Gyan Sahit Kshetra Kshetragya / ज्ञान सहित क्षेत्र क्षेत्र

अध्याय तेरह प्रकृति, पुरुष तथा चेतना

Gyan Sahit Kshetra Kshetragya Ka Vishay
ज्ञान सहित क्षेत्र क्षेत्रज्ञ का विषय

Gyan Sahit Kshetra Kshetragya Ka Vishay, ज्ञान सहित क्षेत्र क्षेत्रज्ञ का विषय- विनम्रता, दम्भहीनता, अहिंसा, सहिष्णुता, सरलता, प्रामाणिक गुरु के पास जाना, पवित्रता, स्थिरता, आत्मसंयम, इन्द्रियतृप्ति के विषयों का परित्याग, अहंकार का भाव, जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था तथा रोग के दोषों की अनुभूति, वैराग्य, सन्तान, स्त्री, घर तथा अन्य वस्तुओं की ममता से मुक्ति, अच्छी तथा बुरी घटनाओं के प्रति समभाव, मेरे प्रति निरन्तर अनन्य भक्ति, एकान्त स्थान में रहने की इच्छा, जन समूह से विलगाव, आत्म-साक्षात्कार की महत्ता को स्वीकारना तथा परम सत्य की दार्शनिक खोज — इन सबको मैं ज्ञान घोषित करता हूँ और इनके अतिरिक्त जो भी है, वह सब अज्ञान है।

श्लोक 1 से 18

अर्जुन उवाच — 
प्रकृतिं पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च ।
एतद्वेदितुमिच्छामि ज्ञानं ज्ञेयं च केशव ।। 1 ।।

श्रीभगवानुवाच — 
इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते

एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः ।। 2 ।।

अर्जुनः उवाच — अर्जुन ने कहा; प्रकृतिम् — प्रकृति; पुरुषम् — भोक्ता; च — भी; एव — निश्चय ही; क्षेत्रम् — क्षेत्र, खेत; क्षेत्र-ज्ञम् — खेत को जानने वाला; एव — निश्चय ही; च — भी; एतत् — यह सारा; वेदितुम् — जानने के लिए; इच्छामि — इच्छुक हूँ ; ज्ञानम् — ज्ञान; ज्ञेयम् — ज्ञान का लक्ष्य; च — भी; केशव — हे कृष्ण; श्री-भगवान् उवाच — भगवान् ने कहा; इदम् — यह; शरीरम् — शरीर; कौन्तेय — हे कुन्तीपुत्र; क्षेत्रम् — खेत; इति — इस प्रकार; अभिधीयते — कहलाता है; एतत् — यह; यः — जो; वेत्ति — जानता है; तम् — उसको; प्राहुः — कहा जाता है; क्षेत्र-ज्ञः — खेत को जानने वाला; इति — इस प्रकार; तत्-विदः — इसे जानने वालों के द्वारा ।

तात्पर्य — अर्जुन ने कहा — हे कृष्ण ! मैं प्रकृति एवं पुरुष ( भोक्ता ), क्षेत्र एवं क्षेत्रज्ञ तथा ज्ञान एवं ज्ञेय के विषय में जानने का इच्छुक हूँ।
श्रीभगवान् ने कहा — हे कुन्तीपुत्र ! यह शरीर क्षेत्र कहलाता है और इस क्षेत्र को जानने वाला क्षेत्रज्ञ है।

क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत ।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं उत्तज्ज्ञानं मतं मम ।। 3 ।।

क्षेत्र-ज्ञम् — क्षेत्र का ज्ञाता; च — भी; अपि — निश्चय ही; माम् — मुझको; विद्धि — जानो; सर्व — समस्त; क्षेत्रेषु — शरीर रूपी क्षेत्रों में ; भारत — हे भरत के पुत्र; क्षेत्र — कर्म-क्षेत्र ( शरीर ); क्षेत्र-ज्ञयोः — तथा क्षेत्र के ज्ञाता का; ज्ञानम् — ज्ञान; यत् — जो; तत् — वह; ज्ञानम् — ज्ञान; मतम् — अभिमत; मम — मेरा।

तात्पर्य — हे भरतवंशी ! तुम्हें ज्ञात होना चाहिए कि मैं भी समस्त शरीरों में ज्ञात भी हूँ और इस शरीर तथा इसके ज्ञाता को जान लेना ज्ञान कहलाता है। ऐसा मेरा मत है।

