Kajri Teej Vrat Katha / कजरी तीज व्रत कथा और पूजा विधि

Kajri Teej Vrat Katha Aur Puja Vidhi
कजरी तीज व्रत कथा और पूजा विधि


Kajri Teej Vrat Katha Aur Puja Vidhi, कजरी तीज व्रत कथा और पूजा विधि :- हिन्दू धर्म में महिलाएं सुहाग के बहुत से व्रत रखती हैं कजरी तीज भी इन्हीं में से एक है। कजरी तीज भाद्र मास से कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है। कजरी तीज को बोलचाल की भाषा में कजली तीज भी कहा जाता है। वहीं कुछ स्थानों पर इसे बूढी तीज और सातुड़ी तीज के नाम से भी जाना जाता है। यह मुख्य रूप से बनारस तथा मिर्जापुर जिलों में एक विशेष उत्सव के रूप में मनाया जाता है। कजरी की प्रतिद्वन्द्विता भी होती है। प्रायः लोग नावों पर चढ़ कर कजरी गीत गाते हैं। यह वर्षा ऋतु का एक विशेष राग है। ब्रज के मल्हारों की भाँति मिर्जापुर तथा बनारस का यह प्रमुख वर्षा गीत माना जाता है। वैसे, यह पर्व प्रायः समस्त भारत में मनाया जाता है।

कजरी तीज पूजा विधि :-

कजरी तीज के दिन प्रातःकाल स्नान आदि कर घरों में पूड़ी, पकवान, मिष्टान्न आदि बनाये जाते हैं। ग्रामीण भाषा में इसे ‘ तीज ‘ कहते हैं। हिंडोले पर मचलती बहुएँ तथा ग्रामीण बालाएँ इस बिरह-गीत ( कजरी ) को गा-गाकर एक अपूर्व उत्कण्ठा मन में भर देती हैं। वर्षा ऋतु में यह गीत पपीहा, बादलों तथा पुरवा हवाओं के झकझोर में बहुत प्रिय लगता है।

कजरी तीज व्रत कथा :-

कजरी तीज व्रत कथा के अनुसार एक गांव में गरीब ब्राह्मण वास था। उसकी हालत दयनीय थी कि वह दो वक्त का भोजन कर पाता था। ऐसे में एक दिन ब्राह्मण की पत्नी ने कजरी तीज का व्रत रखने का संकल्प लिया और अपने पति से व्रत के लिए चने का सत्तू लाने को कहा। यह बात सुनकर ब्राह्मण परेशान हो गया कि आखिर उसके पास इतने पैसे तो है नहीं, फिर वह सत्तू कहाँ से लेकर आये।

बहरहाल, ब्राह्मण साहूकार की दुकान पर पहुँचा। वहां उसने देखा कि साहुकार सो रहा था। ऐसे में ब्राह्मण चुपके से दुकान में सत्तू लेने चला गया। इतने में साहुकार की नींद खुल गई और उसने ब्राह्मण को देख लिया।

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