Manorath Siddhiprad Ganesh Stotra / मनोरथ सिद्धिप्रद गणेश

Manorath Siddhiprad Ganesh Stotram
मनोरथ सिद्धिप्रद गणेश स्तोत्रम्


स्कन्द उवाच

नमस्ते योगरूपाय सम्प्रज्ञातशरीरिणे ।
असम्प्रज्ञातमूर्ध्ने ते तयोर्योगमयाय च ।। 1 ।।

अर्थात् :- स्कन्द बोले – हे गणेश्वर ! सम्प्रज्ञात समाधि आपका शरीर तथा असम्प्रज्ञात समाधि आपका मस्तक है। आप दोनों के योगमय होने के कारण योग स्वरुप हैं ; आपको नमस्कार है।

वामाङ्गे  भ्रान्तिरूपा ते सिद्धिः सर्वप्रदा प्रभो।
भ्रान्तिधारकरूपा वै बुद्धिस्ते दक्षिणाङ्गके ।। 2 ।।

मायासिद्धिस्तथा देवो मायिको बुद्धिसंज्ञितः ।
तयोर्योगे गणेशान त्वं स्थितोऽसि नमोऽस्तु ते ।। 3 ।।

अर्थात् :- प्रभो ! आपके वामांग में भ्रान्ति रूपा सिद्धि विराजमान हैं, जो सब कुछ देनेवाली हैं तथा आपके दाहिने अंग में भ्रान्ति धारक रूपवाली बुद्धिदेवी स्थित हैं। भ्रान्ति अथवा माया सिद्धि है और उसे धारण करने वाले गणेश देव मायिक हैं। बुद्धि संज्ञा भी उन्हीं की है। हे गणेश्वर ! आप सिद्धि और बुद्धि-दोनों के योग में स्थित हैं ; आपको बारम्बार नमस्कार है।

जगद्रूपो गकारश्च णकारो ब्रह्मवाचकः ।
तयोर्योगे गणेशाय नाम तुभ्यं नमो नमः ।। 4 ।।

अर्थात् :- गकार जगत्स्वरूप है और णकार ब्रह्म का वाचक है। उन दोनों के योग में विद्यमान आप गणेश-देवता को बारम्बार नमस्कार है।

चतुर्विधं जगत्सर्वं ब्रह्म तत्र तदात्मकम् ।
हस्ताश्चत्वार एवं ते चतुर्भुज नमोऽस्तु ते ।। 5 ।।

अर्थात् :- जरायुज आदि भेद से चार प्रकार का जो जगत् है, वह सब ब्रह्म है। जगत् में ब्रह्म ही उसके रूप में भास रहा है। इस प्रकार चतुर्विध जगत् ही आपके चार हाथ हैं। हे चतुर्भुज ! आपको नमस्कार है।

स्वसंवेद्यं च यद्ब्रह्म तत्र खेलकरो भवान् ।
तेन स्वानन्दवासी त्वं स्वानन्दपतये नमः ।। 6 ।।

अर्थात् :- स्वसंवेद्य जो ब्रह्म है, उसमें आप खेलते या आनन्द लेते हैं ; इसीलिये आप स्वानन्दवासी हैं। आप स्वानन्दपति को नमस्कार है।

द्वन्द्वं चरसि भक्तानां तेषां हृदि समास्थितः ।
चौरवत्तेन तेऽभूद् वै मूषको वाहनं प्रभो ।। 7 ।।

अर्थात् :- हे प्रभो ! आप भक्तों के हृदय में रहकर उनके सुख-दुःख आदि द्वन्द्वों को चोर की भाँति चरते या चुराते हैं। इसीलिये मूषक ( चूहा, चुराने वाला ) आपका वाहन है।

जगति ब्रह्मणि स्थित्वा भोगान् भुङ्क्षे स्वयोगतः ।
जगद्भिर्ब्रह्मभिस्तेन चेष्टितं ज्ञायते न च ।। 8 ।।

अर्थात् :- आप जगत्-रूप ब्रह्म में स्थित रहकर भोगों को भोगते हैं, तथापि अपने योग में ही विराजते हैं, इसलिये ब्रह्म रूप जगत् आप की चेष्टा को नहीं जान पाता।

चौरवद्भोगकर्ता त्वं तेन ते वाहनं परम् ।
मूषको मूषकारूढो हेरम्बाय नमो नमः ।। 9 ।।

अर्थात् :- आप चौर की भाँति भोगकर्ता हैं, इसलिये आपका उत्कृष्ट वाहन मूषक है। आप मूषक पर आरूढ़ हैं। आप हेरम्ब को बारम्बार नमस्कार है।

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