Gyan Yog Ka Vishay / ज्ञान योग का विषय

अध्याय पाँच कृष्णभावनाभावित कर्म

Gyan Yog Ka Vishay
ज्ञान योग का विषय

Gyan Yog Ka Vishay, ज्ञान योग का विषय। विनम्र साधुपुरुष अपने वास्तविक ज्ञान के कारण एक विद्वान् तथा विनीत ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ता तथा चाण्डाल को समान दृष्टि ( समभाव ) से देखते हैं। जिनके मन एकत्व तथा समता में स्थित हैं उन्होंने जन्म तथा मृत्यु के बंधनों को पहले ही जीत लिया है। वे ब्रह्म के समान निर्दोष हैं और सदा ब्रह्म में ही स्थित रहते हैं। 

श्लोक 13 से 26

सर्वकर्माणि मनसा सन्न्यस्यास्ते सुखं वशी ।
नवद्वारे पुरे देही नैव कुर्वन्न कारय ।। 13 ।।

सर्व — समस्त; कर्माणि — कर्मों का; मनसा — मन से; सन्न्यस्य — त्यागकर; आस्ते — रहता है; सुखम् — सुख में; वशी — संयमी; नव-द्वारे — नौ द्वारों वाले; पुरे — नगर में; देही — देहवान् आत्मा; न — नहीं; एव — निश्चय ही; कुर्वन् — करता हुआ; न — नहीं; कारयन् — कराता हुआ।

तात्पर्य — जब देहधारी जीवात्मा अपनी प्रकृति को वश में कर लेता है और मन से समस्त कर्मों का परित्याग कर देता है, तब वह नौ द्वारों वाले नगर ( भौतिक शरीर ) में बिना कुछ किये कराये सुखपूर्वक रहता है।

न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः ।
न कर्मफलसंयोगं स्वभावस्तु प्रवर्तते ।। 14 ।।

न — नहीं; कर्तृत्वम् — कर्तापन या स्वामित्व को; न — न तो; कर्माणि — कर्मों को; लोकस्य — लोगों के; सृजति — उत्पन्न करता है; प्रभुः — शरीर रूपी नगर का स्वामी; न — न तो; कर्म-फल — कर्मों के फल से; संयोगम् — सम्बन्ध  को; स्वभावः — प्रकृति के गुण; तु — लेकिन; प्रवर्तते — कार्य करते हैं। 

तात्पर्य — शरीर रूपी नगर का स्वामी देहधारी जीवात्मा न तो कर्म का सृजन करता है, न लोगों को कर्म करने के लिए प्रेरित करता है, न ही कर्मफल की रचना करता है। यह सब तो प्रकृति के गुणों के द्वारा ही किया जाता है।

नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः ।
अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः ।। 15 ।।

न — कभी नहीं; आदत्ते — स्वीकार करता है; कस्यचित् — किसी का; पापम् — पाप; न — न तो; च — भी; एव — निश्चय ही; सु-कृतम् — पुण्य को; विभुः — परमेश्वर; अज्ञानेन — अज्ञान से; आवृतम् — आच्छादित; ज्ञानम् — ज्ञान; तेन — उससे; मुह्यन्ति — मोह-ग्रस्त होते हैं; जन्तवः — जीवगण। 

तात्पर्य — परमेश्वर न तो किसी के पापों को ग्रहण करता है, न पुण्यों को। किन्तु सारे देहधारी जीव उस अज्ञान के कारण मोहग्रस्त रहते हैं, जो उनके वास्तविक ज्ञान को आच्छादित किये रहता है।

ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः ।
तेषमादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम् ।। 16 ।।

ज्ञानेन — ज्ञान से; तु — लेकिन; तत् — वह; अज्ञानम् — अविद्या; येषाम् — जिनका; नाशितम् — नष्ट हो जाती है; आत्मनः — जीव का; तेषाम् — उनके; आदित्य-वत् — उदियमान सूर्य के समान; ज्ञानम् — ज्ञान को; प्रकाशयति — प्रकट करता है; तत् परम् — कृष्णभावनामृत को। 

तात्पर्य — किन्तु जब कोई उस ज्ञान से प्रबुद्ध होता है, जिससे अविद्या का विनाश होता है, तो उसके ज्ञान से सब कुछ उसी तरह प्रकट हो जाता है, जैसे दिन में सूर्य से सारी वस्तुएँ प्रकाशित हो जाती है।

