Prakriti Purush Ka Vishay / प्रकृति पुरुष का विषय

Gyan Sahit Prakriti Purush Ka Vishay
ज्ञान सहित प्रकृति पुरुष का विषय

Gyan Sahit Prakriti Purush Ka Vishay, ज्ञान सहित प्रकृति पुरुष का विषय- हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ ! यह जान लो कि चर तथा अचर, जो भी तुम्हें अस्तित्व में दीख रहा है, वह कर्मक्षेत्र तथा क्षेत्र के ज्ञाता का संयोग मात्र है। जो परमात्मा को समस्त शरीरों में आत्मा के साथ देखता है और जो यह समझता है कि इस नश्वर शरीर के भीतर न तो आत्मा, न ही परमात्मा कभी भी विनष्ट होता है, वही वास्तव में देखता है। 

श्लोक 19 से 35

इति क्षेत्रं तथा ज्ञानं ज्ञेयं समासतः ।
मद्भक्त एतद्विज्ञाय मद्भावायोपपद्यते ।। 19 ।।

इति — इस प्रकार; क्षेत्रम् — कर्म का क्षेत्र ( शरीर ) ; तथा — भी; ज्ञानम् — ज्ञान; ज्ञेयम् — जानने योग्य; च — भी; उक्तम् — कहा गया; समासतः — संक्षेप में ; मत्-भक्तः — मेरा भक्त; एतत् — यह सब; विज्ञाय — जान कर; मत्-भावाय — मेरे स्वभाव को; उपपद्यते — प्राप्त करता है।

तात्पर्य — इस प्रकार मैंने कर्म क्षेत्र ( शरीर ), ज्ञान तथा ज्ञेय का संक्षेप में वर्णन किया है। इसे केवल मेरे भक्त ही पूरी तरह समझ सकते हैं और इस तरह मेरे स्वभाव को प्राप्त होते हैं।

प्रकृतिं पुरुषं चैव विद्ध्यनादी उभावपि ।
विकारांश्च गुणांश्चैव विद्धि प्रकृतिसम्भवान् ।। 20 ।।

प्रकृतिम् — भौतिक प्रकृति को; पुरुषम् — जीव को; च — भी; एव — निश्चय ही; विद्धि — जानो; अनादी — आदिरहित; उभौ — दोनों ; अपि — भी; विकारान् — विकारों को; च — भी; गुणान् — प्रकृति के तीन गुण; च — भी; एव — निश्चय ही; विद्धि — जानो; प्रकृति — भौतिक प्रकृति से; सम्भवान् — उत्पन्न। 

तात्पर्य — प्रकृति तथा जीवों को अनादि समझना चाहिए। उनके विकार तथा गुण प्रकृतिजन्य हैं।

 कार्यकारणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते
पुरुषः सुखदुःखनां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते ।। 21 ।।

कार्य — कार्य; कारण — तथा कारण का; कर्तृत्वे — सृजन के मामले में ; हेतुः — कारण; प्रकृतिः — प्रकृति; उच्यते — कही जाती है ; पुरुषः — जीवात्मा; सुख — सुख; दुःखनाम् — तथा दुःख का; भोक्तृत्वे — भोग में ; हेतुः — कारण; उच्यते — कहा जाता है। 

तात्पर्य — प्रकृति समस्त भौतिक कारणों तथा कार्यों ( परिणामों ) की हेतु कही जाती है और जीव ( पुरुष ) इस संसार में विविध सुख-दुःख के भोग का कारण कहा जाता है।

 पुरुषः प्रकृतिस्ठो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान् ।
कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु ।। 22 ।।

पुरुषः — जीव; प्रकृति-स्थः — भौतिक शक्ति में स्थिर होकर; हि — निश्चय ही; भुङ्क्ते — भोगता है; प्रकृति-जान् — प्रकृति से उत्पन्न; गुणान् — गुणों को; कारणम् — कारण; गुण-सङ्ग — प्रकृति के गुणों की संगति; अस्य — जीव की; सत्-असत् — अच्छी तथा बुरी; योनि — जीवन की योनियाँ ; जन्मसु — जन्मों का।  

तात्पर्य — इस प्रकार जीव प्रकृति के तीनों गुणों का भोग करता हुआ प्रकृति में ही जीवन बिताता है। यह उस प्रकृति के साथ उसकी संगति के कारण है। इस तरह उसे उत्तम तथा अधम योनियाँ मिलती रहती हैं।

इसे भी पढ़ें —

  1. अध्याय बारह — भक्तियोग
  2. अध्याय तेरह — प्रकृति, पुरुष तथा चेतना
  3. 1 से 18 — ज्ञान सहित क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ का विषय

 उपद्रष्टानुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः ।
परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः ।। 23 ।।

उपद्रष्टा — साक्षी; अनुमन्ता — अनुमति देने वाला; च — भी; भर्ता — स्वामी; भोक्ता — परम भोक्ता; महा-ईश्वरः — परमेश्वर; परम-आत्मा — परमात्मा; इति — भी; च — तथा; अपि — निस्सन्देह; उक्तः — कहा गया है; देहे — शरीर में ; अस्मिन् — इस; पुरुषः — भोक्ता; परः — दिव्य। 

