Kshar, Akshar Aur Purushottm Ka Vishay /पुरुषोत्तम का विषय

Kshar, Akshar Aur Purushottm Ka Vishay
क्षर, अक्षर और पुरुषोत्तम का विषय

Kshar, Akshar Aur Purushottm Ka Vishay, क्षर, अक्षर और पुरुषोत्तम का विषय- जीव दो प्रकार के हैं — च्युत तथा अच्युत। भौतिक जगत् में प्रत्येक जीव च्युत ( क्षर ) होता है और आध्यात्मिक जगत् में प्रत्येक जीव अच्युत ( अक्षर ) कहलाता है। इन दोनों के अतिरिक्त, एक परम पुरुष परमात्मा है, जो साक्षात् अविनाशी भगवान् है और जो तीनों लोकों में प्रवेश करके उनका पालन कर रहा है। चूँकि मैं क्षर तथा अक्षर दोनों के परे हूँ और चूँकि मैं सर्वश्रेष्ठ हूँ, अतएव मैं इस जगत् में तथा वेदों में परम पुरुष के रूप में विख्यात हूँ ।

श्लोक 16 से 20

द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च ।
क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते ।। 16 ।।

द्वौ — दो ; इमौ — ये ; पुरुषौ — जीव ; लोके — संसार में ; क्षरः — च्युत ; च — तथा ; अक्षरः — अच्युत ; एव — निश्चय ही ; च — तथा ; क्षरः — च्युत ; सर्वाणि — समस्त ; भूतानि — जीवों को ; कूट-स्थः — एकत्व में ; अक्षरः — अच्युत ; उच्यते — कहा जाता है ।

तात्पर्य — जीव दो प्रकार के हैं — च्युत तथा अच्युत। भौतिक जगत् में प्रत्येक जीव च्युत ( क्षर ) होता है और आध्यात्मिक जगत् में प्रत्येक जीव अच्युत ( अक्षर ) कहलाता है ।

उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः
यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः ।। 17 ।।

उत्तमः — श्रेष्ठ ; पुरुषः — व्यक्ति, पुरुष ; तु — लेकिन ; अन्यः — अन्य ; परम — परम ; आत्मा — आत्मा ; इति — इस प्रकार ; उदाहृतः — कहा जाता है ; यः — जो ; लोक — ब्रह्माण्ड के ; त्रयम् — तीन विभागों में ; आविश्य — प्रवेश करके ; बिभर्ति — पालन करता है ; अव्ययः — अविनाशी ; ईश्वरः — भगवान् ।

तात्पर्य — इन दोनों के अतिरिक्त, एक परम पुरुष परमात्मा है, जो साक्षात् अविनाशी भगवान् है और जो तीनों लोकों में प्रवेश करके उनका पालन कर रहा है।

इसे भी पढ़ें :–

  1. अध्याय पन्द्रह — पुरुषोत्तम योग
  2. 7 से 11 — जीवात्मा का विषय
  3. 12 से 15 — प्रभावसहित परमेश्वर के स्वरुप

यस्मात्क्षरमतीतोऽहमक्षरादपि चोत्तमः ।
अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ।। 18 ।।

यस्मात् — चूँकि ; क्षरम् — च्युत ; अतीतः — दिव्य ; अहम् — मैं हूँ ; अक्षरात् — अक्षर से परे ; अपि — भी ; च — तथा ; उत्तमः — सर्वश्रेष्ठ ; अतः — अतएव ; अस्मि — मैं हूँ ; लोके — संसार में ; वेदे — वैदिक साहित्य में ; च — तथा ; प्रथितः — विख्यात ; पुरुष-उत्तमः — परम पुरुष के रुप में ।

तात्पर्य — चूँकि मैं क्षर तथा अक्षर दोनों के परे हूँ और चूँकि मैं सर्वश्रेष्ठ हूँ, अतएव मैं इस जगत् में तथा वेदों में परम पुरुष के रूप में विख्यात हूँ ।

यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम् ।
स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत ।। 19 ।।

यः — जो ; माम् — मुझको ; एवम् — इस प्रकार ; असम्मूढः — संशयरहित ; जानाति — जानता है ; पुरुष-उत्तमम् — भगवान् ; सः — वह ; सर्व-वित् — सब कुछ जानने वाला ; भजति — भक्ति करता है ; माम् — मुझको ; सर्व-भावेन — सभी प्रकार से ; भारत — हे भरतपुत्र ।

तात्पर्य — जो कोई भी मुझे संशयरहित होकर पुरुषोत्तम भगवान् के रूप में जानता है, वह सब कुछ जानने वाला है। अतएव हे भरतपुत्र ! वह व्यक्ति मेरी पूर्ण भक्ति में रत होता है ।

इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ
एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत ।। 20 ।।

इति — इस प्रकार ; गुह्य-तमम् — सर्वाधिक गुप्त ; शास्त्रम् — शास्त्र ; इदम् — यह ; उक्तम् — प्रकट किया गया ; मया — मेरे द्वारा ; अनघ — हे पापरहित ; एतत् — यह ; बुद्ध्वा — समझ कर ; बुद्धि-मान् — बुद्धिमान ; स्यात् — हो जाता है ; कृत-कृत्यः — अपने प्रयत्नों में परम पूर्ण ; च — तथा ; भारत — हे भरतपुत्र ।

तात्पर्य — हे अनघ ! यह वैदिक शास्त्रों का सर्वाधिक गुप्त अंश है, जिसे मैंने अब प्रकट किया है। जो कोई इसे समझता है, वह बुद्धिमान हो जाएगा और उसके प्रयास पूर्ण होंगे ।

आगे के श्लोक :–

इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीता के पन्द्रहवें अध्याय ” पुरुषोत्तम योग ” का भक्तिवेदान्त तात्पर्य पूर्ण हुआ।

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