Indra Brihaspati Samwad / इन्द्र बृहस्पति संवाद

श्रीरामचरितमानस अयोध्याकाण्ड

Indra Brihaspati Samwad
इन्द्र बृहस्पति संवाद

Indra Brihaspati Samwad, इन्द्र बृहस्पति संवाद :- भरतजी के [ इस प्रेम के ] प्रभाव को देखकर देवराज इन्द्र को सोच हो गया [ कि कहीं इनके प्रेमवश श्रीरामजी लौट न जायँ और हमारा बना-बनाया काम बिगड़ जाय ]। संसार भले के लिये भला और बुरे के लिये बुरा है ( मनुष्य जैसा आप होता है जगत् उसे वैसा ही दीखता है )। उसने गुरु बृहस्पतिजी से कहा – हे प्रभो ! वही उपाय कीजिये जिससे श्रीरामचन्द्रजी और भरतजी की भेंट ही न हो। इन्द्र के वचन सुनते ही देवगुरु बृहस्पतिजी मुस्कुराये। उन्होंने हजार नेत्रों वाले इन्द्र को [ ज्ञानरूपी ] नेत्रों से रहित ( मूर्ख ) समझा और कहा – हे देवराज ! माया के स्वामी श्रीरामचन्द्रजी के सेवक के साथ कोई माया करता है तो वह उलटकर अपने ही ऊपर आ पड़ती है। 


जड़ चेतन मग जीव घनेरे । जे चितए प्रभु जिन्ह प्रभु हेरे ।।

ते सब भए परम पद जोगू । भरत दरस मेटा भव रोगू ।।

अर्थात् :- रास्ते में असंख्य जड़-चेतन जीव थे। उनमें से जिनको प्रभु श्रीरामचन्द्रजी ने देखा, अथवा जिन्होंने प्रभु श्रीरामचन्द्रजी को देखा, वे सब [ उसी समय ] परमपद के अधिकारी हो गये। परन्तु अब भरतजी के दर्शन ने तो उनका भव ( जन्म-मरण ) रूपी रोग मिटा ही दिया। [ श्रीरामदर्शन से तो वे परमपद के अधिकारी हुए थे, परन्तु भरतदर्शन से उन्हें वह परमपद प्राप्त हो गया ]। 

यह बड़ि बात भरत कइ नाहीं । सुमिरत जिनहि रामु मन माहीं ।।
बारक़ राम कहत जग जेऊ । होत तरन तारन नर तेऊ ।।

अर्थात् :- भरतजी के लिये यह कोई बड़ी बात नहीं है, जिन्हें रामजी स्वयं अपने मन में स्मरण करते रहते हैं। जगत् में जो भी मनुष्य एक बार ‘ राम ‘ कह लेते हैं, वे भी तर-तारने वाले हो जाते हैं !

भरतु राम प्रिय पुनि लघु भ्राता । कस न होइ मगु मंगलदाता ।।
सिद्ध साधु मुनिबर अस कहहीं । भरतहि निरखि हरषु हियँ लहहीं ।।

अर्थात् :- फिर भरतजी तो श्रीरामचन्द्रजी के प्यारे तथा उनके छोटे भाई ठहरे। तब भला उनके लिये मार्ग मङ्गल ( सुख ) दायक कैसे न हो ? सिद्ध, साधु और श्रेष्ठ मुनि ऐसा कह रहे हैं और भरतजी को देखकर हृदय में हर्ष-लाभ करते हैं।

देखि प्रभाउ सुरेसहि सोचू । जगु भल भलेहि पोच कहुँ पोचू ।।
गुर सन कहेउ करिअ प्रभु सोई । रामहि भरतहि भेट न होई ।।

अर्थात् :- भरतजी के [ इस प्रेम के ] प्रभाव को देखकर देवराज इन्द्र को सोच हो गया [ कि कहीं इनके प्रेमवश श्रीरामजी लौट न जायँ और हमारा बना-बनाया काम बिगड़ जाय ]। संसार भले के लिये भला और बुरे के लिये बुरा है ( मनुष्य जैसा आप होता है जगत् उसे वैसा ही दीखता है )। उसने गुरु बृहस्पतिजी से कहा – हे प्रभो ! वही उपाय कीजिये जिससे श्रीरामचन्द्रजी और भरतजी की भेंट ही न हो। 

दो० — रामु सँकोची प्रेम बस भरत सपेम पयोधि ।
बनी बात बेगरन चहति करिअ जतनु छलु सोधि ।। 217 ।।