तत्क्षेत्रं यच्च यादृक्च यद्विकारि यतश्च यत् ।
स च यो यत्प्रभावश्च तत्समासेन मे शृणु ।। 4 ।।

तत् — वह; क्षेत्रम् — कर्मक्षेत्र; यत् — जो; च — भी; यादृक् — जैसा है; च — भी; यत् — जो; विकारि — परिवर्तन; यतः — जिससे; च — भी ; यत् — जो; सः — वह; च — भी ; यः — जो; यत् — जो; प्रभावः — प्रभाव; च — भी ; तत् — उस; समासेन — संक्षेप में ; मे — मुझसे; शृणु — समझो, सुनो।

तात्पर्य — अब तुम मुझसे यह सब संक्षेप में सुनो कि कर्मक्षेत्र क्या है, यह किस प्रकार बना है, इसमें क्या परिवर्तन होते हैं, यह कहाँ से उत्पन्न होता है, इस कर्मक्षेत्र को जानने वाला कौन है और उसके क्या प्रभाव हैं।

 ऋषिभिर्बहुधा गीतं छन्दोभिर्विविधैः पृथक् ।
ब्रह्मसूत्रपदैश्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितैः ।। 5 ।।

ऋषिभिः — बुद्धिमान ऋषियों द्वारा; बहुधा — अनेक प्रकार से; गीतम् — वर्णित; छन्दोभिः — वैदिक मन्त्रों द्वारा; विविधैः — नाना प्रकार के; पृथक् — भिन्न-भिन्न; ब्रह्म-सूत्र — वेदान्त के; पदैः — नीतिवचनों द्वारा; च — भी; एव — निश्चित रूप से; हेतु-मद्भिः — कार्य-कारण से; विनिश्चितैः — निश्चित। 

तात्पर्य — विभिन्न वैदिक ग्रंथों में विभिन्न ऋषियों ने कार्यकलापों के क्षेत्र तथा उन कार्यकलापों के ज्ञाता के ज्ञान का वर्णन किया है। इसे विशेष रूप से वेदान्त सूत्र में कार्य-कारण के समस्त तर्क समेत प्रस्तुत किया गया है।

इसे भी पढ़ें :–

  1. अध्याय ग्यारह — विराट रूप
  2. अध्याय बारह — भक्तियोग
  3. अध्याय चौदह — प्रकृति के तीन गुण

 महाभूतान्यहङ्कारो बुद्धिरव्यक्तमेव च ।
इन्द्रियाणि दशैकं च पञ्च चेन्द्रियगोचराः ।। 6 ।।

इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं सङ्घातश्चेतना धृतिः ।
एतत्क्षेत्रं समासेन सविकारमुदाहृतम् ।। 7 ।।

महा-भूतानि — स्थूल तत्त्व; अहङ्कारः — मिथ्या अभिमान; बुद्धिः — बुद्धि; अव्यक्तम् — अप्रकट; एव — निश्चय ही; च — भी; इन्द्रियाणि — इन्द्रियाँ; दश-एकम् — ग्यारह; च — भी; पञ्च — पाँच; च — भी; इन्द्रिय-गो-चराः — इन्द्रियों के विषय; इच्छा — इच्छा; द्वेषः — घृणा; सुखम् — सुख; दुःखम् — दुःख; सङ्घातः — समूह; चेतना — जीवन के लक्षण; धृतिः — धैर्य; एतत् — यह सारा; क्षेत्रम् — कर्मों का क्षेत्र; समासेन — संक्षेप में ; स-विकारम् — अन्तः क्रियाओं सहित; उदाहृतम् — उदाहरणस्वरूप कहा गया।

तात्पर्य — पंच महाभूत, अहंकार, बुद्धि, अव्यक्त ( तीनों गुणों की अप्रकट अवस्था ), दसों इन्द्रियाँ तथा मन, पाँच इन्द्रियविषय, इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, संघात, जीवन के लक्षण तथा धैर्य — इन सब को संक्षेप में कर्म का क्षेत्र तथा उसकी अन्तः क्रियाएँ ( विकार ) कहा जाता है।

अमानित्वमदम्भित्वमहिंसाक्षान्तिरार्जवम् ।
आचार्योपासनं शौचं स्थैर्यमात्मविनिग्रहः ।। 8 ।।

इन्द्रियार्थेषु वैराग्यमनहङ्कार एव च ।
जन्ममृत्युजराव्याधिदुःखदोषानुदर्शनम् ।। 9 ।।

