Muni Vasishth Ka Bharatji Ko Bulane / मुनि वसिष्ठ का भरतजी

श्रीरामचरितमानस अयोध्या काण्ड

Muni Vasishth Ka Bharatji Ko Bulane Ke Liye Dut Bhejna
मुनि वसिष्ठ का भरतजी को बुलाने के लिये दूत भेजना

Muni Vasishth Ka Bharatji Ko Bulane Ke Liye Dut Bhejna, मुनि वसिष्ठ का भरतजी को बुलाने के लिये दूत भेजना :- जी ने और मरने का फल तो दशरथजी ने ही पाया, जिनका निर्मल यश अनेकों ब्रह्माण्डों में छा गया। जीते-जी तो श्रीरामचन्द्रजी के चन्द्रमा के समान मुख को देखा और श्रीराम के विरह को निमित्त बनाकर अपना मरण सुधार लिया। वसिष्ठजी ने नाव में तेल भरवाकर राजा के शरीर को उसमें रखवा दिया। फिर दूतों को बुलवाकर उनसे ऐसा कहा – तुमलोग जल्दी दौड़कर भरत के पास जाओ। राजा की मृत्यु का समाचार कहीं किसी से न कहना। जाकर भरत से इतना ही कहना कि दोनों भाइयों को गुरूजी ने बुलावा भेजा है। मुनि की आज्ञा सुनकर धावन ( दूत ) दौड़े। वे अपने वेग से उत्तम घोड़ों को भी लजाते हुए चले।


जिअन मरन फलु दसरथ पावा। अंड अनेक अमल जसु छावा ।।

जिअत राम बिधु बदनु निहारा। राम बिरह करि मरनु सँवारा ।।

अर्थात् :- जी ने और मरने का फल तो दशरथजी ने ही पाया, जिनका निर्मल यश अनेकों ब्रह्माण्डों में छा गया। जीते-जी तो श्रीरामचन्द्रजी के चन्द्रमा के समान मुख को देखा और श्रीराम के विरह को निमित्त बनाकर अपना मरण सुधार लिया।

सोक बिकल सब रोवहिं रानी। रूपु सीलु बलु तेजु बखानी ।।
करहिं बिलाप अनेक प्रकारा। परहिं भूमितल बारहिं बारा ।।

अर्थात् :- सब रानियाँ शोक के मारे व्याकुल होकर रो रही है। वे राजा के रूप, शील, बल और तेज का बखान कर-करके अनेकों प्रकार से विलाप कर रही हैं और बार-बार धरती पर गिर-गिर पड़ती है।

बिलपहिं बिकल दास अरु दासी। घर घर रुदनु करहिं पुरबासी ।।
अँथयउ आजु भानुकुल भानू। धरम अवधि गुन रूप निधानू ।।

अर्थात् :- दास-दासीगण व्याकुल होकर विलाप कर रहे हैं और नगरनिवासी घर-घर रो रहे हैं। कहते हैं कि आज धर्म की सीमा, गुण और रूप के भण्डार सूर्यकुल के सूर्य अस्त हो गये !

गारीं सकल कैकइहि देहीं। नयन बिहीन कीन्ह जग जेहीं ।।
एहि बिधि बिलपत रैनि बिहानी। आए सकल महामुनि ग्यानी ।।

अर्थात् :- सब कैकेयी जी को गालियाँ देते हैं, जिसने संसार भर को बिना नेत्र का ( अंधा ) कर दिया ! इस प्रकार विलाप करते रात बीत गयी। प्रातःकाल सब बड़े-बड़े ज्ञानी मुनि आये।

दो० — तब बसिष्ठ मुनि समय कहि अनेक इतिहास ।
सोक नेवारेउ सबहि कर निज बिग्यान प्रकास ।। 156 ।।

अर्थात् :- तब मुनि वसिष्ठजी ने समय के अनुकूल अनेक इतिहास कहकर अपने विज्ञान के प्रकाश से सबका शोक दूर किया।

तेल नावँ भरि नृप तनु राखा। दूत बोलाइ बहुरि अस भाषा ।।
धावहु बेगि भरत पहिं जाहू। नृप सुधि कतहुँ कहहु जनि काहू ।।

अर्थात् :- वसिष्ठजी ने नाव में तेल भरवाकर राजा के शरीर को उसमें रखवा दिया। फिर दूतों को बुलवाकर उनसे ऐसा कहा – तुमलोग जल्दी दौड़कर भरत के पास जाओ। राजा की मृत्यु का समाचार कहीं किसी से न कहना।

एतनेइ कहेहु भरत सन जाई। गुर बोलाइ पठयउ दोउ भाई ।।
सुनि मुनि आयसु धावन धाए। चले बेग बर बाजि लजाए ।।

अर्थात् :- जाकर भरत से इतना ही कहना कि दोनों भाइयों को गुरूजी ने बुलावा भेजा है। मुनि की आज्ञा सुनकर धावन ( दूत ) दौड़े। वे अपने वेग से उत्तम घोड़ों को भी लजाते हुए चले।

अनरथु अवध अरंभेउ जब तें। कुसगुन होहिं भरत कहुँ तब तें ।।
देखहिं राति भयानक सपना। जागि करहिं कटु कोटि कलपना ।।

अर्थात् :- जब से अयोध्या में अनर्थ प्रारम्भ हुआ, तभी से भरतजी को अपशकुन होने लगे। वे रात को भयङ्कर स्वप्न देखते थे और जागने पर [ उन स्वप्न के कारण ] करोड़ों ( अनेकों ) तरह की बुरी कल्पनाएँ किया करते थे।

बिप्र जेवाँइ देहिं दिन दाना। सिव अभिषेक करहिं बिधि नाना ।।
मागहिं हृदयँ महेस मनाई। कुसल मातु पितु परिजन भाई ।।

अर्थात् :- [ अनिष्टशान्ति के लिये ] वे प्रतिदिन ब्राह्मणों को भोजन कराकर दान देते थे। अनेकों विधियों से रुद्राभिषेक करते थे। महादेवजी को हृदय में मनाकर उनसे माता-पिता, कुटुम्बी और भाइयों का कुशल-क्षेम माँगते थे।

दो० — एहि बिधि सोचत भरत मन धावन पहुँचे आइ ।
गुर अनुसासन श्रवन सुनि चले गनेसु मनाइ ।। 157 ।।

अर्थात् :- भरतजी इस प्रकार मन में चिन्ता कर रहे थे कि दूत आ पहुँचे। गुरूजी की आज्ञा कानों से सुनते ही वे गणेशजी को मनाकर चल पड़े।

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