अर्थात् :- श्रीरामचन्द्रजी संकोची और प्रेम के वश हैं और भरतजी प्रेम के समुद्र हैं। बनी-बनायी बात बिगड़ना चाहती है, इसलिये कुछ छल ढूँढ़कर इसका उपाय कीजिये। 

बचन सुनत सुरगुरु मुसुकाने । सहसनयन बिनु लोचन जाने ।।
मायापति सेवक सन माया । करइ त उलटि परइ सुरराया ।।

अर्थात् :- इन्द्र के वचन सुनते ही देवगुरु बृहस्पतिजी मुस्कुराये। उन्होंने हजार नेत्रों वाले इन्द्र को [ ज्ञानरूपी ] नेत्रों से रहित ( मूर्ख ) समझा और कहा – हे देवराज ! माया के स्वामी श्रीरामचन्द्रजी के सेवक के साथ कोई माया करता है तो वह उलटकर अपने ही ऊपर आ पड़ती है। 

तब कछु कीन्ह राम रुख जानी । अब कुचालि करि होइहि हानी ।।
सुनु सुरेस रघुनाथ सुभाऊ । निज अपराध रिसाहिं न काऊ ।।

अर्थात् :- उस समय ( पिछली बार ) तो श्रीरामचन्द्रजी का रुख जानकर कुछ किया था। परन्तु इस समय कुचाल करने से हानि ही होगी। हे देवराज ! श्रीरघुनाथजी का स्वभाव सुनो, वे अपने प्रति अपराध से कभी रुष्ट नहीं होते। 

जो अपराधु भगत कर करई । राम रोष पावक सो जरई ।।
लोकहुँ बेद बिदित इतिहासा । यह महिमा जानहिं दुरबासा ।।

अर्थात् :- पर जो कोई उनके भक्त का अपराध करता है, वह श्रीराम की क्रोधाग्नि में जल जाता है। लोक और वेद दोनों में इतिहास ( कथा ) प्रसिद्ध है। इस महिमा को दुर्वासाजी जानते हैं।

भरत सरिस को राम सनेही । जगु जप राम रामु जप जेही ।।

अर्थात् :- सारा जगत् श्रीराम को जपता है, वे श्रीरामजी जिनको जपते हैं उन भरतजी के समान श्रीरामचन्द्रजी का प्रेमी कौन होगा ?

दो० — मनहुँ न आनिअ अमरपति रघुबर भगत अकाजु ।
अजसु लोक परलोक दुख दिन दिन सोक समाजु ।। 218 ।।

अर्थात् :- हे देवराज ! रघुकुलश्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजी के भक्त का काम बिगाड़ने की बात मन में भी न लाइये। ऐसा करने से लोक में अपयश और परलोक में दुःख होगा और शोक का सामान दिनों दिन बढ़ता ही चला जायगा।

सुनु सुरेस उपदेसु हमारा । रामहि सेवकु परम पिआरा ।।
मानत सुखु सेवक सेवकाईं । सेवक बैर बैरु अधिकाईं ।।

अर्थात् :- हे देवराज ! हमारा उपदेश सुनो। श्रीरामजी को अपना सेवक परम प्रिय है। वे अपने सेवक की सेवा से सुख मानते हैं और सेवक के साथ वैर करने से बड़ा भारी वैर मानते हैं।

जद्यपि सम नहिं राग न रोषू । गहहिं न पाप पूनु गुन दोषू ।।
करम प्रधान बिस्व करि राखा । जो जस करइ तो तस फलु चाखा ।।

अर्थात् :- यद्यपि वे सम हैं – उनमे न राग है, न रोष है। और न वे किसी का पाप-पुण्य और गुण-दोष ही ग्रहण करते हैं। उन्होंने विश्व में कर्म को ही प्रधान कर रखा है। जो जैसा करता है, वह वैसा फल भोगता है। 

तदपि करहिं सम विषम बिहारा । भगत अभगत हृदय अनुसारा ।।
अगुन अलेप अमान एकरस । रामु सगुन भए भगत पेम बस ।।

अर्थात् :- तथापि वे भक्त और अभक्त हृदय के अनुसार सम और विषम व्यवहार करते हैं ( भक्त को प्रेम से गले लगा लेते हैं और अभक्त को मारकर तार देते हैं )। गुणरहित, निर्लेप, मानरहिता और सदा एकरस भगवान् श्रीराम भक्त के प्रेमवश ही सगुण हुए हैं।  

