Mauni Amavasya Vrat Katha / मौनी अमावस्या व्रत कथा और पूजा

Mauni Amavasya Vrat Katha Aur Puja Vidhi
मौनी अमावस्या व्रत कथा और पूजा विधि


Mauni Amavasya Vrat Katha Aur Puja Vidhi, मौनी अमावस्या व्रत कथा और पूजा विधि :- माघ मास अमावस्या को ही ‘ मौनी अमावस्या ‘ कहा जाता है।

मौनी अमावस्या पूजा विधि :-

इस दिन मौन रहना चाहिए। मुनि शब्द से ही मौनी की उत्पत्ति हुई है। इसलिए इस व्रत को मौन धारण करके समापन करने वाले को मुनि पद की प्राप्ति होती है।

यह दिन सृष्टि संचालक मनु का ‘ जन्म दिवस ‘ भी है। इस दिन गंगा स्नान तथा दान-दक्षिणा का विशेष महत्त्व है। ऐसी मान्यता है कि मौन रहने से आत्मबल मिलता है।

मौनी अमावस्या व्रत कथा :-

बहुत समय पहले की बात है। कांचीपुरी में देवस्वामी नाम का एक ब्राह्मण रहता था। उसके सात बेटे थे और एक बेटी गुणवती थी। पत्नी का नाम धनवती था। उसने अपने सभी बेटों का विवाह कर दिया। उसके बाद बड़े बेटे को बेटी के लिए सुयोग्य वर देखने के लिए नगर से बाहर भेजा। उसने बेटी की कुंडली एक ज्योतिषी को दिखाई। उसने कहा कि कन्या का विवाह होते ही वह विधवा हो जाएगी। यह बात सुनकर देवस्वामी दुखी हो गया।

तब ज्योतिषी ने उसे एक उपाय बताया कहा कि सिंहलद्वीप में सोमा नामक की धोबिन है। वह घर आकर पूजा करे तो कुंडली का दोष दूर हो जाएगा। यह सुनकर देवस्वामी ने बेटी के साथ सबसे छोटे बेटे को सिंहलद्वीप भेज दिया। दोनों समुद्र के किनारे पहुंचकर उसे पार करने का उपाय खोजने लगे। जब कोई उपाय नहीं मिला तो वे भूखे-प्यासे एक वट वृक्ष के नीचे आराम करने लगे।

उस पेड़ पर एक गिद्ध परिवार वास करता था। गिद्ध के बच्चों ने देखा दिनभर इन दोनों के क्रियाकलाप को देखा था। जब उन गिद्धों की माँ उनको खाना दी, तो वे भोजन नहीं किए और उस भाई बहन के बारे में बताने लगे। उनकी बातें सुनकर गिद्धों की माँ को दया आ गई। वह पेड़ के नीचे बैठे भाई बहन को भोजन दी और कहा कि वह उनकी समस्या का समाधान कर देगी। यह सुनकर दोनों ने भोजन ग्रहण किया।

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