Kokila Vrat Katha Aur Puja Vidhi / कोकिला व्रत कथा

Kokila Vrat Katha Aur Puja Vidhi
कोकिला व्रत कथा और पूजा विधि


Kokila Vrat Katha Aur Puja Vidhi, कोकिला व्रत कथा और पूजा विधि :- आषाढ़ मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी से लेकर सावन मास की पूर्णिमा को कोकिला व्रत किया जाता है। विशेष तौर पर यह दक्षिण भारत का व्रत है। इस व्रत में आदिशक्ति मां भगवती की कोयल रूप में पूजा की जाती है। इसे सौभाग्यवती औरतें ही किया करती हैं।

कोकिला व्रत पूजा विधि :-

कोकिला व्रत करने वाली स्त्री को चाहिये कि प्रातः सूर्योदय से पूर्व उठें तथा स्नान-दातुन करने के उपरान्त सुगन्धित इत्र लगायें। यह नियम आठ दिन करना चाहिए। तत्पश्चात् उबटन लगाकर प्रातःकाल भगवान् भास्कर की पूजा करनी चाहिये।

कोकिला व्रत कथा :-

एक बार दक्ष प्रजापति ने बहुत बड़ा यज्ञ किया। उस यज्ञ में समस्त देवताओं को तो आमंत्रित किया परन्तु अपने दामाद भगवान शंकर को आमंत्रित नहीं किया। यह बात जब सती को मालूम हुई तो उन्होंने भगवान शंकर से अपने मायके जाने का आग्रह किया। शंकर जी ने बहुत समझाया-बुझाया कि बिना निमंत्रण के कहीं न जाना चाहिये ; किन्तु सती ने एक न मानी और मायके चली गईं। मायके में सती का बहुत बड़ा अपमान तथा अनादर हुआ जिसको सहन न कर सकने के कारण वे यज्ञ की अग्नि में कूदकर भस्म हो गईं। उधर भगवान शंकर को जब यह खबर मिली तो उन्होंने क्रोधित होकर यज्ञ विध्वंस करने के लिए वीरभद्र नामक अपने गण को भेजा। वीरभद्र ने दक्ष के यज्ञ को खंडित कर तमाम देवताओं को अंग-अंग करके भगा दिया। इस विप्लव से आक्रांत होकर भगवान् विष्णु शंकर जी के पास गये तथा देवों को पूर्ववत् रूप में बनाने को कहा। इस पर भगवान पशुपति ने देवताओं को तो ज्यों का त्यों रूप दे दिया मगर आज्ञा उल्लंघन करने वाली सती को क्षमा न कर सके। उन्हें दस हजार वर्ष तक कोकिला-पक्षी बनकर विचरण करने का शाप दिया। सती ( कोकिला ) रूप में दस हजार वर्ष तक नन्दन-वन में रहीं। तत्पश्चात् पार्वती का जन्म पाकर, आषाढ़ में नियमित एक मास तक यह व्रत किया जिसके परिणामस्वरूप भगवान् शिव उनको पति रूप में पुनः मिले।

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