तद्बुद्धयस्तदात्मानस्तन्निष्ठास्तत्परायणाः ।
गच्छन्त्यपुनरावृत्तिं ज्ञाननिर्धूतकल्मषाः ।। 17 ।।

तत्-बुद्धयः — नित्य भगवत्परायण बुद्धि वाले; तत्-आत्मनाः — जिनके मन सदैव भगवान् में लगे रहते हैं; तत्-निष्ठाः — जिनकी श्रद्धा एकमात्र परमेश्वर में है; तत्-परायणः — जिन्होंने उनकी शरण ले रखी है; गच्छन्ति — जाते हैं; अपुनः-आवृत्तिम् — मुक्ति को; ज्ञान — ज्ञान द्वारा; निर्धूत — शुद्ध किये गये; कल्मषाः — पाप, अविद्या। 

तात्पर्य — जब मनुष्य की बुद्धि, मन, श्रद्धा तथा शरण सब कुछ भगवान् में स्थिर हो जाते हैं, तभी वह पूर्णज्ञान द्वारा समस्त कल्मष शुद्ध होता है और मुक्ति के पथ पर अग्रसर होता है।

इसे भी पढ़ें —

  1. अध्याय दो — गीता का सार 
  2. अध्याय तीन — कर्मयोग
  3. अध्याय पाँच — कृष्णभावनाभावित कर्म 
  4. 7 से 12 — सांख्ययोगी और कर्मयोगी के लक्षण और उनकी महिमा 

विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि ।
श्रुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः ।। 18 ।।

विद्या — शिक्षण; विनय — तथा विनम्रता से; सम्पन्ने — युक्त; ब्राह्मणे — ब्राह्मण में; गवि — गाय में; हस्तिनि — हाथी में; श्रुनि — कुत्ते में; च — तथा; एव — निश्चय ही; श्व-पाके — कुत्ताभक्षी ( चाण्डाल ) में; च — क्रमशः ; पण्डिताः — ज्ञानी; सम-दर्शिनः — समान दृष्टि से देखने वाले। 

तात्पर्य — विनम्र साधुपुरुष अपने वास्तविक ज्ञान के कारण एक विद्वान् तथा विनीत ब्राह्मण, गाय, हाथी, कुत्ता तथा चाण्डाल को समान दृष्टि ( समभाव ) से देखते हैं।

इहैव तैर्जितः सर्गो येषां साम्ये स्थितं मनः ।
निर्दोषं हि समं ब्रह्म तस्मादब्रह्मणि ते स्थितः ।। 19 ।।

इह — इस जीवन में; एव — निश्चय ही; तैः — उनके द्वारा; जितः — जीता हुआ; सर्गः — जन्म तथा मृत्यु; येषाम् — जिनका; साम्ये — समता में; स्थितम् — स्थित; मनः — मन; निर्दोषम् — दोषरहित; हि — निश्चय ही; समम् — समान; ब्रह्म — ब्रह्म की तरह; तस्मात् — अतः ; ब्रह्मणि — परमेश्वर में; ते — वे; स्थिताः — स्थित है। 

तात्पर्य — जिनके मन एकत्व तथा समता में स्थित हैं उन्होंने जन्म तथा मृत्यु के बंधनों को पहले ही जीत लिया है। वे ब्रह्म के समान निर्दोष हैं और सदा ब्रह्म में ही स्थित रहते हैं।

 न प्रहृष्येत्प्रियं प्राप्य नोद्विजेत्प्राप्य चाप्रियम् ।
स्थिरबुद्धिरसम्मूढो ब्रह्मविदब्रह्मणि स्थितः ।। 20 ।।

न — कभी नहीं; प्रहृष्येत् — हर्षित होता है; प्रियम् — प्रिय को; प्राप्य — प्राप्त करके; न — नहीं; उद्विजेत् — विचलित होता है; प्राप्य — प्राप्त करके; च — भी; अप्रियम् — अप्रिय को; स्थिर-बुद्धिः — आत्मबुद्धि, कृष्णचेतना; असम्मूढः — मोहरहित, संशयरहित; ब्रह्म-वित् — परब्रह्म को जानने वाला; ब्रह्मणि — ब्रह्म में; स्थितः — स्थित। 

तात्पर्य — जो न तो प्रिय वस्तु को पाकर हर्षित होता है और न अप्रिय को पाकर विचलित होता है, जो स्थिरबुद्धि है, जो मोहरहित है और भगवद्विद्या को जानने वाला है वह पहले से ही ब्रह्म में स्थित रहता है।

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