Moh Se Vyapt Arjun / मोह से व्याप्त अर्जुन

अध्याय एक कुरुक्षेत्र के युद्धस्थल

Moh Se Vyapt Arjun Ke Kayarta
मोह से व्याप्त अर्जुन के कायरता

Moh Se Vyapt Arjun Ke Kayarta, Sneh Aur Shokyukt Vachan, मोह से व्याप्त अर्जुन के कायरता, स्नेह और शोकयुक्त वचनहे गोविन्द ! हमें राज्य, सुख अथवा इस जीवन से क्या लाभ ! क्योंकि जिन सारे लोगों के लिए हम उन्हें चाहते हैं वे ही इस युद्धभूमि में खड़े हैं। हे मधुसूदन ! जब गुरुजन, पितृगण, पुत्रगण, पितामह, मामा, ससुर, पौत्रगण, साले तथा अन्य सारे सम्बन्धी अपना-अपना धन एवं प्राण देने के लिए तत्पर हैं और मेरे समक्ष खड़े हैं तो फिर मैं इन सबको क्यों मारना चाहूँगा, भले ही वे मुझे क्यों न मार डालें ? हे जीवों के पालक ! 

श्लोक 28 से 46


अर्जुन उवाच —
दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम् ।
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिश्रुष्यति ।। 28 ।।

अर्जुनः उवाच — अर्जुन ने कहा; दृष्ट्वा — देख कर; इमम् — इन सारे; स्व-जनम् — सम्बन्धियों को; कृष्ण — हे कृष्ण; युयुत्सुम् — युद्ध की इच्छा रखने वाले; समुपस्थितम् — उपस्थित; सीदन्ति — काँप रहे हैं ; मम — मेरे; गात्राणि — शरीर के अंग; मुखम् — मुँह; च — भी; परिशुष्यति — सुख रहा है। 

तात्पर्य – अर्जुन ने कहा – हे कृष्ण ! इस प्रकार युद्ध की इच्छा रखने वाले अपने मित्रों तथा सम्बन्धियों को अपने समक्ष उपस्थित देखकर मेरे शरीर के अंग काँप रहे हैं और मेरा मुँह सूखा जा रहा है।

वेपथुश्च शरीरे मे रोमहर्षश्च जायते ।
गाण्डीवं स्त्रंसते हस्तात्त्वक्चैव परिदह्यते ।। 29 ।। 

वेपथुः — शरीर के कम्पन; च — भी; शरीरे — शरीर में ; मे — मेरे; रोम-हर्षः — रोमांच; च — भी; जायते — उत्पन्न हो रहा है; गाण्डीवम् — अर्जुन का धनुष, गाण्डीव; स्रंसते — छूट या सरक रहा  है; हस्तात् — हाथ से; त्वक् — त्वचा; च — भी; एव — निश्चय ही; परिदह्यते — जल रही है।   

तात्पर्य – मेरा सारा शरीर काँप रहा है, मेरे रोंगटे खड़े हो रहे हैं, मेरा गाण्डीव धनुष मेरे हाथ से सरक रहा है और मेरी त्वचा जल रही है।

न च शक्नोम्यवस्थातुं भ्रमतीव च मे मनः ।
निमित्तानि च पश्यामि विपरीतानि केशव ।। 30 ।।

न — नहीं ; च — भी; शक्नोमि — समर्थ हूँ ; अवस्थातुम् — खड़े होने में ; भ्रमति — भूलता हुआ; इव — सदृश; च — तथा; मे — मेरा; मनः — मन; निमित्तानि — कारण; च — भी; पश्यामि — देखता हूँ ; विपरीतानि — बिल्कुल उल्टा; केशव — हे केशी असुर के मारने वाले ( कृष्ण )।     

तात्पर्य – मैं यहाँ अब और अधिक खड़ा रहने में असमर्थ हूँ। मैं अपने को भूल रहा हूँ और मेरा सिर चक्रा रहा है। हे कृष्ण ! मुझे तो केवल अमंगल के कारण दिख रहे हैं।

न च श्रेयोऽनुपश्यामि हत्वा स्वजनमाहवे।
न काड्क्षे विजयं कृष्ण न च राज्यं सुखानि च ।। 31 ।।

न — न तो ; च — भी; श्रेयः — कल्याण; अनुपश्यामि — पहले से देख रहा हूँ ; हत्वा — मार कर; स्व-जनम् — अपने सम्बन्धियों को; आहवे — युद्ध में ; न — न तो; काङ्क्षे — आकांक्षा करता हूँ ; विजयम् — विजय; कृष्ण — हे कृष्ण; न — न तो; च — भी; राज्यम् — राज्य; सुखानि — उसका सुख; च — भी।  

तात्पर्य – हे कृष्ण ! इस युद्ध में अपने ही स्वजनों का वध करने से न तो मुझे कोई अच्छाई  दिखती है और न, मैं उससे किसी प्रकार की विजय, राज्य या सुख की इच्छा रखता हूँ।

इसे भी पढ़ें — 

  1. 1 से 11 – दोनों सेनाओं शूरवीरों की गणना
  2. 12 से 19 – दोनों सेनाओं की शंख-ध्वनि
  3. 20 से 27 – अर्जुन द्वारा सेना निरिक्षण  

