Narad Ram Samwad / नारद राम संवाद

श्रीरामचरितमानस अरण्यकाण्ड

Narad Ram Samwad
नारद राम संवाद

Narad Ram Samwad, नारद राम संवाद :- हे मुनि ! तुम मेरा स्वभाव जानते ही हो। क्या मैं अपने भक्तों से कभी कुछ छिपाव करता हूँ ? मुझे ऐसी कौन-सी वस्तु प्रिय लगती है, जिसे हे मुनिश्रेष्ठ ! तुम नहीं माँग सकते? श्रीरघुनाथजी को अत्यन्त प्रसन्न जानकर नारदजी फिर कोमल वाणी बोले – हे रामजी ! हे रघुनाथजी ! सुनिये, जब आपने अपनी माया को प्रेरित करके मुझे मोहित किया था। काम, क्रोध, लोभ और मद आदि मोह ( अज्ञान ) की प्रबल सेना है। इनमें मायरूपिणी ( माया की साक्षात् मूर्ति ) स्त्री तो अत्यन्त दारुण दुःख देनेवाली है। 


देखि राम अति रुचिर तलावा। मज्जनु कीन्ह परम सुख पावा ।।

देखी सुंदर तरुबर छाया। बैठे अनुज सहित रघुराया ।।

अर्थात् :- श्रीरामजी ने अत्यन्त सुन्दर तालाब देखकर स्नान किया और परम सुख पाया। एक सुन्दर उत्तम वृक्ष की छाया देखकर श्रीरघुनाथजी छोटे भाई लक्ष्मणजी सहित बैठ गये। 

तहँ पुनि सकल देव मुनि आए। अस्तुति करि निज धाम सिधाए ।।
बैठे परम प्रसन्न कृपाला। कहत अनुज सन कथा रसाला ।।

अर्थात् :- फिर वहाँ सब देवता और मुनि आये और स्तुति करके अपने-अपने धाम को चले गये। कृपालु श्रीरामजी परम प्रसन्न बैठे हुए छोटे भाई लक्ष्मणजी से रसीली कथाएँ कह रहे हैं। 

बिरहवंत भगवंतहि देखी। नारद मन भा सोच बिसेषी ।।
मोर साप करि अंगीकारा। सहत राम नाना दुख भारा ।।

अर्थात् :- भगवान् को विरह युक्त देखकर नारदजी के मन में विशेषरूप से सोच हुआ। [ उन्होंने विचार किया कि ] मेरे ही शाप को स्वीकार करके श्रीरामजी नाना प्रकार के दुःखों का भार सह रहे हैं ( दुःख उठा रहे हैं )। 

ऐसे प्रभुहि बिलोकउँ जाई। पुनि न बनिहि अस अवसरु आई ।।
यह बिचारि नारद कर बीना। गए जहाँ प्रभु सुख आसीना ।।

अर्थात् :- ऐसे ( भक्तवत्सल ) प्रभु को जाकर देखूँ। फिर ऐसा अवसर न बन आवेगा। यह विचारकर नारदजी हाथ में वीणा लिये हुए वहाँ गये, जहाँ प्रभु सुखपूर्वक बैठे हुए थे। 

गावत राम चरित मृदु बानी। प्रेम सहित बहु भाँति बखानी ।।
करत दंडवत लिए उठाई। राखे बहुत बार उर लाई ।।

अर्थात् :- वे कोमल वाणी से प्रेम के साथ बहुत प्रकार से बखान-बखानकर रामचरित का गान कर [ ते हुए चले आ ] रहे थे। दण्डवत् करते देखकर श्रीरामचन्द्रजी ने नारदजी को उठा लिया और बहुत देर तक हृदय से लगाये रखा। 

स्वागत पूँछि निकट बैठारे। लछिमन सादर चरन पखारे ।।

अर्थात् :- फिर स्वागत ( कुशल ) पूछकर पास बैठा लिया। लक्ष्मणजी ने आदर के साथ उनके चरण धोये। 

दो० — नाना बिधि बिनती करि प्रभु प्रसन्न जियँ जानि ।
नारद बोले बचन तब जोरि सरोरुह पानि ।। 41 ।।

अर्थात् :- बहुत प्रकार से विनती करके और प्रभु को मन में प्रसन्न जानकर तब नारदजी ने कमल के समान हाथों को जोड़कर वचन बोले। –

सुनहु उदार सहज रघुनायक। सुंदर अगम सुगम बर दायक ।।
देहु एक बर मागउँ स्वामी। जद्यपि जानत अंतरजामी ।।

अर्थात् :- हे स्वभाव से ही उदार श्रीरघुनाथजी ! सुनिये। आप सुन्दर अगम और सुगम वर के भक्तों से कभी कुछ छिपाव करता हूँ ? मुझे कौन-सी वस्तु प्रिय लगती है, जिसे हे मुनिश्रेष्ठ ! तुम नहीं माँग सकते ?

जानहु मुनि तुम्ह मोर सुभाऊ। जन सन कबहुँ कि करउँ दुराऊ ।।
कवन बस्तु असि प्रिय मोहि लागी। जो मुनिबर न सकहु तुम्ह मागी ।।

अर्थात् :-  [ श्रीरामजी ने कहा – ] हे मुनि ! तुम मेरा स्वभाव जानते ही हो। क्या मैं अपने भक्तों से कभी कुछ छिपाव करता हूँ ? मुझे ऐसी कौन-सी वस्तु प्रिय लगती है, जिसे हे मुनिश्रेष्ठ ! तुम नहीं माँग सकते ? 

