Kewat Ka Prem Aur Ganga Paar Jana / केवट का प्रेम

श्रीरामचरितमानस अयोध्या काण्ड

Kewat Ka Prem Aur Ganga Paar Jana
केवट का प्रेम और गङ्गा पार जाना

Kewat Ka Prem Aur Ganga Paar Jana, केवट का प्रेम और गंगा पार जाना — श्रीरामजी ने केवट से नाव माँगी, पर वह लाता नहीं। वह कहने लगा – मैंने तुम्हारा मर्म ( भेद ) जान लिया। तुम्हारे चरण कमलों की धूल के लिये सब लोग कहते हैं कि वह मनुष्य बना देनेवाली कोई जड़ी है। जिसको छूते ही पत्थर शिला सुन्दरी स्त्री हो गयी [ मेरी नाव तो काठ की है ]। काठ पत्थर से कठोर तो नहीं। मेरी नाव भी मुनि की स्त्री हो जायगी और इस प्रकार मेरी नाव उड़ जायगी, मैं लुट जाऊँगा [ अथवा रास्ता रुक जायगा जिससे आप पार न हो सकेंगे और मेरी रोजी मारी जायगी ] ( मेरी कमाने-खाने की राह ही मारी जायगी )। 


जासु बियोग बिकल पसु ऐसें। प्रजा मातु पितु जिइहहिं कैसें ।।

बरबस राम सुमंत्रु पठाए। सुरसरि तीर आपु तब आए ।।

अर्थात् :- जिनके वियोग में पशु इस प्रकार व्याकुल हैं, उनके वियोग में प्रजा, माता और पिता कैसे जीते रहेंगे ? श्रीरामचन्द्रजी ने जबर्दस्ती सुमन्त्रजी को लौटाया। तब आप गङ्गाजी के तीर पर आये।

मागी नाव न केवटु आना। कहइ तुम्हार मरमु मैं जाना ।।
चरन कमल रज कहुँ सब कहई। मानुष करनि मूरि कछु अहई ।।

अर्थात् :- श्रीरामजी ने केवट से नाव माँगी, पर वह लाता नहीं। वह कहने लगा – मैंने तुम्हारा मर्म ( भेद ) जान लिया। तुम्हारे चरण कमलों की धूल के लिये सब लोग कहते हैं कि वह मनुष्य बना देनेवाली कोई जड़ी है।

छुअत सिला भइ नारि सुहाई। पाहन तें न काठ कठिनाई ।।
तरनिउ मुनि घरिनी होइ जाई। बाट परइ मोरि नाव उड़ाई ।।

अर्थात् :- जिसको छूते ही पत्थर शिला सुन्दरी स्त्री हो गयी [ मेरी नाव तो काठ की है ]। काठ पत्थर से कठोर तो नहीं। मेरी नाव भी मुनि की स्त्री हो जायगी और इस प्रकार मेरी नाव उड़ जायगी, मैं लुट जाऊँगा [ अथवा रास्ता रुक जायगा जिससे आप पार न हो सकेंगे और मेरी रोजी मारी जायगी ] ( मेरी कमाने-खाने की राह ही मारी जायगी )।

एहिं प्रतिपालउँ सबु परिवारू। नहिं जानउँ कछु अउर कबारू ।।
जौं प्रभु पार अवसि गा चहहू। मोहि पद पदुम पखारन कहहू ।।

अर्थात् :- मैं तो इसी नाव से सारे परिवार का पालन-पोषण करता हूँ। दूसरा कोई धंधा नहीं जानता। हे प्रभु ! यदि तुम अवश्य ही पार जाना चाहते हो तो मुझे पहले अपने चरण कमल पखारने ( धो लेने ) के लिये कह दो।

छं० — पद कमल धोइ चढ़ाइ नाव न नाथ उतराई चहौं ।
मोहि राम राउरि आन दसरथ सपथ सब साची कहौं ।।
बरु तीर मारहुँ लखनु पै जब लगि न पाय पखारिहौं ।
तब लगि न तुलसीदास नाथ कृपाल पारु उतारिहौं ।।

अर्थात् :- हे नाथ ! मैं चरणकमल धोकर आपलोगों को नाव पर चढ़ा लूँगा ; मैं आपसे उतराई नहीं चाहता। हे राम ! मुझे आपकी दुहाई और दशरथजी की सौगंध है, मैं सब सच-सच कहता हूँ। लक्ष्मणजी भले ही मुझे तीर मारें, पर जबतक मैं पैरों को पखार न लूँगा, तब तक हे तुलसीदासजी के नाथ ! हे कृपालु ! मैं पार नहीं उतारूँगा।

