Jagat Ki Utpatti Ka Vishay / जगत् की उत्पत्ति का विषय

अध्याय नौ परम गुह्य ज्ञान

Jagat Ki Utpatti Ka Vishay
जगत् की उत्पत्ति का विषय

Jagat Ki Utpatti Ka Vishay, जगत् की उत्पत्ति का विषय- हे कुन्तीपुत्र ! कल्प का अन्त होने पर सारे प्राणी मेरी प्रकृति में प्रवेश करते हैं और अन्य कल्प के आरम्भ होने पर मैं उन्हें अपनी शक्ति से पुनः उत्पन्न करता हूँ। सम्पूर्ण विराट जगत मेरे अधीन है। यह मेरी इच्छा से बारम्बार स्वतः प्रकट होता रहता है और मेरी इच्छा से अन्त में विनष्ट होता है। हे धनञ्जय ! ये सारे कर्म मुझे नहीं बाँध पाते हैं। मैं उदासीन की भाँति इन सारे भौतिक कर्मों में सदैव विरक्त रहता हूँ।

श्लोक 7 से 10

सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् ।
कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम् ।। 7 ।।

सर्व-भूतानि — सारे प्राणी; कौन्तेय — हे कुन्तीपुत्र; प्रकृतिम् — प्रकृति में; यान्ति — प्रवेश करते हैं; मामिकाम् — मेरी; कल्प-क्षये — कल्पान्त में; पुनः — फिर से; तानि — उन सबों को; कल्प-आदौ — कल्प  प्रारम्भ में; विसृजामि — उत्पन्न करता हूँ; अहम् — मैं।

तात्पर्य — हे कुन्तीपुत्र ! कल्प का अन्त होने पर सारे प्राणी मेरी प्रकृति में प्रवेश करते हैं और अन्य कल्प के आरम्भ होने पर मैं उन्हें अपनी शक्ति से पुनः उत्पन्न करता हूँ।

प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः
भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात् ।। 8 ।।

प्रकृतिम् — प्रकृति में; स्वाम् — मेरी निजी; अवष्टभ्य — प्रवेश करके; विसृजामि — उत्पन्न करता हूँ; पुनः पुनः — बारम्बार; भूत-ग्रामम् — समस्त विराट अभिव्यक्ति को; इमम् — इस; कृत्स्नम् — पूर्णतः ; अवशम् — स्वतः ; प्रकृतेः — प्रकृति की शक्ति के; वशात् — वश में। 

तात्पर्य — सम्पूर्ण विराट जगत मेरे अधीन है। यह मेरी इच्छा से बारम्बार स्वतः प्रकट होता रहता है और मेरी इच्छा से अन्त में विनष्ट होता है।

इसे भी पढ़ें :–

  1. अध्याय आठ — भगवत्प्राप्ति
  2. अध्याय नौ — परम गुह्य ज्ञान
  3. 1 से 6 — प्रभाव सहित ज्ञान का विषय

 न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय
उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु ।। 9 ।।

न — कभी नहीं; च — भी; माम् —  मुझको; तानि — वे; कर्माणि — कर्म; निबध्नन्ति — बाँधते हैं; धनञ्जय — हे धन के विजेता; उदासीन-वत् — निरपेक्ष या तटस्थ की तरह; आसीनम् — स्थित हुआ; असक्तम् — आसक्तिरहित; तेषु — उन; कर्मसु — कार्यों से। 

तात्पर्य — हे धनञ्जय ! ये सारे कर्म मुझे नहीं बाँध पाते हैं। मैं उदासीन की भाँति इन सारे भौतिक कर्मों में सदैव विरक्त रहता हूँ।

 मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् ।
हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते ।। 10 ।।

मया — मेरे द्वारा; अध्यक्षेण — अध्यक्षता के कारण; प्रकृतिः — प्रकृति; सूयते — प्रकट होती है; स — सहित; चर-अचरम् — जड़ तथा जंगम; हेतुना — कारण से; अनेन — इस; कौन्तेय — हे कुन्तीपुत्र; जगत् — दृश्य जगत; विपरिवर्तते — क्रियाशील है।

तात्पर्य — हे कुन्तीपुत्र ! यह भौतिक प्रकृति मेरी शक्तियों में से एक है और मेरी अध्यक्षता में कार्य करती है, जिससे सारे चर तथा अचर प्राणी उत्पन्न होते हैं। इसके शासन में यह जगत् बारम्बार सृजित और विनष्ट होता रहता है।

आगे की श्लोक :–

Leave a Comment

error: Content is protected !!