्य — जो देवी सब प्राणियों में भ्रान्ति रूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है।

इन्द्रियाणामधिष्ठात्री भूतानां चाखिलेषु या ।
भूतेषु सततं तस्यै व्याप्तिदेव्यै नमो नमः ।। 77 ।।

तात्पर्य — जो जीवों के इन्द्रिय वर्ग की अधिष्ठात्री देवी एवं सब प्राणियों में सदा व्याप्त रहने वाली हैं, उन व्याप्ति देवी को बारंबार नमस्कार है।

चितिरूपेण या कृत्स्नमेतद् व्याप्य स्थिता जगत् ।
नमस्तस्यै।।78।। नमस्तस्यै।।79।। नमस्तस्यै नमो नमः ।। 80 ।।

तात्पर्य — तात्पर्य — जो देवी चैतन्य रूप से इस सम्पूर्ण जगत् को व्याप्त करके स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारंबार नमस्कार है।

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