Gyan Ki Mahima Aur Prakriti / ज्ञान की महिमा और प्रकृति

अध्याय चौदह प्रकृति के तीन गुण

Gyan Ki Mahima Aur Prakriti Purush Se Jagat Ki Utpatti
ज्ञान की महिमा और प्रकृति पुरुष से जगत् की उत्पत्ति

Gyan Ki Mahima Aur Prakriti Purush Se Jagat Ki Utpatti, ज्ञान की महिमा और प्रकृति पुरुष से जगत् की उत्पत्ति- भगवान् ने कहा- अब मैं तुमसे समस्त ज्ञानों में सर्वश्रेष्ठ इस परम ज्ञान को पुनः कहूँगा, जिसे जान लेने पर समस्त मुनियों ने परम सिद्धि प्राप्त की है। इस ज्ञान में स्थिर होकर मनुष्य मेरी जैसी दिव्य प्रकृति ( स्वभाव ) को प्राप्त कर सकता है। इस प्रकार स्थित हो जाने पर वह न तो सृष्टि के समय उत्पन्न होता है और न प्रलय के समय विचलित होता है । हे भरतपुत्र ! 

श्लोक 1 से 4

श्रीभगवानुवाच — 
परं भूयः प्रवक्ष्यामि ज्ञानानां ज्ञानमुत्तमम् ।
यज्ज्ञात्वा मुनयः सर्वे परां सिद्धिमितो गताः ।। 1 ।।

श्री-भगवान्-उवाच — भगवान् ने कहा ; परम् — दिव्य ; भूयः — फिर ; प्रवक्ष्यामि — कहूँगा ; ज्ञानानाम् — समस्त ज्ञान  का ;ज्ञानम् — ज्ञान ; उत्तमम् — सर्वश्रेष्ठ ; यत् — जिसे ; ज्ञात्वा — जानकर ; मुनयः — मुनि लोग ; सर्वे — समस्त ; पराम् — दिव्य ; सिद्धिम् — सिद्धि को ; इतः — इस संसार से ; गताः — प्राप्त किया । 

तात्पर्य — भगवान् ने कहा — अब मैं तुमसे समस्त ज्ञानों में सर्वश्रेष्ठ इस परम ज्ञान को पुनः कहूँगा, जिसे जान लेने पर समस्त मुनियों ने परम सिद्धि प्राप्त की है।

इदं ज्ञानमुपाश्रित्य मम साधर्म्यमागताः
सर्गेऽपि नोपजायन्ते प्रलये न व्यथन्ति च ।। 2 ।।

इदम् — इस ; ज्ञानम् — ज्ञान को ; उपाश्रित्य — आश्रय बनाकर ; मम — मेरा ; साधर्म्यम् — समान प्रकृति को ; आगताः — प्राप्त करके ; सर्गे अपि — सृष्टि में भी ; न — कभी नहीं ; उपजायन्ते — उत्पन्न होते हैं ; प्रलये — प्रलय में ; न — न तो ; व्यथन्ति — विचलित होते हैं ; च — भी ।

तात्पर्य — इस ज्ञान में स्थिर होकर मनुष्य मेरी जैसी दिव्य प्रकृति ( स्वभाव ) को प्राप्त कर सकता है। इस प्रकार स्थित हो जाने पर वह न तो सृष्टि के समय उत्पन्न होता है और न प्रलय के समय विचलित होता है ।

इसे भी पढ़ें :–

  1. अध्याय बारह — भक्तियोग
  2. अध्याय तेरह — प्रकृति, पुरुष तथा चेतना
  3. अध्याय पन्द्रह — पुरुषोत्तम योग

मम योनिर्महद्ब्रह्म तस्मिन्गर्भं दधाम्यहम् ।
सम्भवः सर्वभूतानां ततो भवति भारत ।। 3 ।।

मम — मेरा ; योनिः — जन्म, स्त्रोत ; महत् — सम्पूर्ण भौतिक जगत् ; ब्रह्म — परम ; तस्मिन् — उसमें ; गर्भम् — गर्भ ; दधामि — उत्पन्न कारता हूँ ; अहम् — मैं ; सम्भवः — सम्भावना ; सर्व-भूतानाम् — समस्त जीवों का ; ततः — तत्पश्चात् ; भवति — होता हैं ; भारत — हे भरत पुत्र ।

तात्पर्य — हे भरतपुत्र ! ब्रह्म नामक समग्र भौतिक वस्तु जन्म का स्त्रोत है  इसी ब्रह्म का गर्भस्थ करता हूँ, जिससे समस्त जीवों का जन्म सम्भव होता है ।

सर्वयोनिषु कौन्तेय मूर्तयः सम्भवन्ति याः ।
तासां ब्रह्म महद्योनिरहं बीजप्रदः पिता ।। 4 ।।

सर्व-योनिषु — समस्त योनियों में ; कौन्तेय — हे कुन्तीपुत्र ; मूर्तयः — स्वरूप ; सम्भवन्ति — प्रकट होते हैं ; याः — जो ; तासाम् — उन सबों का ; ब्रह्म — परम ; महत् योनिः — जन्म स्त्रोत ; अहम् — मैं ; बीज-प्रदः — बीजप्रदाता ; पिता — पिता ।  

तात्पर्य — हे कुन्तीपुत्र ! तुम यह समझ लो कि समस्त प्रकार की जीव-योनियाँ इस भौतिक प्रकृति में जन्म द्वारा सम्भव हैं और मैं उनका बीज-प्रदाता पिता हूँ ।

आगे के श्लोक :–

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