तात्पर्य — तो भी इस शरीर में एक अन्य दिव्य भोक्ता है, जो ईश्वर है, परम स्वामी है और साक्षी तथा अनुमति देने वाले के रूप में विद्यमान है और जो परमात्मा कहलाता है।

य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैः सह ।
सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते ।। 24 ।।

यः — जो; एवम् — इस प्रकार; वेत्ति — जानता है; पुरुषम् — जीव को; प्रकृतिम् — प्रकृति को; च — तथा; गुणैः — प्रकृति के गुणों के; सह — साथ; सर्वथा — सभी तरह से; वर्तमानः — स्थित होकर; अपि — निस्सन्देह; उक्तः — कहा गया है; देहे — शरीर में ; अस्मिन् — इस; पुरुषः — भोक्ता; परः — दिव्य। 

तात्पर्य — तो भी इस शरीर में एक अन्य दिव्य भोक्ता है, जो ईश्वर है, परम स्वामी है और साक्षी तथा अनुमति देने वाले के रूप में विद्यमान है और जो परमात्मा कहलाता है।

ध्यानेनात्मनि पश्यन्ति केचिदात्मानमात्मना ।
अन्ये सांख्येन योगेन कर्मयोगेन चापरे ।। 25 ।।

ध्यानेन — ध्यान के द्वारा; आत्मनि — अपने भीतर; पश्यन्ति — देखते हैं ; केचित् — कुछ लोग; आत्मनाम् — परमात्मा को; आत्मना — मन से; अन्ये — अन्य लोग; सङ्ख्येन — दार्शनिक विवेचना द्वारा; योगेन — योग पद्धति के द्वारा; कर्म-योगेन — निष्काम कर्म के द्वारा; च — भी; अपरे — अन्य। 

तात्पर्य — कुछ लोग परमात्मा को ध्यान के द्वारा अपने भीतर देखते हैं, तो दूसरे लोग ज्ञान के अनुशीलन द्वारा और कुछ ऐसे हैं, जो निष्काम कर्मयोग द्वारा देखते हैं।

अन्ये त्वेवमजानन्तः श्रुत्वान्येभ्य उपासते
तेऽपि चातितरन्त्येव मृत्युं श्रुतिपरायणाः ।। 26 ।।

अन्ये — अन्य लोग; तु — लेकिन; एवम् — इस प्रकार; अजानन्तः — आध्यात्मिक ज्ञान से रहित; श्रुत्वा — सुनकर; अन्येभ्यः — अन्यों से; उपासते — पूजा करना प्रारम्भ कर देते हैं ; ते — वे; अपि — भी; च — तथा; अतितरन्ति — पार कर जाते हैं ; एव — निश्चय ही; मृत्युम् — मृत्यु का मार्ग; श्रुति-परायणाः — श्रवण विधि के प्रति रूचि रखने वाले ।

तात्पर्य — ऐसे भी लोग हैं, जो यद्यपि आध्यात्मिक ज्ञान से अवगत नहीं होते पर अन्यों से परम पुरुष के विषय में सुनकर उनकी पूजा करने लगते हैं। ये लोग भी प्रामाणिक पुरुषों से श्रवण करने की मनोवृत्ति होने के कारण जन्म तथा मृत्यु के पथ को पार कर जाते हैं।

यावत्सञ्जायते किञ्चित्सत्त्वं स्थावरजङ्गमम् ।
क्षेत्रक्षेत्रज्ञसंयोगात्तद्विद्धि भरतर्षभ ।। 27 ।।

यावत् — जो भी; सञ्जायते — उत्पन्न होता है ; किञ्चित् — कुछ भी; सत्त्वम् — अस्तित्व; स्थावर — अचर; जङ्गमम् — चर; क्षेत्र — शरीर का; क्षेत्र-ज्ञ — तथा शरीर के ज्ञाता के; संयोगात् — संयोग ( जुड़ने ) से; तत् विद्धि — तुम उसे जानो; भरत-ऋषभ — हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ ।

तात्पर्य — हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ ! यह जान लो कि चर तथा अचर, जो भी तुम्हें अस्तित्व में दीख रहा है, वह कर्मक्षेत्र तथा क्षेत्र के ज्ञाता का संयोग मात्र है।

समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम् ।
विनश्यतस्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति ।। 28 ।।

समम् — समभाव से; सर्वेषु — समस्त; भूतेषु — जीवों में ; तिष्ठन्-तम् — वास करते हुए; परम-ईश्वरम् — परमात्मा को; विनश्यत्सु — नाशवान; अविनश्यन्तम् — नाशरहित; यः — जो; पश्यति — देखता है; सः — वही; पश्यति — वास्तव में देखता है।

तात्पर्य — जो परमात्मा को समस्त शरीरों में आत्मा के साथ देखता है और जो यह समझता है कि इस नश्वर शरीर के भीतर न तो आत्मा, न ही परमात्मा कभी भी विनष्ट होता है, वही वास्तव में देखता है ।

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