असक्तिरनभिष्वङ्ग पुत्रदारगृहादिषु ।
नित्यं च समचित्तत्वमिष्टानिष्टोपपत्तिषु ।। 10 ।।

मयि चानन्ययोगेन भक्तिरव्यभिचारिणी ।
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदि ।। 11 ।।

अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम् ।
एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा ।। 12 ।।

अमानित्वम् — विनम्रता; अदम्भित्वम् — दम्भविहीनता; अहिंसा — अहिंसा; क्षान्तिः — सहनशीलता, सहिष्णुता; आर्जवम् — सरलता; आचार्य-उपासनम् — प्रामाणिक गुरु के पास जाना; शौचम् — पवित्रता; स्थैर्यम् — दृढ़ता; आत्म-विनिग्रहः — आत्म संयम; इन्द्रिय-अर्थेषु — इन्द्रियों के मामले में ; वैराग्यम् — वैराग्य; अनहङ्कारः — मिथ्या अभिमान से रहित; एव — निश्चय ही; च — भी; जन्म — जन्म; मृत्यु — मृत्यु; जरा — बुढ़ापा; व्याधि — तथा रोग का; दुःख — दुःख का; दोष — बुराई; अनुदर्शनम् — देखते हुए; असक्तिः — बिना आसक्ति के; अनभिष्वङ्गः — बिना संगति के; पुत्र — पुत्र; दार — स्त्री; गृह-आदिषु — घर आदि में ; नित्यम् — निरन्तर; च — भी; सम-चित्तवत्वम् — समभाव; इष्ट — इच्छित; अनिष्ट — अवांछित; उपपत्तिषु — प्राप्त करके; मयि — मुझ में ; च — भी; अनन्य-योगेन — अनन्य भक्ति से; भक्तिः — भक्ति; अव्यभिचारिणी — बिना व्यवधान के; विविक्त — एकान्त; देश — स्थानों की; सेवित्वम् — आकांक्षा करते हुए; अरतिः — अनासक्त भाव से; जन-संसदि — सामान्य लोगों को; अध्यात्म — आत्मा सम्बन्धी; ज्ञान — ज्ञान में ; नित्यत्वम् — शाश्वतता; तत्त्व-ज्ञान — सत्य के ज्ञान के; अर्थ — हेतु; दर्शनम् — दर्शनशास्त्र; एतत् —  यह सारा; ज्ञानम् — ज्ञान; इति — इस प्रकार; प्रोक्तम् — घोषित; अज्ञानम् — अज्ञान; यत् —  जो; अतः — इससे; अन्यथा — अन्य, इतर। 

तात्पर्य — विनम्रता, दम्भहीनता, अहिंसा, सहिष्णुता, सरलता, प्रामाणिक गुरु के पास जाना, पवित्रता, स्थिरता, आत्मसंयम, इन्द्रियतृप्ति के विषयों का परित्याग, अहंकार का भाव, जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था तथा रोग के दोषों की अनुभूति, वैराग्य, सन्तान, स्त्री, घर तथा अन्य वस्तुओं की ममता से मुक्ति, अच्छी तथा बुरी घटनाओं के प्रति समभाव, मेरे प्रति निरन्तर अनन्य भक्ति, एकान्त स्थान में रहने की इच्छा, जन समूह से विलगाव, आत्म-साक्षात्कार की महत्ता को स्वीकारना तथा परम सत्य की दार्शनिक खोज — इन सबको मैं ज्ञान घोषित करता हूँ और इनके अतिरिक्त जो भी है, वह सब अज्ञान है।

 ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वामृतमश्रनुते ।
अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते ।। 13 ।।

ज्ञेयम् — जानने योग्य; यत् — जो; तत् — वह; प्रवक्ष्यामि — अब मैं बतलाऊँगा ; यत् — जिसे; ज्ञात्वा — जानकर; अमृतम् — अमृत को; अश्रनुते — आस्वादन करता है; अनादि — आदि रहित; मत्-परम् — मेरे अधीन; ब्रह्म — आत्मा; न — न तो; सत् — कारण; तत् — वह; न — न तो; असत् — कार्य, प्रभाव; उच्यते — कहा जाता है।

तात्पर्य — अब मैं तुम्हें ज्ञेय के विषय में बतलाऊँगा, जिसे जानकर तुम नित्य ब्रह्म का आस्वादन कर सकोगे। यह ब्रह्म या आत्मा, जो अनादि है और मेरे अधीन है, इस भौतिक जगत् के कार्य-कारण से परे स्थित है।

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