Karmyog Ka Vishay Aur Yogarudh Purush / कर्मयोग का विषय

अध्याय छह ध्यानयोग

Karmyog Ka Vishay Aur Yogarudh Purush Ke Lakshan
कर्मयोग का विषय और योगारूढ़ पुरुष के लक्षण

Karmyog Ka Vishay Aur Yogarudh Purush Ke Lakshan, कर्मयोग का विषय और योगारूढ़ पुरुष के लक्षण। श्रीभगवान् ने कहा — जो पुरुष अपने कर्मफल के प्रति अनासक्त है और जो अपने कर्तव्य का पालन करता है, वही संन्यासी और असली योगी है। वह नहीं, जो न तो अग्नि जलाता है और न कर्म करता है। जब कोई पुरुष समस्त भौतिक इच्छाओं का त्याग करके न तो इन्द्रियतृप्ति के लिए कार्य करता है और न सकामकर्मों में प्रवृत्त होता है तो वह योगारूढ़ कहलाता है। 

श्लोक 1 से 4

अनाश्रितः कर्मफलं कार्यं कर्म करोति यः ।
स सन्न्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रियः ।। 1 ।।

श्रीभगवान् उवाच — श्रीभगवान् ने कहा; अनाश्रितः — शरण ग्रहण किये बिना; कर्म-फलम् — कर्मफल की; कार्यम् — कर्त्तव्य; कर्म — कर्म; करोति — करता है; यः — जो; सः — वह; सन्न्यासी — संन्यासी; च — भी; योगी — योगी; च — भी;    न — नहीं; निः — रहित; अग्निः — अग्नि; न — न तो; च — भी; अक्रियः — क्रियाहीन।

तात्पर्य — श्रीभगवान् ने कहा — जो पुरुष अपने कर्मफल के प्रति अनासक्त है और जो अपने कर्तव्य का पालन करता है, वही संन्यासी और असली योगी है। वह नहीं, जो न तो अग्नि जलाता है और न कर्म करता है।

यं संन्यासमिति प्राहुर्योगं तं विद्धि पाण्डव
न ह्यसन्न्यस्तसङ्कल्पो योगी भवति कश्चन ।। 2 ।।

यम् — जिसको; संन्यासम् — संन्यास; इति — इस प्रकार; प्राहुः — कहते हैं; योगम् — परब्रह्म के साथ युक्त होना; तम् — उसे; विद्धि — जानो; पाण्डव — हे पाण्डुपुत्र; न — कभी नहीं; हि — निश्चय ही; असन्न्यस्त — बिना त्यागे; सङ्कल्प — आत्मतृप्ति की इच्छा; योगी — योगी; भवति — होता है; कश्चन — कोई। 

तात्पर्य — हे पाण्डुपुत्र ! जिसे संन्यास कहते हैं, उसे ही तुम योग अर्थात् परब्रह्म से युक्त होना जानो क्योंकि इन्द्रियतृप्ति के लिए इच्छा को त्यागे बिना कोई कभी योगी नहीं हो सकता।

इसे भी पढ़ें :–

  1. भगवद्गीता यथारूप हिंदी में
  2. अधयाय चार — दिव्य ज्ञान
  3. अध्याय पाँच — कृष्णभावनाभावित कर्म
  4. अध्याय छह — ध्यानयोग

 आरुरुक्षोर्मुनेर्योगं कर्म कारणमुच्यते ।
योगारूढस्य तस्यैव शमः कारणमुच्यते ।। 3 ।।

आरुरुक्षोः — जिसने अभी योग प्रारम्भ किया है; मुनेः — मुनि को; योगम् — अष्टांगयोग पद्धति; कर्म — कर्म; कारणम् — साधन; उच्यते — कहलाता है; योग — अष्टांगयोग; आरूढस्य — प्राप्त होने वाले का; तस्य — उसका; एव — निश्चय ही; शमः — सम्पूर्ण भौतिक कार्यकलापों का त्याग; कारणम् — कारण; उच्यते — कहा जाता है। 

तात्पर्य — अष्टांग योग के नवसाधक के लिए कर्म साधन कहलाता है और योगसिद्ध पुरुष के लिए समस्त भौतिक कार्यकलापों का परित्याग ही साधन कहा जाता है।

 यदा हि नेन्द्रियार्थेषु न कर्मस्वनुषज्जते ।
सर्वसङ्कल्पसंन्यासी योगारूढ़स्तदोच्यते ।। 4 ।।

यदा — जब; हि — निश्चय ही; न — नहीं; इन्द्रिय-अर्थेषु — इन्द्रियतृप्ति में; न — कभी नहीं; कर्मसु — सकाम कर्म में; अनुषज्जते — निरत रहता है; सर्व-सङ्कल्प — समस्त भौतिक इच्छाओं का; संन्यासी — त्याग करने वाला; योग-आरूढ़ — योग में स्थित; तदा — उस समय; उच्यते — कहलाता है। 

तात्पर्य — जब कोई पुरुष समस्त भौतिक इच्छाओं का त्याग करके न तो इन्द्रियतृप्ति के लिए कार्य करता है और न सकामकर्मों में प्रवृत्त होता है तो वह योगारूढ़ कहलाता है।

आगे के श्लोक :–

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