Jatayu Ravan Yuddh / जटायु रावण युद्ध

श्रीरामचरितमानस अरण्यकाण्ड

Jatayu Ravan Yuddh
जटायु रावण युद्ध

Jatayu Ravan Yuddh, जटायु रावण युद्ध :- गृध्रराज जटायु ने सीताजी की दुःखभरी वाणी सुनकर पहचान लिया कि ये रघुकुलतिलक श्रीरामचन्द्रजी की पत्नी हैं। [ उसने देखा कि ] नीच राक्षस इनको [ बुरी तरह ] लिये जा रहा है, जैसे कपिला गाय म्लेच्छ के पाले पड़ गयी हो। यह या तो मैनाक पर्वत है या पक्षियों का स्वामी गरुड़ ! पर वह ( गरुड़ ) तो अपने स्वामी विष्णुसहित मेरे बल को जानता है ! [ कुछ पास आने पर ] रावण ने उसे पहचान लिया [ और बोला – ] यह तो बूढ़ा जटायु है ! यह मेरे हाथ रूपी तीर्थ में शरीर छोड़ेगा। 


खल बधि तुरत फिरे रघुबीरा। सोह चाप कर कटि तुनीरा ।।

आरत गिरा सुनी जब सीता। कह लछिमन सन परम सभीता ।।

अर्थात् :- दुष्ट मारीच को मारकर श्रीरघुवीर तुरंत लौट पड़े। हाथ में धनुष और कमर में तरकस शोभा दे रहा है। इधर सब सीताजी ने दुःखभरी वाणी ( मरते समायी मारीच की ‘ हा लक्ष्मण ‘ की आवाज ) सुनी तो वे बहुत ही भयभीत होकर लक्ष्मणजी से कहने लगीं। – 

जाहु बेगि संकट अति भ्राता। लछिमन बिहसि कहा सुनु माता ।।
भृकुटि बिलास सृष्टि लय होई। सपनेहुँ संकट परइ कि सोई ।।

अर्थात् :- तुम शीघ्र जाओ, तुम्हारे भाई बड़े संकट में हैं। लक्ष्मणजी ने हँसकर कहा – हे माता ! सुनो, जिनके भ्रुकुटि विलास ( भौंके इशारे ) मात्र से सारी दृष्टि का लय ( प्रलय ) हो जाता है, वे श्रीरामजी क्या कभी स्वप्न में भी संकट में पड़ सकते हैं। 

मरम बचन जब सीता बोला। हरि प्रेरित लछिमन मन डोला ।।
बन दिसि देव सौंपि सब काहू। चले जहाँ रावन ससि राहू ।।

अर्थात् :- इस पर जब सीताजी कुछ मर्म-वचन ( हृदय में चुभने वाला वचन ) कहने लगीं, तब भगवान् की प्रेरणा से लक्ष्मणजी का मन भी चञ्चल हो उठा। वे श्रीसीताजी को वन और दिशाओं के देवताओं को सौंपकर वहाँ चले जहाँ रावणरूपी चन्द्रमा के लिये राहुरूप श्रीरामजी थे। 

सून बीच दसकंधर देखा। आवा निकट जती कें बेषा ।।
जाकें डर सुर असुर डेराहीं। निसि न नीद दिन अन्न न खाहीं ।।

अर्थात् :- रावण सूना मौका देखकर यति ( संन्यासी ) के वेष में श्रीसीताजी के समीप आया। जिसके डर से देवता और दैत्य तक इतना डरते हैं कि रात को नींद नहीं आती और दिन में [ भरपेट ] अन्न नहीं खाते। –

सो दससीस स्वान की नाईं। इत उत चितइ चला भड़िहाई ।।
इमि कुपंथ पग देत खगेसा। रह न तेज तन बुधि बल लेसा ।।

अर्थात् :- वही दस सिरवाला रावण कुत्ते की तरह इधर-उधर ताकता हुआ भड़िहाई * ( चोरी ) के लिये चला। [ काकभुशुण्डिजी कहते हैं – ] हे गरुड़जी ! इस प्रकार कुमार्ग पर पैर रखते ही शरीर में तेज तथा बुद्धि एवं बल का लेश नहीं रह जाता।
* सूना पाकर कुत्ता चुपके-से बर्तन-भाड़ों में मुँह डालकर कुछ चुरा ले जाता है उसे, ‘ भड़िहाई ‘ कहते है।

नाना बिधि करि कथा सुहाई। राजनीति भय प्रीति देखाई ।।
कह सीता सुनु जती गोसाईं। बोलेहु बचन दुष्ट की नाईं ।।

अर्थात् :- रावण ने अनेकों प्रकार की सुहावनी कथाएँ रचकर सीताजी को राजनीति, भय और प्रेम दिखलाया। सीताजी ने कहा — हे यति गोसाईं ! सुनो, तुमने तो दुष्ट की तरह वचन कहे। 