किं नो राज्येन गोविन्द किं भोगैर्जीवितेन वा ।
येषामर्थे काङक्षितं नो राज्यं भोगाः सुखानि च ।। 32 ।।

त इमेऽवस्थिता युद्धे प्राणांस्त्यक्त्वा धनानि च
आचार्याः पितरः पुत्रास्तथैव च पितामहाः ।। 33 ।।

मातुला श्वश्रुराः पौत्राः श्यालाः सम्बन्धिनस्तथा ।
एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन ।। 34।।

अपि त्रैलोक्यराज्यस्य हेतोः किं नु महीकृते ।
निहत्य धार्तराष्ट्रान्नः का प्रीतिः स्याज्जनार्दन ।। 35 ।।

किम् — क्या लाभ; नः — हमको; राज्येन — राज्य से; गोविन्द — हे कृष्ण; किम् — क्या; भोगैः — भोग से; जीवितेन — जीवित रहने से; वा — अथवा; येषाम् — जिनके; अर्थे — लिए; काङ्क्षितम् — इच्छित है; नः — हमारे द्वारा; राज्यम् — राज्य; भोगाः — भौतिक भोग; सुखानि — समस्त सुख; च — भी; ते — वे; इमे — ये; अवस्थिताः — स्थित; युद्धे — युद्धभूमि में ; प्राणान् — जीवन को; त्यक्त्वा — त्याग कर; धनानि — धन को; च — भी; आचार्याः — गुरुजन; पितरः — पितृगण; पुत्राः — पुत्रगण; तथा — और; एव — निश्चय ही; च — भी; पितामहाः — पितामह ; मातुलाः — मामा लोग; श्वश्रुरा — श्वसुर; पौत्राः — पौत्र; श्यालाः — साले; सम्बन्धिनः — सम्बन्धी; तथा — तथा; एतान् — ये सब; न — कभी नहीं ; हन्तुम् — मारना; इच्छामि — चाहता हूँ ; घ्नतः — मारे जाने पर; अपि — भी; मधुसूदन — हे मधु असुर के मारने वाले ( कृष्ण ) ; अपि — तो भी; त्रै-लोक्य — तीनों लोकों के; राज्यस्य — राज्य  के; हेतोः — विनिमय में ; किम् नु — क्या कहा जाय ; मही-कृते — पृथ्वी के लिए; निहत्य — मारकर; धार्तराष्ट्रान् — धृतराष्ट्र के पुत्रों को; न — हमारी ; का — क्या; प्रीतिः — प्रसन्नता; स्यात् — होगी; जनार्दन — हे जीवों के पालक।   

तात्पर्य – हे गोविन्द ! हमें राज्य, सुख अथवा इस जीवन से क्या लाभ ! क्योंकि जिन सारे लोगों के लिए हम उन्हें चाहते हैं वे ही इस युद्धभूमि में खड़े हैं। हे मधुसूदन ! जब गुरुजन, पितृगण, पुत्रगण, पितामह, मामा, ससुर, पौत्रगण, साले तथा अन्य सारे सम्बन्धी अपना-अपना धन एवं प्राण देने के लिए तत्पर हैं और मेरे समक्ष खड़े हैं तो फिर मैं इन सबको क्यों मारना चाहूँगा, भले ही वे मुझे क्यों न मार डालें ? हे जीवों के पालक ! मैं इन सबों से लड़ने को तैयार नहीं, भले ही बदले में मुझे तीनों लोक क्यों न मिलते हों, इस पृथ्वी की तो बात ही छोड़ दें। भला धृतराष्ट्र के पुत्रों को मारकर हमें कौन सी प्रसन्नता मिलेगी ?

पापमेवाश्रयेदस्मान्हत्वैतानाततायिनः ।
तस्मान्नार्हा वयं हन्तुं धार्तराष्ट्रान्सबान्धवान् ।
स्वजनं हि कथं हत्वा सुखिनः स्याम माधव ।। 36 ।।

पापम् — पाप; एव — निश्चय ही; आश्रयेत् — लगेगा; अस्मान् — हमको; हत्वा — मारकर; एतान् — इन सब; आततायिनः — आततायियों को; तस्मात् — अतः ; न — कभी नहीं ; अर्हाः — योग्य; वयम् — हम; हन्तुम् — मारने के लिए; धार्तराष्ट्रान् — धृतराष्ट्र के पुत्रों को; स-बान्धवान् — उनके मित्रों सहित; स्व-जनम् — कुटुम्बियों को; हि — निश्चय ही; कथम् — कैसे; हत्वा — मारकर; सुखिनः — सुखी; स्याम — हम होंगे ; माधव — हे लक्ष्मीपति कृष्ण।  

तात्पर्य – यदि हम ऐसे आततायियों का वध करते हैं तो हम पर पाप चढ़ेगा, अतः यह उचित नहीं होगा की हम धृतराष्ट्र के पुत्रों तथा उनके मित्रों का वध करें।  हे लक्ष्मीपति कृष्ण ! इससे हमें क्या लाभ होगा ? और अपने ही कुटुम्बियों को मार कर हम किसी प्रकार सुखी हो सकते हैं ?

और पढ़ें

अध्याय एक कुरुक्षेत्र के युद्धस्थल

Leave a Comment

error: Content is protected !!