Kushotpatni Amavasya Vrat Katha / कुशोत्पाटनी अमावस्या व्रत कथा

Kushotpatni Amavasya Vrat Katha
कुशोत्पाटनी अमावस्या व्रत कथा


Kushotpatani Amavasya Vrat Katha Aur Puja Vidhi, कुशोत्पाटनी अमावस्या व्रत कथा और पूजा विधि :- भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अमावस्या को कुशोत्पाटनी अमावस कहा जाता है। इस दिन पुरोहित वर्ग वर्ष भर कर्मकाण्डादि कराने के लिए नदी-घाटियों से कुशा नामक घास उखाड़ कर घर लाते हैं। यह कुश बड़ा पवित्र होता है। मान्यता है कि धार्मिक कार्यों, श्राद्ध कर्म आदि में इस्तेमाल की जाने वाली घास यदि इस दिन एकत्रित की जाए तो वह वर्ष भर तक पुण्य फलदायी होती है।

कुशोत्पाटनी अमावस्या पूजा विधि :-

शास्त्रों में कहा गया है कि

पूजाकाले सर्वदैव कुशहस्तो भवेच्छुचिः ।
कुशेन रहिता पूजा विफला कथिता मया ।।

किसी भी पूजन में इसलिए ही ब्राह्मण, यजमान कोअनामिका उंगली में कुश की बनी पवित्री पहनाते हैं। शास्त्र में 10 प्रकार का कुशों का वर्णन है। इनमें जो मिल सके, उसी को ग्रहण करें।

कुशाः काशा यवा दूर्वाउशीराश्च सकुन्दकाः ।
गोधूमा ब्राह्मयो मौञ्जा दशदर्भाः सबल्वजाः ।।

दस प्रकार का कुश बतलाया है। इनमें जो मिले उसी को ग्रहण कर लें। जिस कुशा का मूल सुतीक्ष्ण हो, अग्रभाग कटा न हो और हरा हो, वह ही देव और पितृ दोनों कार्यों के लिए योग्य माना जाता है। इसके लिए अमावस्या को दर्भस्थल में जाएँ। फिर पूर्व या उत्तर मुख बैठे। कुश उखाड़ने के पूर्व प्रार्थना करें —

कुशाग्रे वसते रुद्रः कुश मध्ये तु केशवः ।
कुशमूले वसेद् ब्रह्मा कुशान मे देही मेदिनी ।।

विरञ्चिना सहोत्पन्न परमेष्ठिन्निसर्गज ।
नुद सर्वाणि पापानि दर्भ स्वस्तिकरो भव ।।

ॐ हूँ फट् मन्त्र का उच्चारण करते कुशा दाहिने हाथ से उखाड़े। पूजन में इस कुश का प्रयोग वर्ष पर्यन्त विहित होता है।

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