सो० — सुनि केवट के बैन प्रेम लपेटे अटपटे ।
बिहसे करुनाऐन चितइ जानकी लखन तन ।। 100 ।।

अर्थात् :- केवट के प्रेम में लपेटे हुए अटपटे वचन सुनकर करुणाधाम श्रीरामचन्द्रजी जानकीजी और लक्ष्मणजी की ओर देखकर हँसे।

कृपासिंधु बोले मुसुकाई। सोइ करु जेहिं तव नाव जाई ।।
बेगि आनु जल पाय पखारू। होत बिलंबु उतारहि पारू ।।

अर्थात् :- कृपा के समुद्र श्रीरामचन्द्रजी केवट से मुसकराकर बोले – भाई ! तू वही कर जिससे तेरी नाव न जाय। जल्दी पानी ला और पैर धो ले। देर हो रही है, पार उतार दे।

जासु नाम सुमिरत एक बारा। उतरहिं नर भवसिंधु अपारा ।।
सोइ कृपालु केवटहि निहोरा। जेहिं जगु किय तिहु पगहु ते थोरा ।।

अर्थात् :- एक बार जिनका नाम स्मरण करते ही मनुष्य अपार भवसागर के पार उतर जाते हैं, और जिन्होंने [ वामनावतार में ] जगत् के तीन पग से भी छोटा कर दिया था ( दो ही पग में त्रिलोकी को नाप लिया था ), वही कृपालु श्रीरामचन्द्रजी [ गङ्गाजी से पार उतारने के लिये ] केवट का निहोरा कर रहे हैं।

पद नख निरखि देवसरि हरषी। सुनि प्रभु बचन मोहँ मति करषी ।।
केवट राम रजायसु पावा। पानि कठवता भरि लेइ आवा ।।

अर्थात् :- प्रभु के वचनों को सुनकर गङ्गाजी की बुद्धि मोह से खिंच गयी थी [ कि ये साक्षात् भगवान् होकर भी केवट का निहोरा कैसे रहे हैं ] परन्तु [ समीप आने पर अपनी उत्पत्ति के स्थान ] पदनखों को देखते ही [ उन्हें पहचानकर ] देवनदी गङ्गाजी हर्षित हो गयीं। ( वे समझ गयीं कि भगवान् नर लीला कर रहे हैं, इससे उनका मोह नष्ट हो गया ; और इन चरणों का स्पर्श प्राप्त करके मैं धन्य होऊँगी, यह विचारकर वे हर्षित हो गयीं। ) केवट श्रीरामचन्द्रजी की आज्ञा पाकर कठौते में भरकर जल ले आया।

अति आनंद उमगि अनुरागा। चरन सरोज पखारन लागा ।।
बरषि सुमन सुर सकल सिहाहीं। एहि सम पुन्यपुंज कोउ नाहीं ।।

अर्थात् :- अत्यन्त आनन्द और प्रेम में उमँग कर वह भगवान् के चरणकमल धोने लगा। सब देवता फूल बरसाकर सिहाने लगे कि इसके समान पुण्य की राशि कोई नहीं है।

दो० — पद पखारि जलु पान करि आपु सहित परिवार ।
पितर पारु करि प्रभुहि पुनि मुदित गयउ लेइ पार ।। 101 ।।

अर्थात् :- चरणों को धोकर और सारे परिवार सहित स्वयं उस जल ( चरणोदक ) को पीकर पहले [ उस महान् पुण्य के द्वारा ] अपने पितरों को भवसागर से पारकर फिर आनन्दपूर्वक प्रभु श्रीरामचन्द्रजी को गङ्गाजी के पार ले गया।

उतरि ठाढ़ भए सुरसरि रेता। सीय रामु गुह लखन समेता ।।
केवट उतरि दंडवत कीन्हा। प्रभुहि सकुच एहि नहिं कछु दीन्हा ।।

अर्थात् :- निषादराज और लक्ष्मणजी सहित श्रीसीताजी और श्रीरामचन्द्रजी [ नाव से ] उतरकर गङ्गाजी की रेत ( बालू ) में खड़े हो गये। तब केवट ने उतरकर दण्डवत् की। [ उसको दण्डवत् करते देखकर ] प्रभु को संकोच हुआ कि इसको कुछ दिया नहीं।

पिय हिय की सिय जाननिहारी। मनि मुदरी मन मुदित उतारी ।।
कहेउ कृपाल लेहि उतराई। केवट चरन गहे अकुलाई ।।

