Nishad Ki Shanka Aur Savdhani / निषाद की शंका और सावधानी

श्रीरामचरितमानस अयोध्याकाण्ड

Nishad Ki Shanka Aur Savdhani
निषाद की शंका और सावधानी

Nishad Ki Shanka Aur Savdhani, निषाद की शंका और सावधानी :- निषादराज को जोहार कर-करके सब निषाद चले। सभी बड़े शूरवीर हैं और संग्राम में लड़ना उन्हें बहुत अच्छा लगता है। श्रीरामचन्द्रजी के चरणकमलों की जूतियों का स्मरण करके उन्होंने भाथियाँ ( छोटे-छोटे तरकस ) बाँधकर धनुहियों ( छोटे-छोटे धनुषों ) पर प्रत्यञ्चा चढ़ायीं। हे नाथ ! श्रीरामचन्द्रजी के प्रताप से और आपके बल से हमलोग भरत की सेना को बिना वीर और बिना घोड़े की आकर देंगे ( एक-एक वीर और एक-एक घोड़े को मार डालेंगे )। जीते-जी पीछे पाँव न रखेंगे। पृथ्वी को रुण्ड-मुण्डमयी कर देंगे ( सिरों और धड़ों से छा देंगे )।


सई तीर बसि चले बिहाने । सृंगबेरपुर सब निअराने ।।

समाचार सब सुने निषादा । हृदयँ बिचार करइ सबिषादा ।।

अर्थात् :- रातभर सई नदी के तीर पर निवास करके सवेरे वहाँ से चल दिये और सब शृंगवेरपुर के समीप जा पहुँचे। निषादराज ने सब समाचार सुने, तो वह दुःखी होकर हृदय में विचार करने लगे। –

कारन कवन भरतु बन जाहीं । है कछु कपट भाउ मन माहीं ।।
जौं पै जियँ न होति कुटिलाई । तौ कत लीन्ह संग कटकाई ।।

अर्थात् :- क्या कारण है जो भरत वन को जा रहे हैं, मन में कुछ कपट-भाव अवश्य है। यदि मन में कुटिलता न होती, तो साथ में सेना क्यों ले चले हैं। 

जानहिं सानुज रामहि मारी । करउँ अकंटक राजु सुखारी ।।
भरत न राजनीती उर आनी । तब कलंकु अब जीवन हानी ।।

अर्थात् :- समझते हैं कि छोटे भाई लक्ष्मण सहित श्रीराम को मारकर सुख से निष्कण्टक राज्य करूँगा। भरत ने हृदय में राजनीति को स्थान नहीं दिया ( राजनीति का विचार नहीं किया )। तब ( पहले ) तो कलंक ही लगा था, अब तो जीवन से ही हाथ धोना पड़ेगा। 

सकल सुरासुर जुरहिं जुझारा । रामहि समर न जीतनिहारा ।।
का आचरजु भरतु अस करहीं । नहिं बिष बेलि अमिअ फल फरहीं ।।

अर्थात् :- सम्पूर्ण देवता और दैत्य जुट जायँ, तो भी श्रीरामजी को रण में जीतनेवाला कोई नहीं है। भरत जो ऐसा कर रहे हैं, इसमें आश्चर्य ही क्या है ? विष के बेले अमृतफल कभी नहीं फलती !

दो० — अस बिचारि गुहँ ग्याति सन कहेउ सजग सब होहु ।
हथवाँसहु बोरहु तरनि कीजिअ घाटारोहु ।। 189 ।।

अर्थात् :- ऐसा विचारकर गुह ( निषादराज ) ने अपनी जातिवालों से कहा कि सब लोग सावधान हो जाओ। नावों को हाथ में ( कब्जे में ) कर लो और फिर उन्हें डुबा दो तथा सब घाटों को रोक दो। 

होहु सँजोइल रोकहु घाटा । ठाटहु सकल मरै के ठाटा ।।
सनमुख लोह भरत सन लेऊँ । जिअत न सुरसरि उतरन देऊँ ।।

अर्थात् :- सुसज्जित होकर घाटों को रोक लो और सब लोग मरने के साज सजा लो ( अर्थात् भरत से लड़ कर युद्ध में मरने के लिये तैयार हो जाओ )। मैं भरत से सामने ( मैदान में ) लोहा लूँगा ( मुठभेड़ करूँगा ) और जीते-जी उन्हें गङ्गा पार न उतरने दूँगा। 

समर मरनु पुनि सुरसरि तीरा । राम काजु छनभंगु सरीरा ।।
भरत भाइ नृपु मैं जन नीचू । बड़े भाग असि पाइअ मीचू ।।

अर्थात् :- युद्ध में मरण, फिर गङ्गाजी का तट, श्रीरामजी का काम और क्षणभंगुर शरीर ( जो चाहे जब नाश हो जाय ) ; भरत श्रीरामजी के भाई और राजा ( उनके हाथ से मरना ) और मैं नीच सेवक – बड़े भाग्य से ऐसी मृत्यु मिलती है। 

