Fal Sahit Varna Dharm Ka Vishay / फल सहित वर्ण धर्म का विषय

अध्याय अठारह उपसंहार

Fal Sahit Varna Dharm Ka Vishay
फल सहित वर्ण धर्म का विषय

Fal Sahit Varna Dharm Ka Vishay, फल सहित वर्ण धर्म का विषय- हे परन्तप ! ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों तथा शूद्रों में प्रकृति के गुणों के अनुसार उनके स्वभाव द्वारा उत्पन्न गुणों के द्वारा भेद किया जाता है। शान्तिप्रियता, आत्मसंयम, तपस्या, पवित्रता, सहिष्णुता, सत्यनिष्ठा, ज्ञान, विज्ञान तथा धार्मिकता — ये सारे स्वाभाविक गुण हैं, जिनके द्वारा ब्राह्मण कर्म करते हैं। वीरता, शक्ति, संकल्प, दक्षता, युद्ध में धैर्य, उदारता तथा नेतृत्व — ये क्षत्रियों के स्वाभाविक गुण हैं।

श्लोक 41 से 48

ब्राह्मणक्षत्रियविशां श्रुद्राणां च परन्तप ।
कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः ।। 41 ।।

ब्राह्मण — ब्राह्मण ; क्षत्रिय — क्षत्रिय ; विशाम् — तथा वैश्यों को ; शूद्राणाम् — शूद्रों को ; च — तथा ; परन्तप — हे शत्रुओं के विजेता ; कर्माणि — कार्यकलाप ; प्रविभक्तानि — विभाजित हैं ; स्वभाव — अपने स्वभाव से ; प्रभवैः — उत्पन्न ; गुणैः — गुणों के द्वारा ।

तात्पर्य — हे परन्तप ! ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों तथा शूद्रों में प्रकृति के गुणों के अनुसार उनके स्वभाव द्वारा उत्पन्न गुणों के द्वारा भेद किया जाता है।

शमो दमस्तपः शौचं क्षान्तिरार्जवमेव च
ज्ञानं विज्ञानमास्तिक्यं ब्रह्मकर्म स्वभावजम् ।। 42 ।।

शमः — शान्तिप्रियता ; दमः — आत्मसंयम ; तपः — तपस्या ; शौचम् — पवित्रता ; क्षान्तिः — सहिष्णुता ; आर्जवम् — सत्यनिष्ठा ; एव — निश्चय ही ; च — तथा ; ज्ञानम् — ज्ञान ; विज्ञानम् — विज्ञान ; आस्तिक्यम् — धार्मिकता ; ब्रह्म — ब्राह्मण का ; कर्म — कर्तव्य ; स्वभाव-जम् — स्वभाव से उत्पन्न, स्वाभाविक।

तात्पर्य — शान्तिप्रियता, आत्मसंयम, तपस्या, पवित्रता, सहिष्णुता, सत्यनिष्ठा, ज्ञान, विज्ञान तथा धार्मिकता — ये सारे स्वाभाविक गुण हैं, जिनके द्वारा ब्राह्मण कर्म करते हैं।

शौर्यं तेजो धृतिर्दाक्ष्यं युद्धे चाप्यपलायनम् ।
दानमीश्वरभावश्च क्षात्रं कर्म स्वभावजम् ।। 43 ।।  

शौर्यम् — वीरता ; तेजः — शक्ति ; धृतिः — संकल्प, धैर्य ; दाक्ष्यम् — दक्षता ; युद्धे — युद्ध में ; च — तथा ; अपि — भी ; अपलायनम् — विमुख न होना ; दानम् — उदारता ; ईश्वर — नेतृत्व का ; भावः — स्वभाव ; च — तथा ; क्षात्रम् — क्षत्रिय का ; कर्म — कर्तव्य ; स्वभाव-जम् — स्वभाव से उत्पन्न, स्वाभाविक ।

तात्पर्य — वीरता, शक्ति, संकल्प, दक्षता, युद्ध में धैर्य, उदारता तथा नेतृत्व — ये क्षत्रियों के स्वाभाविक गुण हैं ।

कृषिगोरक्ष्यवाणिज्यं वैश्यकर्म स्वभावजम् ।
परिचर्यात्मकं कर्म क्षुद्रस्यापि स्वभावजम् ।। 44 ।।  

कृषि — हल जोतना ; गो — गायों की ; रक्ष्य — रक्षा ; वाणिज्यम् — व्यापार ; वैश्य — वैश्य का ; कर्म — कर्तव्य ; स्वभाव-जम् — स्वाभाविक ; परिचर्या — सेवा ; आत्मकम् — से युक्त ; कर्म — कर्तव्य ; क्षुद्रस्य — शूद्र के ; अपि — भी ; स्वभाव-जम् — स्वाभाविक ।

