Gufa Mein Tapaswini Ke Darshan / गुफा में तपस्विनी के दर्शन

श्रीरामचरितमानस किष्किन्धाकाण्ड

Gufa Mein Tapaswini Ke Darshan
गुफा में तपस्विनी के दर्शन

Gufa Mein Tapaswini Ke Darshan, गुफा में तपस्विनी के दर्शन :- पवनकुमार हनुमान् जी पर्वत से उतर आये और सबको ले जाकर उन्होंने वह गुफा दिखलायी। सबने हनुमान् जी को आगे कर लिया और वे गुफा में घुस गये, देर नहीं की। अंदर जाकर उन्होने एक उत्तम उपवन ( बगीचा ) और तालाब देखा, जिसमें बहुत-से कमल खिले हुए हैं। वहीं एक सुन्दर मन्दिर है, जिसमें एक तपोमूर्ति स्त्री बैठी है। मलोग आँखें मूँद लो और गुफा को छोड़कर बाहर जाओ। तुम सीताजी को पा जाओगे, पछताओं नहीं ( निराश न होओ )। आँखें मूँदकर फिर जब आँखें खोलीं तो सब वीर क्या देखते हैं कि सब समुद्र के तीर पर खड़े हैं।   

कतहुँ होइ निसिचर सैं भेटा। प्रान लेहिं एक एक चपेटा ।।
बहु प्रकार गिरि कानन हेरहिं। कोउ मुनि मिलइ ताहि सब घेरहिं ।।

अर्थात् :- कहीं किसी राक्षस से भेंट हो जाती है, तो एक-एक चपत में ही उसके प्राण ले लेते हैं। पर्वतों और वनों को बहुत प्रकार से खोज रहे हैं। कोई मुनि मिल जाता है तो पता पूछने के लिये उसे सब घेर लेते हैं। 

लागि तृषा अतिसय अकुलाने। मिलइ न जल घन गहन भुलाने ।।
मन हनुमान कीन्ह अनुमाना। मरन चहत सब बिनु जल पाना ।।

अर्थात् :- इतने में ही सबको अत्यन्त प्यास लगी, जिससे सब अत्यन्त ही व्याकुल हो गये। किन्तु जल कहीं नहीं मिला। घने जंगलों में सब भुला गये। हनुमान् जी ने मन में अनुमान किया कि जल पिये बिना सब लोग मरना ही चाहते हैं। 

चढ़ि गिरि सिखर चहूँ दिसि देखा। भूमि बिबर एक कौतुक पेखा ।।
चक्रबाक बक हंस उड़ाहीं। बहुतक खग प्रबिसहिं तेहि माहीं ।।

अर्थात् :- उन्होंने पहाड़ की चोटी पर चढ़कर चारों ओर देखा तो पृथ्वी के अंदर एक गुफा में उन्हें एक कौतुक ( आश्चर्य ) दिखायी दिया। उसके ऊपर चकवे, बगुले और हंस उड़ रहे हैं और बहुत-से पक्षी उसमें प्रवेश कर रहे हैं। 

गिरि ते उतरि पवनसुत आवा। सब कहुँ लै सोइ बिबर देखावा ।।
आगें कै हनुमंतहि लीन्हा। पैठे बिबर बिलंबु न कीन्हा ।।

अर्थात् :- पवनकुमार हनुमान् जी पर्वत से उतर आये और सबको ले जाकर उन्होंने वह गुफा दिखलायी। सबने हनुमान् जी को आगे कर लिया और वे गुफा में घुस गये, देर नहीं की। 

दो० — दीख जाइ उपबन बर सर बिगसित बहु कंज ।
मंदिर एक रुचिर तहँ बैठि नारि तप पुंज ।। 24 ।।

अर्थात् :- अंदर जाकर उन्होने एक उत्तम उपवन ( बगीचा ) और तालाब देखा, जिसमें बहुत-से कमल खिले हुए हैं। वहीं एक सुन्दर मन्दिर है, जिसमें एक तपोमूर्ति स्त्री बैठी है। 

दूरि ते ताहि सबन्हि सिरु नावा। पूछें निज बृत्तांत सुनावा ।।
तेहिं तब कहा करहु जल पाना। खाहु सुरस सुंदर फल नाना ।।

अर्थात् :- दूर से ही सबने उसे सिर नवाया और पूछने पर अपना सब वृतान्त कह सुनाया। तब उसने कहा – जलपान करो और भाँति-भाँति के रसीले सुन्दर फल खाओ। 

मज्जनु कीन्ह मधुर फल खाए। तासु निकट पुनि सब चलि आए ।।
तेहिं सब आपनि कथा सुनाई। मैं अब जाब जहाँ रघुराई ।।

अर्थात् :- [ आज्ञा पाकर ] सबने स्नान किया, मीठे फल खाये और फिर सब उसके पास चले आये। तब उसने अपनी सब कथा कह सुनायी [ और कहा – ] मैं अब वहाँ जाऊँगी जहाँ श्रीरघुनाथजी हैं। 

मूदहु नयन बिबर तजि जाहू। पैहहु सीतहि जनि पछिताहू ।।
नयन मूदि पुनि देखहिं बीरा। ठाढ़े सकल सिंधु कें तीरा ।।

