Govardhan Puja Vrat Katha / गोवर्धन पूजा व्रत कथा और पूजा

Govardhan Puja Vrat Katha Aur Puja Vidhi
गोवर्धन पूजा व्रत कथा और पूजा विधि


Govardhan Puja Vrat Katha Aur Puja Vidhi, गोवर्धन पूजा व्रत कथा और पूजा विधि :- कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा की ( दिवाली के अगले दिन ) अन्नकूट उत्सव मनाया जाता है। इसी दिन बलि पूजा, गोवर्धन पूजा, मार्गपाली आदि होते हैं।

गोवर्धन पूजा विधि:-

इस दिन गोबर का अन्नकूट बनाकर या उसके समीप विराजमान श्रीकृष्ण के सम्मुख गाय तथा ग्वाल-बालों की पूजा की जाती है। यह ब्रजवासियों का मुख्य त्यौहार है। इस दिन मंदिरों में विविध प्रकार की खाद्य-सामग्रियों से भगवान् का भोग लगाया जाता है।

गोवर्धन व्रत कथा:-

एक दिन भगवान् कृष्ण ने देखा कि पूरे ब्रज में तरह-तरह  मिष्टान्न तथा पकवान बनाये जा रहे हैं। पूछने पर ज्ञात हुआ कि वृत्रासुर-संहारक, मेघ देवता, देवराज इन्द्र की पूजा के लिए यह तैयारी हो रही है। इन्द्र की प्रसन्नता से ही वर्षा होती है, गायों को चारा मिलता है तथा जीविकोपार्जन की समस्या हल होती है।

यह सुनकर भगवान् श्रीकृष्ण ने इन्द्र की निन्दा करते हुए कहा कि उस देवता की पूजा करनी चाहिये जो प्रत्यक्ष आकर पूजन-सामग्री स्वीकार करे। गोपों ने यह वचन सुनकर कहा कि कोटि-कोटि देवताओं के राजा की इस तरह से आपको निन्दा नहीं करनी चाहिए। कृष्ण ने कहा — इन्द्र में क्या शक्ति है जो पानी बरसा कर हमारी सहायता करेगा ? उससे तो शक्तिशाली तथा सुन्दर यह गोवर्धन पर्वत है, जो वर्षा का मूल कारण है, इसी की हमें पूजा करनी चाहिए। भगवान श्रीकृष्ण के वाग्जाल में फँसकर सभी ब्रजवासियों ने घर जाकर गोवर्धन-पूजा के लिए चारों ओर धूम मचा दी। तत्पश्चात् नन्द जी ने ग्वाल, गोपांगनाओं सहित एक सभा में कृष्ण से पूछा कि — ‘ इन्द्र — पूजन से तो दुर्भिक्ष-उत्पीड़न समाप्त होगा। चौमासे के सुन्दर दिन आयेंगे, मगर गोवर्धन-पूजा से क्या लाभ होगा ? उत्तर में श्रीकृष्ण जी ने गोवर्धन की भूरि-भूरि प्रशंसा की तथा गोप-गोपियों की आजीविका का एकमात्र सहारा सिद्ध किया। भगवान् की बात सुनकर समस्त ब्रजमण्डल बहुत प्रभावित हुआ तथा अपने घर जाकर सुमधुर मिष्टान्न पकवानों सहित पर्वत तराई में कृष्ण द्वारा बनाई विधि से गोवर्धन की पूजा की।

भगवान की कृपा से ब्रजवनिताओं द्वारा अर्पित समस्त पूजन सामग्री को गिरिराज ने स्वीकार करते हुए खूब आशीर्वाद दिया ! सभी जन अपना पूजन सफल समझ प्रसन्न हो रहे थे, तभी नारद इन्द्र-महोत्सव देखने की इच्छा से ब्रज आ गये। पूछने पर ब्रज-नागरिकों ने बताया कि श्रीकृष्ण की आज्ञा से इस वर्ष इन्द्र-महोत्सव समाप्त कर दिया गया है। उसके स्थान पर गोवर्धन-पूजा की जा रही है। यह सुनते ही नारद उलटे पाँव इन्द्रलोक गये तथा खिन्नमुख मुद्रा में बोले — हे राजन् ! तुम महलों में सुख की नींद की खुमारी ले रहे हो, उधर ब्रज-मंडल में तुम्हारी पूजा समाप्त करके गोवर्धन की पूजा की जा रही है।

और पढ़ें

Leave a Comment

error: Content is protected !!