Hal Sashti Vrat Katha / हल षष्ठी व्रत कथा और पूजा विधि

Hal Sashti Vrat Katha Aur Puja Vidhi
हल षष्ठी व्रत कथा और पूजा विधि


Hal Sashti Vrat Katha Aur Puja Vidhi, हल षष्ठी व्रत कथा और पूजा विधि :- यह व्रत भाद्रपद कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है। हल षष्ठी को ललही छठ भी कहा जाता है। इस दिन हल-मूसलधारी श्री बलराम जी का जन्म हुआ था। कुछ लोग जनकनंदिनी माता सीता का भी जन्म दिवस इसी तिथि को मनाते हैं। बलराम जी के मुख्य शस्त्रों में हल तथा मुसल विशेष उल्लेखनीय हैं ; इनका एक नाम ‘ हलधर ‘ भी है। इन्हीं के नाम के आधार पर इसका नाम ‘ हलषष्ठी ‘ पड़ा होगा। प्रधानतया पुत्रवती स्त्रियाँ ही यह व्रत करती हैं। इस दिन महुए की दातुन करने का विधान है। पारण के समय हल से जाता-बोया गया अन्न नहीं खाना चाहिए। इस कारण व्रत का सेवन करने वाली स्त्रियाँ नीवार ( फसही ) का चावल सेवन करती हैं। इस दिन गाय का दूध भी वर्जित है।

हल षष्ठी पूजा विधि :-

विधान में प्रातः सद्यः – स्नाता स्त्रियाँ भूमि ( आँगन ) लीप कर एक जल कुण्ड बनाती हैं ; जिसमें बैर, पलाश, गूलर, कुश प्रभृति टहनियाँ गाड़कर ललही की पूजा करती हैं। पूजन में सतनजा ( गेहूँ, चना, धान, मक्का, अरहर, ज्वार, बाजरे ) आदि को भुना हुआ लावा चढ़ाया जाता है। हल्दी से रँगा हुआ वस्त्र तथा कुछ सुहाग-सामग्री भी चढ़ाई जाती है।

पूजनोपरान्त निम्न मन्त्र से प्रार्थना करनी चाहिए —

गंगाद्वारे कुशावर्ते विल्वके नीलपर्वते ।
स्नात्वा कनखले देवि हरं सन्दधतीं पटिम् ।।

ललिते सुभगे देवि सुखसौभाग्यदायिनि ।
अन्नतं देहि सौभाग्यं मह्यं तुभ्यं नमो नमः ।।

अर्थात् हे देवि ! आपने गंगाद्वार, कुशावर्त, विल्वक, नीलपर्वत और कनखल तीर्थ में स्नान करके भगवान् शंकर को पति रूप में प्राप्त किया है। सुख और सौभाग्य देने वाली ललिता देवी ! आपको बारम्बार नमस्कार है, आप मुझे अचल सुहाग दीजिये।

यह व्रत करने से स्त्रियों का सुहाग अचल होता है तथा अन्त में शिव-धाम की प्राप्ति होती है।

हल षष्ठी व्रत कथा :-

प्राचीन काल में एक ग्वालिन थी, जिसका प्रसव-काल अत्यन्त सन्निकट था। एक ओर वह पीड़ा से व्याकुल थी तो दूसरी ओर उसका चित्त दूध-दही बेचने में लगा हुआ था। उसने विचार किया कि यदि बच्चा उत्पन्न हो गया तो फिर दूध-दही ऐसे ही पड़ा रह जायेगा। इतना सोचकर वह झट उठी ; तथा सिर पर गोरस ( दूध-दही ) की मटुकिया रखकर बेचने चल दी। आगे चलकर कष्टसाध्य प्रसव की पीड़ा के कारण एक बनबेरी की ओट में बैठ गई। वहां उसको एक बालक पैदा लिया।

अल्हड़ ग्वालिन ने नवजात शिशु वहीं रख कर स्वयं दूध-दही बेचने समीपस्थ गाँवों को गयीं। संयोगवश उस दिन हलषष्ठी भी थी। गाय-भैंस का मिला दूध होने पर भी उसने केवल भैंस का दूध बतला कर ग्रामिणियों को खूब ठगा।

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