Navratri Stuti / नवरात्रि स्तुति

Navratri Stuti
नवरात्रि स्तुति


मंगल की सेवा सुन मेरी देवा हाथ जोड़ कर तेरे द्वार खड़े ।

पान सुपारी ध्वजा नारियल ले ज्वाला तेरे भेंट धरे ।।

सुन जगदम्बे कर न विलम्बे सन्तन की भण्डार भरे ।
सन्तन प्रतिपाली सदा कुशाली जय काली कल्याण करे ।।

बुद्धि विधाता तू जगमाता मेरा कारज सिद्ध करे ।
चरण कमल का लिया आसरा शरण तुम्हारी आन परे ।।

जब-जब भीड़ पड़ी भक्तन पर तब-तब आय सहाय करे ।
सन्तन सुखदाई सदा सहाई सन्त खड़े जयकार करे ।। 1 ।।

बार-बार तैं सब जग मोह्यो तरुणी रूप अनूप धरे ।
माता होकर पुत्र खिलावें कहीं भार्या भोग करे ।।
सन्तन सुखदाई सदा सहाई सन्त खड़े जयकार करे ।। 2 ।।

ब्रह्मा विष्णु महेश सहसफन लिये भेंट तेरे द्वार खड़े ।
अटल सिंहासन बैठी माता सिर सोने का छत्र फिरे ।। सन्तन० ।।

बार शनीचर कुंकुम वरणी जब लौं कंठ पर हुकुम करे ।
खड्ग खप्पर त्रिशूल हाथ लिये रक्तबीज को भस्म करे ।।
शुम्भ निशुम्भ को क्षण में मारे महिषासुर को पकड़ दले ।। सन्तन० ।।

आदितवार आदि को बीरा जन अपने को कष्ट हरे ।
कोप होयकर दानव मारे चण्ड मुण्ड सब चूर करे ।।
जब तुम देखो या रूप होय पल में संकट दूर करे ।। सन्तन० ।।

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