स्वामि काज करिहउँ रन रारी । जस धवलिहउँ भुवन दस चारी ।।
तजउँ प्रान रघुनाथ निहोरें । दुहूँ हाथ मुद मोदक मोरें ।।

अर्थात् :- मैं स्वामी के काम के लिये रण में लड़ाई करूँगा और चौदहों लोकों को अपने यश से उज्जवल कर दूँगा। श्रीरघुनाथजी के निमित्त प्राण त्याग दूँगा। मेरे तो दोनों ही हाथों में आनन्द के लड्डू हैं ( अर्थात् जीत गया तो रामसेवक का यश प्राप्त करूँगा और मारा गया तो श्रीरामजी की नित्य सेवा प्राप्त करूँगा )। 

साधु समाज न जाकर लेखा । राम भगत महुँ जासु न रेखा ।।
जायँ जिअत जग सो महि भारू । जननी जौबन बिटप कुठारू ।।

अर्थात् :- साधुओं के समाज में जिसकी गिनती नहीं और श्रीरामजी के भक्तों में जिसका स्थान नहीं, वह जगत् में पृथ्वी का भार होकर व्यर्थ ही जीता है। वह माता के यौवन रूपी वृक्ष के काटने के लिये कुल्हाड़ मात्र है। 

दो० — बिगत बिषाद निषादपति सबहि बढ़ाइ उछाहु ।
सुमिरि राम मागेउ तुरत तरकस धनुष सनाहु ।। 190 ।।

अर्थात् :- [  इस प्रकार श्रीरामजी के लिये प्राण समर्पण का निश्चय करके ] निषादराज विषाद से रहित हो गया और सबका उत्साह बढ़ाकर तथा श्रीरामचन्द्रजी का स्मरण करके उसने तुरन्त ही तरकस, धनुष और कवच माँगा। 

बेगहु भाइहु सजहु सँजोऊ । सुनि रजाइ कदराइ न कोऊ ।।
भलेहिं नाथ सब कहहिं सहरषा । एकहिं एक बढ़ावइ करषा ।।

अर्थात् :- [ उसने कहा – ] हे भाइयो ! जल्दी करो और सब समान सजाओ। मेरी आज्ञा सुनकर कोई मन में कायरता न लावे। सब हर्ष के साथ बोल उठे – हे नाथ ! बहुत अच्छा ; और आपस में एक दूसरे को जोश बढ़ाने लगे। 

चले निषाद जोहारि जोहारी । सूर सकल रन रूचइ रारी ।।
सुमिरि राम पद पंकज पनहीं । भाथीं बाँधि चढ़ाइन्हि धनहीं ।।

अर्थात् :- निषादराज को जोहार कर-करके सब निषाद चले। सभी बड़े शूरवीर हैं और संग्राम में लड़ना उन्हें बहुत अच्छा लगता है। श्रीरामचन्द्रजी के चरणकमलों की जूतियों का स्मरण करके उन्होंने भाथियाँ ( छोटे-छोटे तरकस ) बाँधकर धनुहियों ( छोटे-छोटे धनुषों ) पर प्रत्यञ्चा चढ़ायीं।  

अँगरी पहिरि कूंड़ि सिर धरहीं । फरसा बाँस सेल सम करहीं ।।
एक कुसल अति ओड़न खाँड़े । कूदहि गगन मनहुँ छिति छाँड़े ।।

अर्थात् :- कवच पहनकर सिर पर लोहे का टोप रखते हैं और फरसे, भाले तथा बरछों को सीधा कर रहे हैं ( सुधार रहे हैं )। कोई तलवार के वार को रोकने में अत्यन्त ही कुशल हैं। वे ऐसे उमंग से भरे हैं मानो धरती छोड़कर आकाश में कूद ( उछल ) रहे हों। 

निज निज साजु समाजु बनाई । गुह राउतहि जोहारे जाई ।।
देखि सुभट सब लायक जाने । लै लै नाम सकल सनमाने ।।

अर्थात् :- अपना-अपना साज-समाज ( लड़ाई का समान और दल ) बनाकर उन्होंने जाकर निषादराज गुह को जोहर की। निषादराज ने सुन्दर योद्धाओं को देखकर, सबको सुयोग्य जाना और नाम ले-लेकर सबका सम्मान किया।  

दो० — भाइहु लावहु धोख जनि आजु काज बड़ मोहि ।
सुनि सरोष बोले सुभट बीर अधीर न होहि ।। 191 ।।

अर्थात् :- [ उसने कहा – ] हे भाइयों ! धोखा न लाना ( अर्थात् मरने से न घबराना ), आज मेरा बड़ा भारी काम है। यह सुनकर सब योद्धा बड़ी जोश के साथ बोल उठे – हे वीर ! अधीर मत हो।

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