Ganesh Chaturthi Vrat Katha / गणेश चतुर्थी व्रत कथा

Ganesh Chaturthi Vrat Katha Aur Puja Vidhi
गणेश चतुर्थी व्रत कथा और पूजा विधि


Ganesh Chaturthi Vrat Katha Aur Puja Vidhi, गणेश चतुर्थी व्रत कथा और पूजा विधि :- यह व्रत माघ कृष्ण पक्ष चौथ को किया जाता है। इसी दिन विद्या-बुद्धि-वारिधि गणेश तथा चन्द्रमा की पूजा करनी चाहिए।

गणेश चतुर्थी पूजा विधि :-

दिन भर व्रत रहने के बाद सांयकाल चन्द्र दर्शन होने पर दूध का अर्घ्य देकर चन्द्रमा की विधिवत् पूजा की जाती है। गौरी-गणेश की स्थापना पर उनका पूजन तथा वर्ष भर उन्हें घर में रखा जाता है। नैवेद्य सामग्री, तिल, ईख, गंजी, अमरुद, गुड़ तथा घी से चन्द्रमा एवं गणेश को भोग लगाया जाता है।

नैवेद्य रात्रिभर डलिया इत्यादि से ढँककर यथावत् रख दिया जाता है, जिसे ‘ पहार ‘ कहते हैं। पुत्रवती माताएँ पुत्र तथा पति की सुख-समृद्धि के लिए व्रत रहती हैं। सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उस ढँके हुए ‘ पहार ‘ को पुत्र ही खोलता है तथा भाई-बन्धुओं में बाँटा जाता है, जिससे प्रेम-भावना स्थायी होता है ।

गणेश चतुर्थी व्रत कथा :-

एक बार विपदाग्रस्त देवता लोग भगवान् शंकर के पास गये। उस समय भगवान् शिव के सम्मुख स्वामी कार्तिकेय तथा गणेश भी विराजमान थे। शिवजी ने दोनों बालकों से पूछा — तुममें से कौन ऐसा वीर है जो देवताओं का कष्ट निवारण करे ? तब कार्तिकेय ने अपने को देवताओं का सेनापति प्रमाणित करते हुए देवरक्षा योग्य तथा सर्वोच्च देवपद मिलने का अधिकारी सिद्ध किया। यही बात शिवजी ने गणेश जी की इच्छा जाननी चाही। तब गणेश जी ने विनम्र भाव से कहा कि पिताजी, आपकी आज्ञा हो तो मैं बिना सेनापति बने ही सब संकट दूर कर सकता हूँ। बड़ा देवता बनावें या न बनावे, इसकी मुझे लिप्सा नहीं।

यह सुन हँसते हुए शिव ने दोनों लड़कों को पृथ्वी की परिक्रमा करने को कहा तथा यह शर्त राखी कि जो सबसे पहले पूरी पृथ्वी की परिक्रमा करके आ जायेगा वही वीर तथा सर्वश्रेष्ठ योद्धा घोषित किया जायेगा। यह सुनते ही कार्तिकेय बड़े गर्व से अपने वाहन मोर पर चढ़ कर पृथ्वी की परिक्रमा करने चल दिये। गणेश जी ने समझा कि चूहे के बल पर पूरी पृथ्वी का चक्कर लगाना अत्यन्त कठिन है इसलिए उन्होंने एक युक्ति सोची।

और पढ़ें

Leave a Comment

error: Content is protected !!