Kabandh Uddhar / कबन्ध उद्धार

श्रीरामचरितमानस अरण्यकाण्ड

Kabandh Uddhar
कबन्ध उद्धार

Kabandh Uddhar, कबन्ध उद्धार :- हे पार्वती ! सुनो, वे लोग अभागे हैं जो भगवान् को छोड़कर विषयों से अनुराग करते हैं। फिर दोनों भाई सीताजी को खोजते हुए आगे चले। वे वन की सघनता देखते जाते हैं। दुर्वासाजी ने मुझे शाप दिया था। अब प्रभु के चरणों को देखने से वह पाप मिट गया। [ श्रीरामजी ने कहा – ] हे गन्धर्व ! सुनो, मैं तुम्हें कहता हूँ, ब्राह्मणकुल से द्रोह करने वाला मुझे नहीं सुहाता। मन, वचन और कर्म से कपट छोड़कर जो भूदेव ब्राह्मणों की सेवा करता है, मुझसमेत ब्रह्मा, शिव आदि सब देवता उसके वश में हो जाते हैं।   

कोमल चित अति दीनदयाला। कारन बिनु रघुनाथ कृपाला ।।
गीध अधम खग आमिष भोगी। गति दीन्ही जो जाचत जोगी ।।

अर्थात् :- श्रीरघुनाथजी अत्यन्त कोमल चित्तवाले, दीनदयालु और बिना ही कारण कृपालु हैं। गीध [ पक्षियों में भी ] अधम पक्षी और मांसाहारी था, उसको भी वह दुर्लभ गति दी, जिसे योगीजन माँगते रहते हैं। 

सुनहु उमा ते लोग अभागी। हरि तीज होहिं बिषय अनुरागी ।।
पुनि सीतहि खोजत द्वौ भाई। चले बिलोकत बन बहुताई ।।

अर्थात् :- [ शिवजी कहते हैं – ] हे पार्वती ! सुनो, वे लोग अभागे हैं जो भगवान् को छोड़कर विषयों से अनुराग करते हैं। फिर दोनों भाई सीताजी को खोजते हुए आगे चले। वे वन की सघनता देखते जाते हैं। 

संकुल लता बिटप घन कानन। बहु खग मृग तहँ गज पंचानन ।।
आवत पंथ कबंध निपाता। तेहिं सब कही साप कै बाता ।।

अर्थात् :- वह सघन वन लताओं और वृक्षों से भरा है। उसमें बहुत-से पक्षी, मृग, हाथी और सिंह रहते हैं। श्रीरामजी ने रास्ते में आते हुए कबंध राक्षस को मार डाला। उसने अपने शाप की सारी बात कही। 

दुरबासा मोहि दीन्ही सापा। प्रभु पद पेखि मिटा सो पापा ।।
सुनु गंधर्ब कहउँ मैं तोही। मोहि न सोहाइ ब्रह्मकुल द्रोही ।।

अर्थात् :- [ वह बोला – ] दुर्वासाजी ने मुझे शाप दिया था। अब प्रभु के चरणों को देखने से वह पाप मिट गया। [ श्रीरामजी ने कहा – ] हे गन्धर्व ! सुनो, मैं तुम्हें कहता हूँ, ब्राह्मणकुल से द्रोह करने वाला मुझे नहीं सुहाता। 

दो० — मन क्रम बचन कपट तजि जो कर भूसुर सेव ।
मोहि समेत बिरंचि सिव बस ताकें सब देव ।। 33 ।।

अर्थात् :- मन, वचन और कर्म से कपट छोड़कर जो भूदेव ब्राह्मणों की सेवा करता है, मुझसमेत ब्रह्मा, शिव आदि सब देवता उसके वश में हो जाते हैं।

सापत ताड़त परुष कहंता। बिप्र पूज्य अस गावहिं संता ।।
पूजिअ बिप्र सील गुन हीना। सूद्र न गुन गन ग्यान प्रबीना ।।

अर्थात् :- शाप देता हुआ, मारता हुआ और कठोर वचन कहता हुआ भी ब्राह्मण पूजनीय है, ऐसा संत कहते हैं। शील और गुण से हीन भी ब्राह्मण पूजनीय है। और गुणगणों से युक्त और ज्ञान में निपुण भी शूद्र पूजनीय नहीं है। 

कहि निज धर्म ताहि समुझावा। निज पद प्रीति देखि मन भावा ।।
रघुपति चरन कमल सिरु नाई। गयउ गगन आपनि गति पाई ।।

अर्थात् :- श्रीरामजी ने अपना धर्म ( भागवत-धर्म ) कहकर उसे समझाया। अपने चरणों में प्रेम देखकर वह उनके मन को भाया। तदनन्तर श्रीरघुनाथजी के चरणकमलों में सिर नवाकर वह अपनी गति ( गन्धर्व का स्वरुप ) पाकर आकाश में चला गया। 

ताहि देइ गति राम उदारा। सबरी कें आश्रम पगु धारा ।।
सबरी देखि राम गृहँ आए। मुनि के बचन समुझि जियँ भाए ।।

अर्थात् :- उदार श्रीरामजी उसे गति देकर शबरी जी के आश्रम में पधारे। शबरीजी ने श्रीरामचन्द्रजी को घर में आये देखा, तब मुनि मतङ्गजी के वचनों को याद करके उनका मन प्रसन्न हो गया। 

सरसिज लोचन बाहु बिसाला। जटा मुकुट सिर उर बनमाला ।।
स्याम गौर सुंदर दोउ भाई। सबरी परी चरन लपटाई ।।

अर्थात् :- कमल-सदृश नेत्र और विशाल भुजावाले, सिर पर जटाओं का मुकुट और हृदय पर वनमाला धारण किये हुए सुन्दर साँवले और गोरे दोनों भाइयों के चरणों में शबरीजी लिपट पड़ी। 

प्रेम मगन मुख बचन न आवा। पुनि पुनि पद सरोज सिर नावा ।।
सादर जल लै चरन पखारे। पुनि सुंदर आसन बैठारे ।।

अर्थात् :- वे प्रेम में मग्न हो गयीं, मुख से वचन नहीं निकलता। बार-बार चरण-कमलों में सिर नवा रही हैं। फिर उन्होंने जल लेकर आदरपूर्वक दोनों भाइयों के चरण धोये और फिर उन्हें सुन्दर आसनों पर बैठाया। 

दो० — कंद मूल फल सुरस अति दिए राम कहुँ आनि ।
प्रेम सहित प्रभु खाए बारंबार बखानि ।। 34 ।।

अर्थात् :- उन्होंने अत्यन्त रसीले और स्वादिष्ट कन्द, मूल और फल लाकर श्रीरामजी को दिये। प्रभु ने बार-बार प्रशंसा करके उन्हें प्रेमसहित खाया।  

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