Kalyan Vrishti Stotram / कल्याण वृष्टि स्तोत्रम्

Kalyan Vrishti Stotram
कल्याण वृष्टि स्तोत्रम्

Kalyan Vrishti Stotram, कल्याण वृष्टि स्तोत्रम् :- जननि ! मेरी तो बस यही स्पृहा है कि परमोत्कृष्ट सुधा से परिलुप्त तथा उदीयमान अरुण वर्ण सूर्य की समता करने वाले आपके अरुण श्रीविग्रह के संनिकट पहुँचकर आपकी वन्दनाओं के समय मेरे नेत्र अश्रुजल से परिपूर्ण हो जायँ। माँ ! प्रभुत्व भाव से कलुषित ब्रह्मा आदि कितने देवता हो चुके हैं जो प्रत्येक युग में प्रलय से अभिभूत (विनष्ट) हो गये हैं, किन्तु एक वही व्यक्ति स्थिर सिद्धियुक्त विद्यमान रहता है, जो एक बार आपके चरणों में प्रणाम कर लेता है।    

कल्याणवृष्टिभिरिवामृतपूरिताभि-
र्लक्ष्मीस्वयंवरणमङ्गलदीपिकाभिः ।
सेवाभिरम्ब तव पादसरोजमूले
नाकारि किं मनसि भक्तिमतां जनानाम् ।। 1 ।

अर्थात् :- अम्ब ! अमृत से परिपूर्ण कल्याण की वर्षा करने वाली एवं लक्ष्मी को स्वयं वरण करने वाली मंगलमयी दीपमाला की भाँति आपकी सेवाओं ने आपके चरणकमलों में भक्तिभाव रखने वाले मनुष्यों के मन में क्या नहीं कर दिया ? अर्थात् उनके समस्त मनोरथों को पूर्ण कर दिया। 

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एतावदेव जननि स्पृहणीयमास्ते
त्वद्वन्दनेषु सलिलस्थगिते च नेत्रे ।

सांनिध्यमुद्यदरुणायतसोदरस्य
त्वद्विग्रहस्य सुधया परयाप्लुतस्य ।। 2 ।।

अर्थात् :- जननि ! मेरी तो बस यही स्पृहा है कि परमोत्कृष्ट सुधा से परिलुप्त तथा उदीयमान अरुण वर्ण सूर्य की समता करने वाले आपके अरुण श्रीविग्रह के संनिकट पहुँचकर आपकी वन्दनाओं के समय मेरे नेत्र अश्रुजल से परिपूर्ण हो जायँ।

ईशित्वभावकलुषाः कति नाम सन्ति
ब्रह्मादयः प्रतियुगं प्रलयाभिभूताः ।
एकः स एव जननि स्थिरसिद्धिरास्ते
यः पादयोस्तव सकृत् प्रणतिं करोति ।। 3 ।।

अर्थात् :- माँ ! प्रभुत्व भाव से कलुषित ब्रह्मा आदि कितने देवता हो चुके हैं जो प्रत्येक युग में प्रलय से अभिभूत (विनष्ट) हो गये हैं, किन्तु एक वही व्यक्ति स्थिर सिद्धियुक्त विद्यमान रहता है, जो एक बार आपके चरणों में प्रणाम कर लेता है। 

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लब्ध्वा सकृत् त्रिपुरसुन्दरि तावकीनं
कारुण्यकन्दलितकान्तिभरं कटाक्षम् ।
कन्दर्पभावसुभगास्त्वयि भक्तिभाजः
सम्मोहयन्ति तरुणीर्भुवनत्रयेषु ।। 4 ।।

अर्थात् :- त्रिपुरसुन्दरि ! आपमें भक्तिभाव रखने वाले भक्तजन एक बार भी आपके करुणा से अंकुरित सुशोभन कटाक्ष को पाकर कामदेव सदृश सौन्दर्यशाली हो जाते हैं और त्रिभुवन में युवतियों को सम्मोहित कर लेते हैं। 

ह्रींकारमेव तव नाम गृणन्ति वेदा
मातस्त्रिकोणनिलये त्रिपुरे त्रिनेत्रे ।
यत्संस्मृतौ यमभटादिभयं विहाय
दीव्यन्ति नन्दवने सह लोकपालैः ।। 5 ।।

अर्थात् :- त्रिकोण में निवास करने वाली एवं तीन नेत्रों से सुशोभित माता त्रिपुरसुन्दरि ! वेद ‘ह्रीं’ कारको ही आपका नाम बतलाते हैं। वह नाम जिनके संस्मरण में आ गया, वे भक्तजन यमदूतों के भय को त्यागकर लोकपालों के साथ नन्दवन में क्रीडा करते हैं। 

हन्तुः पुरमाधिगलं परिपूर्यमाणः
क्रूरः कथं नु भविता गरलस्य वेगः ।
आश्वासनाय किल मातरिदं तवार्धं
देहस्य शश्वदमृताप्लुतशीतलस्य ।। 6 ।।

अर्थात् :- माता ! निरन्तर अमृत से परिलुप्त होने के कारण शीतल बने हुए आपके शरीर का यह अर्धभाग जिनके साथ संलग्न था, उन त्रिपुराहन्ता शंकरजी के गले में भरा हुआ हलाहल विष का वेग उनके लिये अनिष्टकारक कैसे होता ? 

सर्वज्ञतां सदसि वाक्पटुतां प्रसूते
देवि त्वदङ्घ्रिसरसीरुहयोः प्रणामः ।
किं च स्फुरन्मुकुटमुज्ज्वलमातपत्रं
द्वे चामरे च वसुधां महतीं ददाति ।। 7 ।।

अर्थात् :- देवि ! आपके चरणकमलों में किया हुआ प्रणाम सर्वज्ञता और सभा में वाक्-चातुर्य तो उत्पन्न करता ही है, साथ ही उद्भासित मुकुट, श्वेत छत्र, दो चामर और विशाल पृथ्वी का साम्राज्य भी प्रदान करता है। 

कल्पद्रुमैरभिमतप्रतिपादनेषु
कारुण्यवारिधिभिरम्ब भवत्काटाक्षैः ।
आलोकय त्रिपुरसुन्दरि मामनाथं
त्वय्येव भक्तिभरितं त्वयि दत्तदृष्टिम् ।। 8 ।।

अर्थात् :- माँ त्रिपुरसुन्दरी ! मैं आपकी ही भक्ति से परिपूर्ण हूँ और आपकी ओर ही दृष्टि लगाये हुए हूँ, अतः आप मुझ अनाथ की ओर मनोरथों को पूर्ण करने में कल्पवृक्ष सदृश एवं करुणा सागर स्वरूप अपने कटाक्षों से देख तो लें।

हन्तेतरेष्वपि मनांसि निधाय चान्ये
भक्तिं वहन्ति किल पामरदैवतेषु ।
त्वामेव देवि मनसा वचसा स्मरामि
त्वामेव नौमि शरणं जगति त्वमेव ।। 9 ।।

अर्थात् :- देवि ! खेद है कि अन्यान्य जन आपके अतिरिक्त अन्य साधारण देवताओं में भी मन लगाकर उनकी भक्ति करते हैं, किंतु मैं मन और वचन से आपका ही स्मरण करता हूँ, आपको ही प्रणाम करता हूँ; क्योंकि जगत् में आप ही शरणदात्री हैं।

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