Jivatma Ka Vishay / जीवात्मा का विषय

अध्याय पन्द्रह पुरुषोत्तम योग

Jivatma Ka Vishay
जीवात्मा का विषय

Jivatma Ka Vishay, जीवात्मा का विषय- इस संसार में जीव अपनी देहात्मबुद्धि को एक शरीर से दूसरे में उसी तरह ले जाता है, जिस तरह वायु सुगन्धि को ले जाता है। इस प्रकार वह एक शरीर धारण करता है और फिर उसे त्याग कर दूसरा शरीर धारण करता है । मूर्ख न तो समझ पाते हैं कि जीव किस प्रकार अपना शरीर त्याग सकता है, न ही वे समझ पाते हैं कि प्रकृति के गुणों के अधीन वह किस तरह के शरीर भोग करता है। लेकिन जिसकी आँखें ज्ञान में प्रशिक्षित होती हैं, वह यह सब देख सकता है। 

श्लोक 7 से 11

ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः ।
मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ।। 7 ।।

मम — मेरा ; एव — निश्चय ही ; अंशः — सूक्ष्म कण ; जीव-लोके — बद्ध जीवन के संसार में ; जीव-भूतः — बद्धजीव ; सनातनः — शाश्वत ; मनः — मन ; षष्ठानि — छह ; इन्द्रियाणि — इन्द्रियों समेत ; प्रकृति — भौतिक प्रकृति में ; स्थानि — स्थित ; कर्षति — संघर्ष करता है ।

तात्पर्य — इस बद्ध जगत् में सारे शाश्वत अंश हैं। बद्ध जीवन के कारण वे छहों इन्द्रियों से घोर संघर्ष कर रहे हैं, जिनमें मन भी सम्मिलित है ।

शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः
गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात् ।। 8 ।।

शरीरम् — शरीर को ; यत् — जिस ; च — तथा ; अपि — भी ; उत्क्रामति — त्यागता है ; ईश्वरः — शरीर का स्वामी ; गृहीत्वा — ग्रहण करके ; एतानि — इन सबको ; संयाति — चला जाता है ; वायुः — वायु ; गन्धान् — महक को ; इव — सदृश ; आशयात् — स्त्रोत से ।

तात्पर्य — इस संसार में जीव अपनी देहात्मबुद्धि को एक शरीर से दूसरे में उसी तरह ले जाता है, जिस तरह वायु सुगन्धि को ले जाता है। इस प्रकार वह एक शरीर धारण करता है और फिर उसे त्याग कर दूसरा शरीर धारण करता है ।

इसे भी पढ़ें :–

  1. अध्याय चौदह — प्रकृति के तीन गुण
  2. अध्याय पन्द्रह — पुरुषोत्तम योग
  3. 1 से 6 — संसार वृक्ष का कथन और भगवत्प्राप्ति

श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च ।
अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते ।। 9 ।।

श्रोतम् — कान ; चक्षुः — आँखें ; स्पर्शनम् — स्पर्श ; रसनम् — जीभ ; घ्राणाम् — सूँघने की शक्ति ; एव — भी ; च — तथा ; अधिष्ठाय — स्थित होकर ; मनः — मन ; च — भी ; अयम् — यह ; विषयान् — इन्द्रियविषयों को ; उपसेवते — भोग करता है ।

तात्पर्य — इस प्रकार दूसरा स्थूल शरीर धारण करके जीव विशेष प्रकार का कान, आँख, जीभ, नाक तथा स्पर्श इन्द्रिय ( त्वचा ) प्राप्त करता है, जो मन के चारों ओर संपुंजित हैं। इस प्रकार वह इन्द्रियविषयों के एक विशिष्ट समुच्चय का भोग करता है ।

और पढ़ें

उत्क्रामन्तं स्थितं वाऽपि भुञ्जानं वा गुणान्वितम् ।
विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः ।। 10 ।।

उत्क्रामन्तम् — शरीर त्यागते हुए ; स्थितम् — शरीर में रहते हुए ; वा अपि — अथवा ; भुञ्जानम् — भोग करते हुए ; वा — अथवा ; गुण-अन्वितम् — प्रकृति के गुणों के अधीन ; विमूढाः — मुर्ख व्यक्ति ; न — कभी नहीं ; अनुपश्यन्ति — देख सकते हैं ; पश्यन्ति — देख सकते हैं ; ज्ञान-चक्षुषः — ज्ञान रूपी आँखों वाले ।

तात्पर्य — मूर्ख न तो समझ पाते हैं कि जीव किस प्रकार अपना शरीर त्याग सकता है, न ही वे समझ पाते हैं कि प्रकृति के गुणों के अधीन वह किस तरह के शरीर भोग करता है। लेकिन जिसकी आँखें ज्ञान में प्रशिक्षित होती हैं, वह यह सब देख सकता है ।

यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम्
यतन्तोऽप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्याचेतसः ।। 11 ।।

यतन्तः — प्रयास करते हुए ; योगिनः — अध्यात्मवादी, योगी ; च — भी ; एनम् — इसे ; पश्यन्ति — देख सकते हैं ; आत्मनि — अपने में ; अवस्थितम् — स्थित ; यतन्तः — प्रयास करते हुए ; अपि — यद्यपि ; अकृत-आत्मानः — आत्म-साक्षात्कार से विहीन ; न — नहीं ; एनम् — इसे ; पश्यन्ति — देखते हैं ; अचेतसः — अविकसित मनों वाले, अज्ञानी ।

तात्पर्य — आत्म-साक्षात्कार को प्राप्त प्रयत्नशील योगीजन यह सब स्पष्ट रूप से देख सकते हैं। लेकिन जिनके मन विकसित नहीं हैं और जो आत्म-साक्षात्कार को प्राप्त नहीं है, वे प्रयत्न करके भी यह नहीं देख पाते कि क्या हो रहा है ।

आगे के श्लोक :–

Leave a Comment

error: Content is protected !!