अर्थात् :- पति के हृदय की जानने वाली सीताजी ने आनन्द भरे मन से अपनी रत्नजटित अँगूठी [ अँगुली से ] उतारी। कृपालु श्रीरामचन्द्रजी ने केवट से कहा, नाव की उतराई लो। केवट ने व्याकुल होकर चरण पकड़ लिये।

नाथ आजु मैं काह न पावा। मिटे दोष दुख दारिद दावा ।।
बहुत काल मैं कीन्हि मजूरी। आजु दीन्ह बिधि बनि भलि भूरी ।।

अर्थात् :- [ उसने कहा – ] हे नाथ ! आज मैंने क्या नहीं पाया ! मेरे दोष, दुःख और दरिद्रता की आग आज बुझ गयी है। मैंने बहुत समय तक मजदूरी की। विधाता ने आज बहुत अच्छी भरपूर मजदूरी दे दी।

अब कछु नाथ न चाहिअ मोरें। दीनदयाल अनुग्रह तोरें ।।
फिरती बार मोहि जो देबा। सो प्रसादु मैं सिर धरि लेबा ।।

अर्थात् :- हे नाथ ! हे दीनदयाल ! आपकी कृपा से अब मुझे कुछ नहीं चाहिये। लौटती बार आप मुझे जो कुछ देंगे, वह प्रसाद मैं सिर चढ़ाकर लूँगा।

दो० — बहुत कीन्ह प्रभु लखन सियँ नहिं कछु केवटु लेइ ।
बिदा कीन्ह करुनायतन भगति बिमल बरु देइ ।। 102 ।।

अर्थात् :- प्रभु श्रीरामजी, लक्ष्मणजी और सीताजी ने बहुत आग्रह [ या यत्न ] किया, पर केवट कुछ नहीं लेता। तब करुणा के धाम भगवान् श्रीरामचन्द्रजी ने निर्मल भक्ति का वरदान देकर उसे विदा किया।

तब मज्जनु करि रघुकुलनाथा। पूजि पारथिव नायउ माथा ।।
सियँ सुरसरिहि कहेउ कर जोरी। मातु मनोरथ पुरउबि मोरी ।।

अर्थात् :- फिर रघुकुल के स्वामी श्रीरामचन्द्रजी ने स्नान करके पार्थिव पूजा की और शिवजी को सिर नवाया। सीताजी ने हाथ जोड़कर गङ्गाजी से कहा – हे माता ! मेरा मनोरथ पूरा कीजियेगा।

पति देवर सँग कुसल बहोरी। आइ करौं जेहिं पूजा तोरी ।।
सुनि सिय बिनय प्रेम रस सानी। भइ तब बिमल बारि बर बानी ।।

अर्थात् :- जिससे मैं पति और देवर के साथ कुशलपूर्वक लौट आकर तुम्हारी पूजा करूँ। सीताजी की प्रेमरस में सनी हुई विनती सुनकर तब गङ्गाजी के निर्मल जल से श्रेष्ठ वाणी हुई। –

सुनु रघुबीर प्रिया बैदेही। तव प्रभाउ जग बिदित न केही ।।
लोकप होहिं बिलोकत तोरें। तोहि सेवहिं सब सिधि कर जोरें ।।

अर्थात् :- हे रघुवीर की प्रियतमा जानकी ! सुनो, तुम्हारा प्रभाव जगत् में किसे नहीं मालुम है ? तुम्हारे [ कृपा दृष्टि से ] देखते ही लोग लोकपाल हो जाते हैं। सब सिद्धियाँ हाथ जोड़े तुम्हारी सेवा करती हैं।

तुम्ह जो हमहि बड़ि बिनय सुनाई। कृपा कीन्हि मोहि दीन्हि बड़ाई ।।
तदपि देबि मैं देबि असीसा। सफल होन हित निज बागीसा ।।

अर्थात् :- तुमने जो मुझको बड़ी विनती सुनायी, यह तो मुझ पर कृपा की और मुझे बड़ाई दी है। तो भी हे देवि ! मैं अपनी वाणी सफल होने के लिये तुम्हें आशीर्वाद दूँगी।

दो० — प्राननाथ देवर सहित कुसल कोसला आइ ।
पूजिहि सब मनकामना सुजसु रहिहि जग छाइ ।। 103 ।।

अर्थात् :- तुम अपने प्राणनाथ और देवर सहित कुशल पूर्वक अयोध्या लौटोगी। तुम्हारी सारी मनःकामनाएँ पूरी होंगी और तुम्हारा सुन्दर यश जगत् भर में छा गया।

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