Ganpati Stotram / गणपति स्तोत्रम्

Ganpati Stotram
गणपति स्तोत्रम्


द्विरदानन विघ्नकाननज्वलन त्वं प्रमथेशनन्दन ।

मदनप्रतिमाखुवाहन ज्वलनाभासितपिङ्गलोचन ।। 1 ।।

अर्थात् :- हाथी के समान मुखवाले ! विघ्नरूपी वन के लिये अग्नितुल्य, प्रमथगणों के स्वामी भगवान् शिव के पुत्र ! कामदेव के समान स्वरुप वाले ! मूषक पर सवारी करने वाले ! जलती हुई अग्नि के समान पीले नेत्रवाले  ! आप मेरी रक्षा करें।

अहिबन्धन रक्तचन्दनप्रिय दूर्वांकुरभारपूजन ।
शशिभूषण भक्तपालन ज्वलनाक्षावनिजान्निजावन ।। 2 ।।

अर्थात् :- सर्प का बन्धन धारण करने वाले ! रक्तचन्दनप्रिय ! दूर्वांकुर समूह से पूजित होने वाले ! चन्द्रमा को आभूषण के रूप में धारण करने वाले ! भक्तों का पालन करने वाले ! अग्निसदृश नेत्रवाले हे गणेश ! आप अपने भक्तों की रक्षा किजिये।

विविधामरमर्त्यनायकः प्रथितस्तवं भुवने विनायकः ।
तव कोऽपि हि नैव नायकस्तत एव त्वमजो विनायकः ।। 3 ।।

अर्थात् :- आप अनेक देवताओं तथा मनुष्यों के नायक हैं, इसलिये सम्पूर्ण विश्व में आपके विनायक नाम की प्रसिद्धि है। आपका कोई भी नायक नहीं है, अतएव आप अजन्मा हैं और विनायक हैं।

बलिनिग्रह ईश केशवस्त्रिपुराख्यासुरनिग्रहे शिवः ।
जगदुद्भवनेऽब्जसम्भवः सकलाञ्जेतुमहो मनोभावः ।। 4 ।।

अर्थात् :- हे ईश्वर ! आपने [ दैत्यराज ] बलिका निग्रह करने के लिये [ वामनरूप ] भगवान् विष्णु का रूप धारण किया, त्रिपुर नामक असुर का संहार करने के लिये शिव का रूप धारण किया, जगत् की सृष्टि करने के लिये आपने कमलोद्भव ब्रह्मा का रूप धारण किया और सम्पूर्ण संसार को जीतने के लिये अहो ! आपने कामदेव का रूप धारण किया।

महिषासुरनिग्रहे शिवा भवमुक्तयै मुनयो धुताशिवाः ।
यमपूजयदिष्टसिद्धये वरदो मे भव चेष्टसिद्धये ।। 5 ।।

अर्थात् :- महिषासुर के मर्दनकाल में आपने भगवान् शिव की महाशक्ति बन दुर्गा का रूप धारण किया। संसार को मुक्ति देने के लिये तथा समस्त अमंगलों को दूर करने के लिये आपने ही अमलाशय मुनियों का रूप बनाया। इष्टसिद्धि के लिये जिनकी पूजा की जाती है, वे वर देनेवाले विनायक भगवान् मेरा मनोरथ पूर्ण करें।

गजकर्णक मूषकस्थिते वरदे त्वय्यभये हृदि स्थिते ।
जयलाभरमेष्टसम्पदः खलु सर्वत्र कुतो वदापदः ।। 6 ।।

अर्थात् :- हे हाथी के समान कान वाले ! मूषक पर विराजमान, वरदायक तथा अभय प्रदान करने वाले आप गणेश के भक्त-हृदय में स्थित रहने पर सर्वत्र जय, लाभ, लक्ष्मी तथा वांछित सम्पदाएँ अवश्य विद्यमान रहती हैं; बताइये, फिर वहाँ आपदाएँ कहाँ से रह सकती है ?

सङ्कल्पितं कार्यमविघ्नमीश द्राक्सिद्धिमायातु ममाखिलेश ।
पापत्रयं मे हर सन्मतीश तापत्रयं मे जहि शान्त्यधीश ।। 7 ।।

अर्थात् :- हे ईश ! हे अखिलेश ! मेरा संकल्पित कार्य अतिशीघ्र सिद्धि को प्राप्त हो। हे बुद्धिमानों के स्वामी ! आप मेरे [ कायिक, वाचिक, मानसिक ] तीनों प्रकार के पापों का हरण करें। हे शान्ति के स्वामी ! आप मेरे [ दैहिक, दैविक, भौतिक ] तीनों प्रकार के तापों का हरण करें।

गणाधीशोऽधीशो हरिहरविधिशोऽभयकरो ।
गुणाधीशो धीशो विजयतु उमाहृत्सुखकरः ।

बुधाधीशोऽनीशो निजभजकविघ्नौघहरणौ
मुदाधीशोऽपीशो यशस उभयर्धेश्च शरणम् ।। 8 ।।

अर्थात् :- गणों के स्वामी, सबके अधीश्वर, ब्रह्मा-विष्णु-महेश के अधिपति, अभय प्रदान करने वाले, गुणों के अधीश, बुद्धि के स्वामी तथा पार्वती के हृदय में आनन्द उत्पन्न करने वाले [ गणेश ] – की जय हो। बुद्धिमानों के अधिपति, अनीश्वर, अपने भक्तों के विघ्नसमूहों का हरण करने वाले, आनन्द के अधीश्वर तथा यश और ऋद्धि- दोनों के स्वामी गणेशजी की मैं शरण ग्रहण करता हूँ।

।। इस प्रकार श्रीवासुदेवानन्दसरस्वतीविरचित गणपतिस्तोत्र सम्पूर्ण हुआ ।।

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