तब रावन निज रूप देखावा। भई सभय जब नाम सुनावा ।।
कह सीता धरि धीरजु गाढ़ा। आइ गयउ प्रभु रहु खल ठाढ़ा ।।

अर्थात् :- तब रावण ने अपना असली रूप दिखलाया और जब नाम सुनाया तब तो सीताजी भयभीत हो गयीं। उन्होंने गहरा धीरज धरकर कहा – ‘ अरे दुष्ट ! खड़ा तो रह, प्रभु आ गये। ‘

जिमि हरिबधुहि छुद्र सस चाहा। भएसि कालबस निसिचर नाहा ।।
सुनत बचन दससीस रिसाना। मन महुँ चरन बंदि सुख माना ।।

अर्थात् :- जैसे सिंह की स्त्री को तुच्छ खरगोश चाहे, वैसे ही अरे राक्षसराज ! तू [ मेरी चाह करके ] काल के वश हुआ है। ये वचन सुनते ही रावण को क्रोध आ गया, परन्तु मन में उसने सीताजी के चरणों की वन्दना करके सुख माना। 

दो० — क्रोधवंत तब रावन लीन्हिसि रथ बैठाइ ।
चला गगनपथ आतुर भयँ रथ हाँकि न जाइ ।। 28 ।।

अर्थात् :- फिर क्रोध में भरकर रावण ने सीताजी को रथपर बैठा लिया और वह बड़ी उतावली के साथ आकाशमार्ग से चला ; किन्तु डर के मारे उससे रथ हाँका नहीं जाता था। 

हा जग एक बीर रघुराया। केहिं अपराध बिसारेहु दाया ।।
आरति हरन सरन सुखदायक। हा रघुकुल सरोज दिननायक ।।

अर्थात् :- [ सीताजी विलाप कर रही थीं – ] हा जगत् के अद्वितीय वीर श्रीरघुनाथजी ! आपने किस अपराध से मुझ पर दया भुला दी। हे दुःखों के हरने वाले, हे शरणागत को सुख देनेवाले, हा रघुकुलरूपी कमल के सूर्य !

हा लछिमन तुम्हार नहिं दोसा। सो फलु पायउँ कीन्हेउँ रोसा ।।
बिबिध बिलाप करति बैदेही। भूरि कृपा प्रभु दूरि सनेही ।।

अर्थात् :- हा लक्ष्मण ! तुम्हारा दोष नहीं है। मैंने क्रोध किया, उसका फल पाया। श्रीजानकीजी बहुत प्रकार से विलाप कर रही हैं – [ हाय ! ] प्रभु की कृपा तो बहुत है, परन्तु वे स्नेही प्रभु बहुत दूर रह गये हैं। 

बिपति मोरि को प्रभुहि सुनावा। पुरोडास चह रासभ खावा ।।
सीता कै बिलाप सुनि भारी। भए चराचर जीव दुखारी ।।

अर्थात् :- प्रभु को मेरी यह विनती कौन सुनावे ? यज्ञ के अन्न को गदहा खाना चाहता है। सीताजी का भारी विलाप सुनकर जड़-चेतन सभी जीव दुःखी हो गये। 

गीधराज सुनि आरत बानी। रघुकुलतिलक नारि पहिचानी ।।
अधम निसाचर लीन्हें जाई। जिमि मलेछ बस कपिला गाई ।।

अर्थात् :- गृध्रराज जटायु ने सीताजी की दुःखभरी वाणी सुनकर पहचान लिया कि ये रघुकुलतिलक श्रीरामचन्द्रजी की पत्नी हैं। [ उसने देखा कि ] नीच राक्षस इनको [ बुरी तरह ] लिये जा रहा है, जैसे कपिला गाय म्लेच्छ के पाले पड़ गयी हो। 

सीते पुत्रि करसि जनि त्रासा। करिहउँ जातुधान कर नासा ।।
धावा क्रोधवंत खग कैसें। छूटइ पबि परबत कहुँ जैसें ।।

अर्थात् :- [ वह बोलै – ] हे सीते पुत्री ! भय मत कर। मैं इस राक्षस का नाश करूँगा। [ यह कहकर ] वह पक्षी क्रोध में भरकर कैसे दौड़ा, जैसे पर्वत की ओर वज्र छूटता हो।  

रे रे दुष्ट ठाढ़ किन होही। निर्भय चलेसि न जानेहि मोही ।।
आवत देखि कृतांत समाना। फिरि दसकंधर कर अनुमाना ।।

अर्थात् :- [ उसने ललकार कहा – ] रे रे दुष्ट ! खड़ा क्यों नहीं होता ? निडर होकर चल दिया ! मुझे तूने नहीं जाना ? उसको यमराज के समान आता हुआ देखकर रावण घूमकर मन में अनुमान करने लगा। –

