Janki Navami Vrat Katha / जानकी नवमी व्रत कथा और पूजा

Janki Navami Vrat Katha Aur Puja Vidhi
जानकी नवमी व्रत कथा और पूजा विधि


Janki Navami Vrat Katha Aur Puja Vidhi, जानकी नवमी व्रत कथा और पूजा विधि :- यह व्रत फाल्गुन कृष्ण पक्ष नवमी को किया जाता है। समस्त सुहाग सामग्रियों से भगवती सीता का पूजन किया जाता है। वैष्णव धर्म-ग्रंथों के अनुसार इसी दिन जानकी जी का जन्म हुआ था।

जानकी नवमी पूजा विधि :-

इस दिन प्रातःकाल स्नान आदि नित्य क्रिया के उपरान्त पूजा कर व्रत का संकल्प लें। पूजन क्रिया में चावल, जौ, तिल आदि का हवन किया जाता है। इस व्रत को करने से सन्तान-लाभ तथा समस्त मनोकामनाएँ पूरी होती हैं।

‘ अचल रहे अहिबात तुम्हारा। जब लगि गंग जमुन जल धारा ।। ‘ — जैसे वाक्यों से पार्वती जी ने सीता जी को आशीर्वाद दिया था। उसी तरह जानकी जी, व्रत रहने वाले स्त्री को आशीर्वाद देती हैं।

जानकी नवमी व्रत कथा :-

प्राचीन काल में किसी गाँव में वेददत्त नामक एक ब्राह्मण अपनी पत्नी सुहाना के साथ रहते थे। उनकी पत्नी व्यभिचारी थी। एक दिन ब्राह्मण भिक्षा के लिए गए हुए थे। मौका पाकर ब्राह्मण की पत्नी कुसंगत में पड़कर व्यभिचार कर्म में लिप्त हो गई। उसके व्यभिचार कर्म के कारण उस गाँव में आग लग गई और उस व्यभिचरिनी ब्राह्मणी का अन्त हो गया। अपने पाप कर्म के कारण उस ब्राह्मणी का जन्म चांडाल के घर हुआ। वह अंधी होने के साथ-साथ कुष्ठ रोग से ग्रसित थी। इस तरह से वह अपने पूर्व जन्मों के कर्मों का फल भुगत रही थी। एक दिन वह भूख-प्यास से बेहाल भटकती-भटकती वेदवती गाँव पहुँची। उस दिन वैशाख मास की पुण्यदायिनी शुक्ला नवमी थी। वह क्षुधा से व्याकुल लोगों से गुहार लगाने लगी कि कृपा करके मुझे कुछ अन्न दे दो। कहते-कहते वह चांडालिनी श्री स्वर्ण भवन के हजार पुष्प मंडित स्तम्भों के पास पहुँच गई और गुहार लगाई — ” मुझे कुछ खाने को दे दो। ” तभी एक संत ने कहा — हे देवी ! आज सीता नवमी का पावन पर्व है, इस दिन अन्न देने वाला पाप का भागी होता है। इसलिए तुम कल सुबह आना व्रत के पारणा के समय और ठाकुर जी के प्रसाद को ग्रहण करना। ” उसके बहुत विनती करने पर उस चाण्डालीन को तुलसीदल और जल दिया। वहीं खा कर वह मर गई। लेकिन अनजाने में उससे सीता नवमी का व्रत हो गया था। उस व्रत के प्रभाव से उसके सभी पाप नष्ट हो गए। अगले जन्म में वह कामरूप के महाराज की पत्नी कामकाला के नाम से प्रसिद्ध ही। उन्होंने कई मंदिरों का निर्माण करवाया और सारा जीवन धर्म के कार्यों में लगी रही। इसी प्रकार से जो मनुष्य सीता नवमी व्रत को विधि-विधान से करता है। वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है।

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