तात्पर्य — कृषि करना, गो-रक्षा तथा व्यापार वैश्यों के स्वाभाविक कर्म हैं और शूद्रों का कर्म श्रम तथा अन्यों की सेवा करना है।

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  2. अध्याय अठारह — उपसंहार – सन्यास की सिद्धि
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स्वे स्वे कर्मण्यभिरतः संसिद्धिं लभते नरः
स्वकर्मनिरतः सिद्धिं यथा विन्दति तच्छृणु ।। 45 ।।

स्वे स्वे — अपने अपने ; कर्मणि — कर्म में ; अभिरतः — संलग्न ; संसिद्धिम् — सिद्धि को ; लभते — प्राप्त करता है ; नरः — मनुष्य ; स्व-कर्म — अपने कर्म में ; निरतः — लगा हुआ ; सिद्धिम् — सिद्धि को ; यथा — जिस प्रकार ; विन्दति — प्राप्त करता है ; तत् — वह ; शृणु — सुनो ।

तात्पर्य — अपने-अपने कर्म के गुणों का पालन करते हुए प्रत्येक व्यक्ति सिद्ध हो सकता है। अब तुम मुझसे सुनो कि यह किस प्रकार किया जा सकता है।

यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् ।
स्वकर्मणा तमभ्यच्र्य सिद्धिं विन्दति मानवः ।। 46 ।।

यतः — जिससे ; प्रवृत्तिः — उद्भव ; भूतानाम् — समस्त जीवों का ; येन — जिससे ; सर्वम् — समस्त ; इदम् — यह ; ततम् — व्याप्त है ; स्व-कर्मणा — अपने कर्म से ; तम् — उसको ; अभ्यच्र्य — पूजा करके ; सिद्धिम् — सिद्धि को ; विन्दति — प्राप्त करता है ; मानवः — मनुष्य।

तात्पर्य — जो सभी प्राणियों का उद्गम है और सर्वव्यापी है, उस भगवान् की उपासना करके मनुष्य अपना कर्म करते हुए पूर्णता प्राप्त कर सकता है।

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् ।
स्वभावनियतं कर्म कुर्वन्नाप्नोति किल्बिषम् ।। 47 ।।  

श्रेयान् — श्रेष्ठ ; स्व-धर्मः — अपना वृत्तिपरक कार्य ; विगुणः — भली भाँति सम्पन्न न होकर ; पर-धर्मात् — दूसरे के वृत्तिपरक कार्य से ; सु-अनुष्ठितात् — भलीभाँति किया गया ; स्वभाव-नियतम् — स्वभाव के अनुसार संस्तुत ; कर्म — कर्म ; कुर्वन् — करने से ; न — कभी नहीं ; आप्नोति — प्राप्त करता है ; किल्बिषम् — पापों का ।

तात्पर्य — अपने वृत्तिपरक कार्य को करना, चाहे वह कितना ही त्रुटिपूर्ण ढंग से क्यों न किया जाय, अन्य किसी के कार्य को स्वीकार करने और अच्छी प्रकार से करने की अपेक्षा अधिक श्रेष्ठ है। अपने स्वभाव के अनुसार निर्दिष्ट कर्म कभी भी पाप से प्रभावित नहीं होते।

सहजं कर्म कौन्तेय सदोषमपि न त्यजेत् ।
सर्वारम्भा हि दोषेण धुमेनाग्निरिवावृताः ।। 48 ।।

सह-जम् — एकसाथ उत्पन्न ; कर्म — कर्म ; कौन्तेय — हे कुन्तीपुत्र ; स-दोषम् — दोषयुक्त ; अपि — यद्यपि ; न — कभी नहीं ; त्यजेत् — त्यागना चाहिए ; सर्व-आरम्भाः — सारे उद्योग ; हि — निश्चय ही ; दोषेण — दोष से ; धूमेन — धुएँ से ; अग्निः — अग्नि ; इव — सदृश ; आवृताः — ढके हुए।

तात्पर्य — प्रत्येक उद्योग ( प्रयास ) किसी न किसी दोष से आवृत होता है, जिस प्रकार अग्नि धुएँ से आवृत रहती है। अतएव हे कुन्तीपुत्र ! मनुष्य को चाहिए कि स्वभाव से उत्पन्न कर्म को, भले ही वह दोषपूर्ण क्यों न हो, कभी त्यागे नहीं ।

आगे के श्लोक :–

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