की मैनाक कि खगपति होई। मम बल जान सहित पति सोई ।।
जाना जरठ जटायू एहा। मम कर तीरथ छाँड़िहि देहा ।।

अर्थात् :- यह या तो मैनाक पर्वत है या पक्षियों का स्वामी गरुड़ ! पर वह ( गरुड़ ) तो अपने स्वामी विष्णुसहित मेरे बल को जानता है ! [ कुछ पास आने पर ] रावण ने उसे पहचान लिया [ और बोला – ] यह तो बूढ़ा जटायु है ! यह मेरे हाथ रूपी तीर्थ में शरीर छोड़ेगा। 

सुनत गीध क्रोधासुर धावा। कह सुनु रावन मोर सिखावा ।।
तजि जानकिहि कुसल गृह जाहू। नाहिं त अस होइहि बहुबाहू ।।

अर्थात् :- यह सुनते ही गीध क्रोध में भरकर बड़े वेग से दौड़ा और बोला – रावण ! मेरी सियावान सुन। जानकीजी को छोड़कर कुशलपूर्वक अपने घर चला जा। नहीं तो हे बहुत भुजाओंवाले ! ऐसा होगा कि। –

राम रोष पावक अति घोरा। होइहि सकल सलभ कुल तोरा ।।
उतरु न देत दसानन जोधा। तबहिं गीध धावा करि क्रोधा ।।

अर्थात् :- श्रीरामजी के क्रोधरूपी अत्यन्त भयानक अग्नि में तेरा सारा वंश पतिंगा [ होकर भस्म ] हो जायगा। योद्धा रावण कुछ उत्तर नहीं देता। तब गीध क्रोध करके दौड़ा। 

धरि कच बिरथ कीन्ह महि गिरा। सीतहि राखि गीध पुनि फिरा ।।
चोचन्ह मारि बिदारेसि देही। दंड एक भइ मुरुछा तेही ।।

अर्थात् :- उसने [ रावण के ] बाल पकड़कर उसे रथ से नीचे उतार लिया, रावण पृथ्वीपर गिर पड़ा। गीध सीताजी को एक ओर बैठाकर फिर लौटा और चोंचों से मार-मारकर रावण के शरीर को विदीर्ण कर डाला। इससे उसे एक घड़ी के लिये मूर्च्छा हो गयी। 

तब सक्रोध निसिचर खिसिआना। काढ़ेसि परम कराल कृपाना ।।
काटेसि पंख परा खग धरनी। सुमिरि राम करि अद्भुत करनी ।।

अर्थात् :- तब खिसियाये हुए रावण ने क्रोधयुक्त होकर अत्यन्त भयानक कटार निकाली और उससे जटायु के पंख काट डाले। पक्षी ( जटायु ) श्रीरामजी की अद्भुत लीला का स्मरण करके पृथ्वी पर गिर पड़ा। 

सीतहि जान चढ़ाइ बहोरी। चला उताइल त्रास न थोरी ।।
करति बिलाप जाति नभ सीता। ब्याध बिबस जनु मृगी सभीता ।।

अर्थात् :- सीताजी को फिर रथ पर चढ़ाकर रावण बड़ी उतावली के साथ चला, उसे भय कम न था। सीताजी आकाश में विलाप करती हुई जा रही हैं। मानो व्याध के वश में पड़ी हुई ( जाल में फँसी हुई ) कोई भयभीत हिरनी हो !

गिरि पर बैठे कपिन्ह निहारी। कहि हरि नाम दीन्ह पट डारी ।।
एहि बिधि सीतहि सो लै गयऊ। बन असोक महँ राखत भयऊ ।।

अर्थात् :- पर्वत पर बैठे हुए बंदरों को देखकर सीताजी ने हरिनाम लेकर वस्त्र डाल दिया। इस प्रकार वह सीताजी को ले गया और उन्हें अशोकवन में जा रखा।

दो० — हारि परा खल बहु बिधि भय अरु प्रीति देखाइ ।
तब असोक पादप तर राखिसि जतन कराइ ।। 29 ( क ) ।।

अर्थात् :- सीताजी को बहुत प्रकार से भय और प्रीति दिखलाकर जब वह दुष्ट हार गया, तब उन्हें यत्न कराके ( सब व्यवस्था ठीक कराके ) अशोक वृक्ष के नीचे रख दिया। 

नवाह्नपारायण, छठा विश्राम

जेहि बिधि कपट कुरंग सँग धाइ चले श्रीराम ।
सो छबि सीता राखि उर रटति रहति हरिनाम ।। 29 ( ख ) ।।

अर्थात् :- जिस प्रकार कपटमृग के साथ श्रीरामजी दौड़ चले थे, उसी छवि को हृदय में रखकर वे हरिनाम ( रामनाम ) रटती रहती हैं। 

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