जन कहुँ कछु अदेय नहिं मोरें। अस बिस्वास तजहु जनि भोरें ।।
तब नारद बोले हरषाई। अस बर मागउँ करउँ ढिठाई ।।

अर्थात् :-  मुझे भक्त के लिये कुछ भी अदेय नहीं है। ऐसा विश्वास भूलकर भी मत छोड़ो। तब नारदजी हर्षित होकर बोले – मैं ऐसा वर माँगता हूँ, यह धृष्टता करता हूँ। –

जद्यपि प्रभु के नाम अनेका। श्रुति कह अधिक एक तें एका ।।
राम सकल नामन्ह ते अधिका। होउ नाथ अघ खग गन बधिका ।।

अर्थात् :-  यद्यपि प्रभु के अनेकों नाम हैं और वेद कहते हैं कि वे सब एक-से-एक बढ़कर हैं, तो भी हे नाथ ! रामनाम सब नामों से बढ़कर हो और पापरूपी पक्षियों के समूह के लिये यह वधिक के समान हो।

दो० — राका रजनी भगति तव राम नाम सोइ सोम ।
अपर नाम उडगन बिमल बसहुँ भगत उर ब्योम ।। 42 ( क ) ।।

अर्थात् :- आपकी भक्ति पूर्णिमा की रात्रि है ; उसमें ‘ राम ‘ नाम यही पूर्ण चन्द्रमा होकर और अन्य सब नाम तारागण होकर भक्तों के हृदय रूपी निर्मल आकाश में निवास करें।

एवमस्तु मुनि सन कहेउ कृपासिंधु रघुनाथ ।
तब नारद मन हरष अति प्रभु पद नायउ माथ ।। 42 ( ख ) ।।

अर्थात् :- कृपासागर श्रीरघुनाथजी ने मुनि से ‘ एवमस्तु ‘ ( ऐसा ही हो ) कहा। तब नारदजी ने मन में अत्यन्त हर्षित होकर प्रभु के चरणों में मस्तक नवाया। 

अति प्रसन्न रघुनाथहि जानी। पुनि नारद बोले मृदु बानी ।।
राम जबहिं प्रेरेउ निज माया। मोहेहु मोहि सुनहु रघुराया ।।

अर्थात् :- श्रीरघुनाथजी को अत्यन्त प्रसन्न जानकर नारदजी फिर कोमल वाणी बोले – हे रामजी ! हे रघुनाथजी ! सुनिये, जब आपने अपनी माया को प्रेरित करके मुझे मोहित किया था। 

तब बिबाह मैं चाहउँ कीन्हा। प्रभु केहि कारन करै न दीन्हा ।।
सुनु मुनि तोहि कहउँ सहरोसा। भजहिं जे मोहि तजि सकल भरोसा ।।

अर्थात् :- तब मैं विवाह करना चाहता था। हे प्रभु ! आपने मुझे किस कारण विवाह नहीं करने दिया ? [ प्रभु बोले – ] हे मुनि ! सुनो, मैं तुम्हें हर्ष के साथ कहता हूँ कि जो समस्त आशा-भरोसा छोड़कर केवल मुझे भजते हैं,। 

करउँ सदा तिन्ह कै रखवारी। जिमि बालक राखइ महतारी ।।
गह सिसु बच्छ अनल अहि धाई। तहँ राखइ जननी अरगाई ।।

अर्थात् :- मैं सदा उनकी वैसे ही रखवाली करता हूँ जैसे माता बालक की रक्षा करती है। छोटा बच्चा जब दौड़कर आग और साँप को पकड़ने जाता है, तो वहाँ माता उसे [ अपने हाथों ] अलग करके बचा लेती है। 

प्रौढ़ भएँ तेहि सुत पर माता। प्रीति करइ नहिं पाछिलि बाता ।।
मोरें प्रौढ़ तनय सम ग्यानी। बालक सुत सम दास अमानी ।।

अर्थात् :- सयाना हो जाने पर उस पुत्र पर माता प्रेम तो करती है, परन्तु पिछली बात नहीं रहती ( अर्थात् मातृपरायण शिशु की तरह फिर उसको बचाने की चिन्ता नहीं करती, क्योंकि वह माता पर निर्भर न कर अपनी रक्षा आप करने लगता है )। ज्ञानी मेरे प्रौढ़ ( सयाने ) पुत्र के समान है और [ तुम्हारे-जैसा ] अपने बल का मान न करने वाला सेवक मेरे शिशु पुत्र के समान है। 

जनहि मोर बल निज बल ताही। दुहु कहँ काम क्रोध रिपु आही ।।
यह बिचारि पंडित मोहि भजहीं। पाएहुँ ग्यान भगति नहिं तजहीं ।।

अर्थात् :- मेरे सेवक को केवल मेरा ही बल रहता है और उसे ( ज्ञानी को ) अपना बल होता है। पर काम-क्रोध रूपी शत्रु दोनों के लिये हैं। [ भक्त के शत्रुओं को मारने की जिम्मेवारी मुझ पर रहती है, क्योंकि वह मेरे परायण होकर मेरा ही बल मानता है ; परन्तु अपने बल को माननेवाले ज्ञानी के शत्रुओं का नाश करने की जिम्मेवारी मुझ पर नहीं है। ] ऐसा विचारकर पण्डितजन ( बुद्धिमान् लोग ) मुझको ही भजते हैं। वे ज्ञान प्राप्त होने पर भी भक्ति नहीं छोड़ते। 

दो० — काम क्रोध लोभादि मद प्रबल मोह कै धारि ।
तिन्ह महँ अति दारुन दुखद मायारूपी नारि ।। 43 ।।

अर्थात् :- काम, क्रोध, लोभ और मद आदि मोह ( अज्ञान ) की प्रबल सेना है। इनमें मायरूपिणी ( माया की साक्षात् मूर्ति ) स्त्री तो अत्यन्त दारुण दुःख देनेवाली है।

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