Sankhya Siddhant Ka Kathan / सांख्य सिद्धान्त का कथन

अध्याय अठारह उपसंहार

Karmon Ke Hone Mein Sankhya Siddhant Ka Kathan
कर्मों के होने में सांख्य सिद्धान्त का कथन

Karmon Ke Hone Mein Sankhya Siddhant Ka Kathan, कर्मों के होने में सांख्य सिद्धान्त का कथन- हे महाबाहु अर्जुन ! वेदान्त के अनुसार समस्त कर्म की पूर्ति के लिए पाँच कारण हैं। अब तुम इन्हें मुझसे सुनो। कर्म का स्थान ( शरीर ), कर्ता, विभिन्न इन्द्रियाँ, अनेक प्रकार की चेष्टाएँ तथा परमात्मा — ये पाँच कर्म के कारण हैं। मनुष्य अपने शरीर, मन या वाणी से जो भी उचित या अनुचित कर्म करता है, वह इन पाँच कारणों के फलस्वरूप होता है।

श्लोक 13 से 18

पञ्चैतानि महाबाहो कारणानि निबोध मे ।
सांख्ये कृतान्ते प्रोक्तानि सिद्धये सर्वकर्मणाम् ।। 13 ।।

पञ्च — पाँच ; एतानि — ये ; महा-बाहो — हे महाबाहु ; कारणानि — कारण ; निबोध — जानो ; मे — मुझसे ; साङ्ख्ये — वेदान्त में ; कृत-अन्ते — निष्कर्ष रूप में ; प्रोक्तानि — कहा गया ; सिद्धये — सिद्धि के लिए ; सर्व — समस्त ; कर्मणाम् — कर्मों का ।

तात्पर्य — हे महाबाहु अर्जुन ! वेदान्त के अनुसार समस्त कर्म की पूर्ति के लिए पाँच कारण हैं। अब तुम इन्हें मुझसे सुनो ।

अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्
विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पञ्चमम् ।। 14 ।।

अधिष्ठानम् — स्थान ; तथा — और ; कर्ता — करने वाला ; करणम् — उपकरण यन्त्र ( इन्द्रियाँ ) ; च — तथा ; पृथक्-विधम् — विभिन्न प्रकार के ; विविधाः — नाना प्रकार के ; च — तथा ; पृथक् — पृथक-पृथक ; चेष्टाः — प्रयास ; दैवम् — परमात्मा ; च — भी ; एव — निश्चय ही ; अत्र — यहाँ ; पञ्चमम् — पाँचवा ।

तात्पर्य — कर्म का स्थान ( शरीर ), कर्ता, विभिन्न इन्द्रियाँ, अनेक प्रकार की चेष्टाएँ तथा परमात्मा — ये पाँच कर्म के कारण हैं ।

इसे भी पढ़ें :–

  1. अध्याय सत्रह — श्रद्धा के विभाग
  2. अध्याय अठारह — उपसंहार – संन्यास की सिद्धि
  3. 1 से 12 — त्याग का विषय

शरीरवाङ्मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः ।
न्याय्यं वा विपरीतं वा पञ्चैते तस्य हेतवः ।। 15 ।।

शरीर — शरीर से ; वाक् — वाणी से ; मनोभिः — तथा मन से ; यत् — जो ; कर्म — कर्म ; प्रारभते — प्रारम्भ करता है ; नरः — व्यक्ति ; न्याय्यम् — उचित, न्यायपूर्ण ; वा — अथवा ; विपरीतम् — ( न्याय ) विरुद्ध ; वा — अथवा ; पञ्च — पाँच ; एते — ये सब ; तस्य — उसके ; हेतवः — कारण ।

तात्पर्य — मनुष्य अपने शरीर, मन या वाणी से जो भी उचित या अनुचित कर्म करता है, वह इन पाँच कारणों के फलस्वरूप होता है ।

तत्रैवं सति कर्तारमात्मानं केवलं तु यः ।
पश्यत्यकृतबुद्धित्वान्न स पश्यति दुर्मतिः ।। 16 ।।

तत्र — वहाँ ; एवम् — इस प्रकार ; सति — होकर ; कर्तारम् — कर्ता ; आत्मानम् — स्वयं का ; केवलम् — केवल ; तु — लेकिन ; यः — जो ; पश्यति — देखता है ; अकृत-बुद्धित्वात् — कुबुद्धि के कारण ; न —  कभी नहीं ; सः — वह ; पश्यति — देखता है ; दुर्मतिः — मूर्ख ।

तात्पर्य — अतएव जो इन पाँचों कारणों को न मान कर अपने आपको ही एकमात्र कर्ता मानता है, वह निश्चय ही बहुत बुद्धिमान नहीं होता और वस्तुओं को सही रूप में नहीं देख सकता ।

यस्य नाहंकृतो भावो बुद्धिर्यस्य न लिप्यते ।
हत्वापि स इमाँल्लकान्न हन्ति न निबध्यते ।। 17 ।।

यस्य — जिसके ; न — नहीं ; अहङ्कृत — मिथ्या अहंकार का ; भावः — स्वभाव ; बुद्धिः — बुद्धि ; यस्य — जिसकी ; न — कभी नहीं ; लिप्यते — आसक्त होता है ; हत्वा — मारकर ; अपि — भी ; सः — वह ; इमान् — इस ; लोकान् — संसार को ; न — कभी नहीं ; हन्ति — मारता है ; न — कभी नहीं ; निबध्यते — बद्ध होता है।

तात्पर्य — जो मिथ्या अहंकार से प्रेरित नहीं है, जिसकी बुद्धि बँधी नहीं है, वह इस संसार में मनुष्यों को मारता हुआ भी नहीं मारता। न ही वह अपने कर्मों से बँधा होता है।

ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना
करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसङ्ग्रह ।। 18 ।।  

ज्ञानम् — ज्ञान ; ज्ञेयम् — ज्ञान का लक्ष्य ( जानने योग्य ) ; परिज्ञाता — जानने वाला ; त्रि-विधा — तीन प्रकार के ; कर्म —  कर्म की ; चोदना — प्रेरणा ( अनुप्रेरणा ) ; करणम् — इन्द्रियाँ ; कर्म — कर्म ; कर्ता — कर्ता ; इति — इस प्रकार ; त्रि-विधः — तीन प्रकार के ; कर्म — कर्म के ; सङ्ग्रह — संग्रह, संचय। 

तात्पर्य — ज्ञान, ज्ञेय तथा ज्ञाता — ये तीनों कर्म की प्रेरणा देने वाले कारण हैं। इन्द्रियाँ ( करण ), कर्म तथा कर्ता — ये तीन कर्म के संघटक हैं।

आगे के श्लोक :–

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