Kishkindha Mangal Aachran / किष्किन्धा मंगल आचरण

श्रीरामचरितमानस किष्किन्धाकाण्ड

Kishkindha Mangal Aachran
किष्किन्धा मंगल आचरण

।। श्री गणेशाय नमः ।।
श्रीजानकीवल्लभो विजयते

श्रीरामचरितमानस
चतुर्थ सोपान

किष्किन्धाकाण्ड

श्लोक
कुन्देन्दीवरसुन्दरावतिबलौ विज्ञानधामावुभौ
शोभाढ्यौ वरधन्विनौ श्रुतिनुतौ गोविप्रवृन्दप्रियौ ।
मायामानुषरुपिणौ रघुवरौ सद्धर्मवर्मौ हितौ
सीतान्वेषणतत्परौ पथिगतौ भक्तिप्रदौ तौ हि नः ।। 1 ।।

अर्थात् :- कुन्दपुष्प और नील कमल के समान सुन्दर गौर एवं श्यामवर्ण, अत्यन्त बलवान्, विज्ञान के धाम, शोभा सम्पन्न, श्रेष्ठ धनुर्धर, वेदों के द्वारा वन्दित, गौ एवं ब्राह्मणों के समूह के प्रिय [ अथवा प्रेमी ], माया के मनुष्यरूप धारण किये हुए, पथिक रूप रघुकुल के श्रेष्ठ श्रीरामजी और श्रीलक्ष्मणजी दोनों भाई निश्चय ही हमें भक्तिप्रद हों। 

ब्रह्माम्भोधिसमुद्भवं कलिमलप्रध्वंसनं चाव्ययं
श्रीमच्छम्भुमुखेन्दुसुन्दरवरे संशोभितं सर्वदा ।
संसारामयभेषजं सुखकरं श्रीजानकीजीवनं
धन्यास्ते कृतिनः सततं श्रीरामनामामृतम् ।। 2 ।।

अर्थात् :- वे सुकृती ( पुण्यात्मा पुरुष ) धन्य हैं जो वेदरूपी समुद्र [ के मथने ] से उत्पन्न हुए कलियुग के मल को सर्वथा नष्ट कर देनेवाले, अविनाशी, भगवान् श्रीशम्भु के सुन्दर एवं श्रेष्ठ मुखरूपी चन्द्रमा में सदा शोभायमान, जन्म-मरण की रोग के औषध, सबको सुख देनेवाले और श्रीजानकीजी के जीवनस्वरूप श्रीरामनामरूपी अमृत का निरन्तर पान करते रहते हैं।  

सो० — मुक्ति जन्म महि जानि ग्यान खानि अघ हानि कर ।
जहँ बस संभु भवानि सो कासी सेइअ कस न ।।

अर्थात् :- जहाँ श्रीशिव-पार्वती बसते हैं, उस काशी को मुक्ति की जन्मभूमि, ज्ञान की खान और पापों का नाश करने वाली जानकर उसका सेवन क्यों न किया  जाय ?

जरत सकल सुर बृंद बिषम गरल जेहिं पान किय।
तेहि न भजसि मन मंद को कृपाल संकर सरिस ।।

अर्थात् :- जिस भीषण हलाहल विष से सब देवतागण जल रहे थे जिन्होंने स्वयं पान कर लिया, रे मन्द मन ! तू उन शङ्करजी को क्यों नहीं भजता ? उनके समान कृपालु [ और ] कौन हैं ?

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