राम सदा सेवक रुचि राखी । बेद पुरान साधु सुर साखी ।।
अस जियँ जानि तजहु कुटिलाई । करहु भरत पद प्रीति सुहाई ।।

अर्थात् :- श्रीरामजी सदा अपने सेवकों ( भक्तों ) की रूचि रखते आये हैं। वेद, पुराण, साधु और देवता इनके साक्षी हैं। ऐसा हृदय में जानकर कुटिलता छोड़ दो और भरतजी के चरणों में सुन्दर प्रीति करो। 

दो० — राम भगत परहित निरत पर दुख दुखी दयाल ।
भगत सिरोमनि भगत तें जनि डरपहु सुरपाल ।। 219 ।।

अर्थात् :- हे देवराज इन्द्र ! श्रीरामचन्द्रजी के भक्त सदा दूसरों के हित में लगे रहते हैं, वे दूसरों के दुःख से दुःखी और दयालु होते हैं। फिर, भरतजी तो भक्तों के शिरोमणि हैं, उनसे बिलकुल न डरो।

सत्यसंध प्रभु सुर हितकारी । भरत राम आयस अनुसारी ।।
स्वारथ बिबस बिकल तुम्ह होहू । भरत दोसु नहिं राउर मोहू ।।

अर्थात् :- प्रभु श्रीरामचन्द्रजी सत्यप्रतिज्ञ और देवताओं का हित करने वाले हैं। और भरतजी श्रीरामजी की आज्ञा के अनुसार चलने वाले हैं। तुम व्यर्थ ही स्वार्थ के विशेष वश होकर व्याकुल हो रहे हो। इसमें भरतजी का कोई दोष नहीं, तुम्हारा ही मोह है। 

सुनि सुरबर सुरगुर बर बानी । भा प्रमोदु मन मिटी गलानी ।।
बरषि प्रसून हरषि सुरराऊ । लगे सराहन भरत सुभाऊ ।।

अर्थात् :- देवगुरु बृहस्पतिजी की श्रेष्ठ वाणी को सुनकर इन्द्र के मन में बड़ा आनन्द हुआ और उनकी चिन्ता मिट गयी। तब हर्षित होकर देवराज फूल बरसाकर भरतजी के स्वभाव की सराहना करने लगे। 

एहि बिधि भरत चले मग जाहीं । दसा देखि मुनि सिद्ध सिहाहीं ।।
जबहिं रामु कहि लेहिं उसासा । उमगत पेमु मनहुँ चहु पासा ।।

अर्थात् :- इस प्रकार भरतजी मार्ग में चले जा रहे हैं। उनकी [ प्रेममयी ] दशा देखकर मुनि और सिद्ध लोग भी सिहाते हैं। भरतजी जभी ‘ राम ‘ कहकर लंबी साँस लेते हैं, तभी मानों चारों ओर प्रेम उमड़ पड़ता है। 

द्रवहिं बचन सुनि कुलिस पषाना । पुरजन पेमु न जाइ बखाना ।।
बीच बास करि जमुनहिं आए । निरखि नीरु लोचन जल छाए ।।

अर्थात् :- उनके [ प्रेम और दीनता से पूर्ण ] वचनों को सुनकर वज्र और पत्थर भी पिघल जाते हैं। अयोध्यावासियों का प्रेम कहते नहीं बनता। बीच में निवास ( मुकाम ) करके भरतजी यमुनाजी के तटपर आये। यमुनाजी का जल देखकर उनके नेत्रों में जल भर आया। 

दो० — रघुबर बरन बिलोकि बर बारि समेत समाज ।
होत मगन बारिधि बिरह चढ़े बिबेक जहाज ।। 220 ।।

अर्थात् :- श्रीरघुनाथजी के ( श्याम ) रंग का सुन्दर जल देखकर सारे समाजसहित भरतजी [ प्रेमविह्वल होकर ] श्रीरामजी के विरहरूपी समुद्र में डूबते-डूबते विवेकहरूपी जहाज पर चढ़ गये ( अर्थात् यमुनाजी का श्यामवर्ण जल देखकर सब लोग श्यामवर्ण भगवान् के प्रेम में विह्वल हो गये और उन्हें न पाकर विरहव्यथा से पीड़ित हो गये ; तब भरतजी को यह ध्यान आया कि जल्दी चलकर उनके साक्षात् दर्शन करेंगे, इस विवेक से वे फिर उत्साहित हो गये )।

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