अर्थात् :- तुमलोग आँखें मूँद लो और गुफा को छोड़कर बाहर जाओ। तुम सीताजी को पा जाओगे, पछताओं नहीं ( निराश न होओ )। आँखें मूँदकर फिर जब आँखें खोलीं तो सब वीर क्या देखते हैं कि सब समुद्र के तीर पर खड़े हैं।  

सो पुनि गई जहाँ रघुनाथा। जाइ कमल पद नाएसि माथा ।।
नाना भाँति बिनय तेहिं किन्ही। अनपायनी भगति प्रभु दीन्ही ।।

अर्थात् :- और स्वयं वहाँ गयी जहाँ श्रीरघुनाथजी थे। उसने जाकर प्रभु के चरणकमलों में मस्तक नवाया और बहुत प्रकार से विनती की। प्रभु ने उसे अपनी अनपायिनी ( अचल ) भक्ति दी। 

दो० — बदरीबन कहुँ सो गई प्रभु अग्या धरि सीस ।
उर धरि राम चरन जुग जे बंदत अज ईस ।। 25 ।।

अर्थात् :- प्रभु की आज्ञा सिर पर धारण कर और श्रीरामजी के युगल चरणों को, जिनकी ब्रह्मा और महेश भी वन्दना करते हैं, हृदय में धारणकर वह ( स्वयंप्रभा ) बदरिका श्रम को चली गयी। 

इहाँ बिचारहिं कपि मन माहीं। बीती अवधि काज कछु नाहीं ।।
सब मिलि कहहिं परस्पर बाता। बिनु सुधि लएँ करब का भ्राता ।।

अर्थात् :- यहाँ वानरगण मन में विचार रहे हैं कि अवधि तो बीत गयी ; पर काम कुछ न हुआ। सब मिलकर आपस में बात करने लगे कि हे भाई ! अब तो सीताजी की खबर लिये बिना लौटकर भी क्या करेंगे ?

कह अंगद लोचन भरि बारी। दुहुँ प्रकार भइ मृत्यु हमारी ।।
इहाँ न सुधि सीता कै पाई। उहाँ गएँ मारिहि कपिराई ।।

अर्थात् :- अंगद ने नेत्रों में जल भरकर कहा कि दोनों ही प्रकार से हमारी मृत्यु हुई। यहाँ तो सीताजी की सुध नहीं मिली और वहाँ जाने पर वानरराज सुग्रीव मार डालेंगे। 

पिता बधे पर मारत मोही। राखा राम निहोर न ओही ।।
पुनि पुनि अंगद कह सब पाहीं। मरन भयउ कछु संसय नाहीं ।।

अर्थात् :- वे तो पिता के वध होने पर ही मुझे मार डालते। श्रीरामजी ने मेरी रक्षा की, इसमें सुग्रीव का कोई एहसान नहीं है। अंगद बार-बार सबसे कह रहे हैं कि अब मरण हुआ, इसमें कुछ भी सन्देह नहीं है। 

अंगद बचन सुनत कपि बीरा। बोलि न सकहिं नयन बह नीरा ।।
छन एक सोच मगन होइ रहे। पुनि अस बचन कहत सब भाए ।।

अर्थात् :- वानर वीर अंगद के वचन सुनते हैं ; किन्तु कुछ बोल नहीं सकते। उनके नेत्रों से जल बह रहा है। एक क्षण के लिये सब सोच में मग्न हो रहे। फिर सब ऐसा वचन कहने लगे। – 

हम सीता कै सुधि लीन्हें बिना। नहिं जैहैं जुबराज प्रबीना ।।
अस कहि लवन सिंधु तट जाई। बैठे कपि सब दर्भ डसाई ।।

अर्थात् :- हे सुयोग्य युवराज ! हमलोग सीताजी की खोज के बिना नहीं लौटेंगे। ऐसा कहकर लवणसागर के तटपर जाकर सब वानर कुछ बिछाकर बैठ गये। 

जामवंत अंगद दुख देखी। कहीं कथा उपदेस बिसेषी ।।
तात राम कहुँ नर जनि मानहु। निर्गुन ब्रह्म अजित अज जानहु ।।

अर्थात् :- जाम्बवान् जी ने अंगद का दुःख देखकर विशेष उपदेश की कथाएँ कहीं। [ वे बोले – ] हे तात ! श्रीरामजी को मनुष्य न मानो, उन्हें निर्गुण ब्रह्म, अजेय और अजन्मा समझो। 

हम सब सेवक अति बड़भागी। संतत सगुन ब्रह्म अनुरागी ।।

अर्थात् :- हम सब सेवक अत्यन्त बड़भागी हैं, जो निरन्तर सगुण ब्रह्म ( श्रीरामजी ) में प्रीति रखते हैं। 

दो० — निज इच्छाँ प्रभु अवतरइ सुर महि गो द्विज लागि ।
सगुन उपासक संग तहँ रहहिं मोच्छ सब त्यागि ।। 26 ।।

अर्थात् :- देवता, पृथ्वी, गौ और ब्राह्मणों के लिये प्रभु अपनी इच्छा से [ किसी कर्मबन्धन से नहीं ] अवतार लेते हैं। वहाँ सगुणोपासक [ भक्तगण सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य, सार्ष्टि और सासुज्य ] सब प्रकार के मोक्षों को त्यागकर उनकी सेवा में साथ रहते हैं। 

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