Dussehra Vijayadashami / दशहरा विजयादशमी

Dussehra Vijayadashami
दशहरा विजयादशमी


Dussehra Vijayadashami, दशहरा विजयादशमी :- यह पर्व आश्विन शुक्ल पक्ष दशमी को मनाया जाता है। भगवान् राम ने इसी दिन लंका पर चढ़ाई करके विजय प्राप्त की थी। ‘ ज्योतिर्निबन्ध ‘ में लिखा है कि आश्विन शुक्ला दशमी को तारा उदय होने के समय ‘ विजय ‘ नामक काल होता है। वह सब कार्यों को सिद्ध करने वाला होता है। विजया दशमी हमारा राष्ट्रीय पर्व है। मुख्य रूप से यह क्षत्रियों का त्यौहार है। दशमी के दिन रामचन्द्र जी की झांकी बड़ी सजधज के साथ निकलती है और रावण-वध की लीला का प्रदर्शन होता है। इस दिन नीलकष्ठ का दर्शन बहुत शुभ माना जाता है।

दशहरा विजयादशमी कथा :-

कथा के अनुसार, एक बार पार्वती जी ने पूछा कि लोगों में जो दशहरे का त्यौहार प्रचलित है, इसका क्या फल है ? शिवजी ने बताया कि आश्विन शुक्ल दशमी को सांयकाल में तारा उदय होने के समय ‘ विजय ‘ नामक काल होता है जो सब इच्छाओं को पूर्ण करने वाला होता है। शत्रु पर विजय प्राप्त करने वाले राजा को इसी समय प्रस्थान करना चाहिये। इस दिन यदि श्रवणा नक्षत्र का योग हो तो और भी शुभ है। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् रामचन्द्र ने इसी विजयकाल में लंका पर चढ़ाई की थी। इसलिए यह दिन बहुत पवित्र माना गया है और क्षत्रिय लोग इसे अपना प्रमुख त्यौहार मानते हैं। शत्रु से युद्ध करने का प्रसंग न होने पर भी इस काल में राजाओ को अपनी सीमा के पार अवश्य यात्रा करनी चाहिये। अपने तमाम दल-बल को सुसज्जित करके पूर्व दिशा में जाकर शमी वृक्ष का पूजन करना चाहिये। पूजन करने वाला शमी के सामने खड़ा होकर इस प्रकार ध्यान करे — हे शमी ! तू सब पापों को नष्ट करने वाला है और शत्रुओं को भी पराजय देने वाला है। तूने अर्जुन का धनुष धारण किया और रामचन्द्र जी से प्रियवाणी कही।

पार्वती जी बोलीं — शमी वृक्ष ने अर्जुन का धनुष कब और किस कारण धारण किया था, तथा रामचन्द्र जी से कब और कैसी प्रियवाणी कही थी, सो कृपाकर समझाइये।

और पढ़ें

Leave a Comment

error: Content is protected !!