Khatu Shyam Ji Ki Vrat Katha / खाटू श्याम जी की व्रत कथा

Khatu Shyam Ji Ki Vrat Katha Aur Puja Vidhi
खाटू श्याम जी की व्रत कथा और पूजा विधि


Khatu Shyama Ji Ki Vrat Katha Aur Puja Vidhi, खाटू श्याम जी की व्रत कथा और पूजा विधि :- फाल्गुन शुक्ल पक्ष द्वादशी को श्याम जी की जात लगाई जाती है।

खाटू श्याम जी की पूजा विधि :-

एक जगह थोड़ी सी मिट्टी बिछाकर उसके ऊपर एक घी का दीपक रखें। दीपक के नीचे थोड़ा चावल भी रखें। फिर दीपक के आगे आग रखना चाहिए। अग्नि में घी डालें। रोली, चावल, जल, फूल तथा नारियल आदि चढ़ाकर दण्डवत करें। इस दिन ब्राह्मण-भोजन भी कराना चाहिये। प्रसाद उसी दिन खा लेना चाहिये।

खाटू श्याम जी की व्रत कथा :-

हिन्दू धर्म के अनुसार, श्रीकृष्ण बर्बरीक के महान बलिदान से काफी प्रसन्न हुए और वरदान दिया कि जैसे-जैसे कलियुग का अवतरण होगा, तुम श्याम के नाम से पूजे जाओगे। तुम्हारे भक्तों का केवल तुम्हारे नाम का सच्चे दिल से उच्चारण मात्र से उद्धार हो जायेगा और उनकी सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होंगी।

श्री श्याम बाबा की कथा मध्यकालीन महाभारत से प्रारम्भ होती है। वे पहले बर्बरीक के नाम से जाने जाते थे। वे अति बलशाली गदाधारी भीम के पुत्र घटोत्कच और दैत्य मूर की पुत्री मोरवी के पुत्र हैं। बचपन से ही वे बहुत वीर और महान योद्धा थे साथ ही युद्ध कला अपनी माँ और श्रीकृष्ण भगवान् से सीखी थी। नव दुर्गा की घोर तपस्या करके उन्हें प्रसन्न किया और तीन अमोघ बाण प्राप्त किये, इसके कारण वे तीन बाणधारी के नाम से प्रसिद्ध हुए। अग्निदेव उनसे प्रसन्न होकर उन्हें धनुष प्रदान किया जो तीनों लोकों में विजयी बनाने का सामर्थ्य रखता था।

महाभारत के युद्ध की घोषणा सुन बर्बरीक अपनी माँ से आशीर्वाद लिया और अपनी माँ को वचन दिया कि जो पक्ष हारेगा उसका साथ देगा। वे नील रंग के घोड़े पर सवार होकर तीन बाण और धनुष के साथ कुरुक्षेत्र के युद्ध भूमि की ओर चल दिए।

श्री कृष्ण ने ब्राह्मण का वेष बनाकर बर्बरीक की परीक्षा लेने की सोच उनके सामने पहुँच गए। उन्होंने बर्बरीक की हंसी उड़ाई और कहा कि मात्र तीन बाण से युद्ध कैसे जीता जा सकता है। तब बर्बरीक ने कहा कि एक ही तीर युद्ध में शत्रु को हराने के लिए काफी है और अगर तीनों बाणों का उपयोग किया गया तो ब्रह्माण्ड का विनाश हो जायेगा। यह जानकार श्रीकृष्ण ने उन्हें चुनौती दी कि पीपल के पेड़ के सभी पत्तों को भेद कर दिखाए। वे दोनों पीपल के पेड़ के निचे पहुँचे। बर्बरीक ने चुनौती स्वीकार की और अपने तूणीर से एक बाण निकाला और ईश्वर का स्मरण कर बाण छोड़ दिया पल भर में बाण सभी पत्तों को भेद श्रीकृष्ण के पाँव के इर्द-गिर्द घूमने लगा, क्योंकि एक पत्ता उन्होंने अपने पाँव के नीचे छुपा लिया था तभी बर्बरीक ने कहा कि आप अपने पाँव हटा लें नहीं तो ये आपके पैर को भेद देगा। तत्पश्चात्, श्री कृष्ण ने बर्बरीक से पूछा कि वह युद्ध में किस ओर हिस्सा लेगा ; तो बर्बरीक ने अपने माँ को दिए वचन को दोहराया कि जो पक्ष निर्बल और हार रहा होगा वह उसी की सहायता करेगा। श्री कृष्ण जानते थे कि युद्ध में हार कौरवों की निश्चित है और इस कारण अगर बर्बरीक ने उनका साथ दिया तो परिणाम गलत पक्ष में जायेगा।

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