Guru Purnima Vrat Katha / गुरु पूर्णिमा व्रत कथा

Guru Purnima Vrat Katha Aur Puja Vidhi
गुरु पूर्णिमा व्रत कथा और पूजा विधि


Guru Purnima Vrat Katha Aur Puja Vidhi, गुरु पूर्णिमा व्रत कथा और पूजा विधि :- गुरु पूर्णिमा आषाढ़ शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को मनाया जाता है। गुरु पूर्णिमा को ” व्यासपूर्णिमा ” के नाम से भी जाना जाता है। प्राचीन काल में विद्यार्थी जब गुरुकुलों में निःशुल्क शिक्षा-दीक्षा प्राप्त करते थे, उस समय इस पूजा का आयोजन धूमधाम से होता था। अब भी गुरु पूजा का बहुत महत्वपूर्ण स्थान है।

गुरु पूर्णिमा का महत्त्व :-

धर्म शास्त्रों या किसी भी वेद-पुराण को पढ़ा या देखा जाए तो यह समझ आता है कि जीवन में गुरु का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है क्योंकि बिना गुरु भगवान् नहीं मिल सकते। सनातन धर्म में गुरु की महिमा का बखान अलग-अलग स्वरूपों में हुआ है।

गुरु का अर्थ :-

शास्त्रों में ‘ गु ‘ का अर्थ – अंधकार और ‘ रु ‘ का अर्थ – उसका निरोधक बताया गया है। गुरु अर्थात जो अपने शिष्य को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाए। प्राचीन काल में शिष्य विद्यार्थी जब गुरुकुलों में निःशुल्क शिक्षा-दीक्षा प्राप्त करते थे, उस समय इस पूजा का आयोजन धूमधाम से होता था। अब भी गुरु की पूजा का काफी प्रचलन है। इसलिए इस दिन गुरु पूजन होता है। प्रातः काल स्नानादि नित्य कर्मों से निवृत होकर गुरु के पास जाना चाहिये तथा उन्हें उच्चासन पर बैठाकर माल्यार्पण करना चाहिए। यथाशक्ति द्रव्य, फल, पुष्प, वस्त्र आदि दान करना चाहिए। इससे गुरु कृपा से विद्या आती है।

गुरु पूर्णिमा कथा :-

भारतीय संस्कृति में गुरु को देवता तुल्य माना गया है। गुरु को हमेशा से ही ब्रह्मा, विष्णु और महेश के समान पूज्य माना गया है। वेद, उपनिषद और पुराणों का प्रणयन करने वाले वेद व्यास जी को समस्त मानव जाति का गुरु माना जाता है। महर्षि वेदव्यास का जन्म आषाढ़ पूर्णिमा लगभग 3000 ई० पूर्व में हुआ था।

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