Lakshmi Stotram / लक्ष्मी स्तोत्रम्

Lakshmi Stotram
लक्ष्मी स्तोत्रम्

Lakshmi Stotram, लक्ष्मी स्तोत्रम् :- देवराज इन्द्र बोले – भगवती कमलवासिनी को नमस्कार है। देवी नारायणी को बार-बार नमस्कार है। संसार की सारभूता कृष्णप्रिया भगवती पद्मा को अनेकशः नमस्कार है। भगवान् श्रीहरि में भक्ति उत्पन्न करने वाली तथा हर्ष प्रदान करने में परम कुशल देवी को बार-बार नमस्कार है। भगवान् श्रीकृष्ण के वक्षःस्थल पर विराजमान एवं उनकी हृदयेश्वरी देवी को बारम्बार प्रणाम है। रत्नपद्मे ! शोभने ! तुम श्रीकृष्ण की शोभा स्वरूपा हो, सम्पूर्ण सम्पत्ति की अधिष्ठात्री देवी एवं महादेवी हो; तुम्हें मैं बार-बार प्रणाम करता हूँ।

इन्द्र उवाच
ॐ नमः कमलवासिन्यै नारायण्यै नमो नमः ।
कृष्णप्रियायै सारायै पद्मायै च नमो नमः ।। 1 ।।

अर्थात् :- देवराज इन्द्र बोले – भगवती कमलवासिनी को नमस्कार है। देवी नारायणी को बार-बार नमस्कार है। संसार की सारभूता कृष्णप्रिया भगवती पद्मा को अनेकशः नमस्कार है।

पद्मपत्रेक्षणायै च पद्मास्यायै नमो नमः ।
पद्मासनायै पद्मिन्यै वैष्णव्यै च नमो नमः ।। 2 ।।

अर्थात् :- कमलरत्न के समान नेत्रवाली कमलमुखी भगवती महालक्ष्मी को नमस्कार है। पद्मासना, पद्मिनी और वैष्णवी नाम से प्रसिद्ध भगवती महालक्ष्मी को बार-बार नमस्कार है।

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सर्वसम्पत्स्वरूपायै सर्वदात्र्यै नमो नमः ।
सुखदायै मोक्षदायै सिद्धिदायै नमो नमः ।। 3 ।।

अर्थात् :- सर्वसम्पत्स्वरूपिणी सर्वदात्री देवी को नमस्कार है। सुखदायिनी, मोक्षदायिनी और सिद्धिदायिनी देवी को बारम्बार नमस्कार है।

हरिभक्तिप्रदात्र्यै च हर्षदात्र्यै नमो नमः ।
कृष्णवक्षःस्थितायै च कृष्णेशायै नमो नमः ।। 4 ।।

अर्थात् :- भगवान् श्रीहरि में भक्ति उत्पन्न करने वाली तथा हर्ष प्रदान करने में परम कुशल देवी को बार-बार नमस्कार है। भगवान् श्रीकृष्ण के वक्षःस्थल पर विराजमान एवं उनकी हृदयेश्वरी देवी को बारम्बार प्रणाम है।

कृष्णशोभास्वरूपायै रत्नपद्मे च शोभने ।
सम्पत्त्यधिष्ठातृदेव्यै महादेव्यै नमो नमः ।। 5 ।।

अर्थात् :- रत्नपद्मे ! शोभने ! तुम श्रीकृष्ण की शोभा स्वरूपा हो, सम्पूर्ण सम्पत्ति की अधिष्ठात्री देवी एवं महादेवी हो; तुम्हें मैं बार-बार प्रणाम करता हूँ।

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शस्याधिष्ठातृदेव्यै च शस्यायै च नमो नमः ।
नमो बुद्धिस्वरुपायै बुद्धिदायै नमो नमः ।। 6 ।।

अर्थात् :- शस्य की अधिष्ठात्री देवी एवं शस्यस्वरूपा हो, तुम्हें बारम्बार नमस्कार है। बुद्धि स्वरूपा एवं बुद्धिप्रदा भगवती के लिये अनेकशः प्रणाम है।

वैकुण्ठे या महालक्ष्मीर्लक्ष्मीः क्षीरोदसागरे ।
स्वर्गलक्ष्मीरिन्द्रगेहे राजलक्ष्मीर्नृपालये ।। 7 ।।
गृहलक्ष्मीश्च गृहिणां गेहे च गृहदेवता ।
सुरभी सा गवां माता दक्षिणा यज्ञकामिनी ।। 8 ।।

अर्थात् :- देवि ! तुम वैकुण्ठ में महालक्ष्मी, क्षीरसमुद्र में लक्ष्मी, राजाओं के भवन में राजलक्ष्मी, इन्द्र के स्वर्ग में स्वर्गलक्ष्मी, गृहस्थों के घर में गृहलक्ष्मी, प्रत्येक घर में गृहदेवता, गोमाता सुरभि और यज्ञ की पत्नी दक्षिणा के रूप में विराजमान रहती हो।

अदितिर्देवमाता त्वं कमला कमलालये ।
स्वाहा त्वं च हविर्दाने कव्यदाने स्वधा स्मृता ।। 9 ।।

अर्थात् :- तुम देवताओं की माता अदिति हो। कमलालयवासिनी कमला भी तुम्हीं हो। हव्य प्रदान करते समय ‘स्वाहा’ और कव्य प्रदान करने के अवसर पर ‘स्वधा’ का जो उच्चारण होता है, वह तुम्हारा ही नाम है।

त्वं हि विष्णुस्वरूपा च सर्वाधारा वसुन्धरा ।
शुद्धसत्त्वस्वरूपा त्वं नारायणपरायणा ।। 10 ।।

अर्थात् :- सबको धारण करने वाली विष्णु स्वरूपा पृथ्वी तुम्हीं हो। भगवान् नारायण की उपासना में सदा तत्पर रहनेवाली देवि ! तुम शुद्ध सत्त्वस्वरूपा हो।

क्रोधहिंसावर्जिता च वरदा च शुभानना ।
परमार्थप्रदा त्वं च हरिदास्यप्रदा परा ।। 11 ।।

अर्थात् :- तुम में क्रोध और हिंसा के लिये किंचिन्मात्र भी स्थान नहीं है। तुम्हें वरदा, शारदा, शुभा, परमार्थदा एवं हरिदास्यप्रदा कहते हैं।

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