Nishkam Bhagwat Bhakti Ki Mahima / निष्काम भगवत् भक्ति

Nishkam Bhagwat Bhakti Ki Mahima
निष्काम भगवत् भक्ति की महिमा

Nishkam Bhagwat Bhakti Ki Mahima, निष्काम भगवत् भक्ति की महिमा- हे कुन्तीपुत्र ! तुम जो कुछ करते हो, जो कुछ खाते हो, जो कुछ अर्पित करते हो या दान देते हो और जो भी तपस्या करते हो, उसे मुझे अर्पित करते हुए करो। इस तरह तुम कर्म के बन्धन तथा इसके शुभाशुभ फलों से मुक्त हो सकोगे। इस संन्यासयोग में अपने चित्त को स्थिर करके तुम मुक्त होकर मेरे पास आ सकोगे।

श्लोक 26 से 34

पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति ।
तदहं भक्तयुपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः ।। 26 ।।

पत्रम् — पत्ती; पुष्पम् — फूल; फलम् — फल; तोयम् — जल; यः — जो कोई; मे — मुझको; भक्त्या — भक्तिपूर्वक; प्रयच्छति — भेंट करता है; तत् — वह; अहम् — मैं; भक्ति-उपहृतम् —  भक्तिभाव से अर्पित; अश्नामि — स्वीकार करता हूँ; प्रयत-आत्मनः — शुद्धचेतना वाले से।

तात्पर्य — यदि कोई प्रेम तथा भक्ति के साथ मुझे पत्र, पुष्प, फल या जल प्रदान करता है, तो मैं उसे स्वीकार करता हूँ।

यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् ।
यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम् ।। 27 ।।

यत् — जो कुछ; करोषि — करते हो; यत् — जो भी; अश्नासि — खाते हो; यत् — जो कुछ; जुहोषि — अर्पित करते हो; ददासि — दान देते हो; यत् — जो भी; तपस्यामि — तप करते हो; कौन्तेय — हे कुन्तीपुत्र; तत् — वह; कुरुष्व — करो; मत् — मुझको; अर्पणम् — भेंट रूप में। 

तात्पर्य — हे कुन्तीपुत्र ! तुम जो कुछ करते हो, जो कुछ खाते हो, जो कुछ अर्पित करते हो या दान देते हो और जो भी तपस्या करते हो, उसे मुझे अर्पित करते हुए करो।

 शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे  कर्मबन्धनैः ।
सन्न्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि ।। 28 ।।

शुभ — शुभ; अशुभ — अशुभ; फलैः — फलों के द्वारा; एवम् — इस प्रकार; मोक्ष्यसे — मुक्त हो जाओगे; कर्म — कर्म के; बन्धनैः — बंधन से; सन्न्यास — संन्यास के; योग — योग से; युक्त-आत्मा — मन को स्थिर करके; विमुक्तः — मुक्त हुआ; माम् — मुझे; उपैष्यसि — प्राप्त होगे।

तात्पर्य — इस तरह तुम कर्म के बन्धन तथा इसके शुभाशुभ फलों से मुक्त हो सकोगे। इस संन्यासयोग में अपने चित्त को स्थिर करके तुम मुक्त होकर मेरे पास आ सकोगे।

समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः
ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ।। 29 ।।

समः — समभाव; अहम् — मैं; सर्व-भूतेषु — समस्त जीवों में; न — कोई नहीं; मे — मुझको; द्वेष्यः — द्वेषपूर्ण; अस्ति — है; न — न तो; प्रियः — प्रिय; ये — जो; भजन्ति — दिव्यसेवा करते हैं; तु — लेकिन; माम् — मुझको; भक्त्या — भक्ति से; मयि — मुझमें हैं ; ते — वे व्यक्ति; तेषु — उनमें; च — भी; अपि — निश्चय ही; अहम् — मैं। 

तात्पर्य — मैं न तो किसी से द्वेष करता हूँ, न ही किसी के साथ पक्षपात करता हूँ। मैं सबों के लिए समभाव हूँ। किन्तु जो भी भक्तिपूर्वक मेरी सेवा करता है, वह मेरा मित्र है, मुझमें स्थित रहता है और मैं भी उसका मित्र हूँ।

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  1. भगवद्गीता यथारूप हिंदी में
  2. अध्याय पाँच — कृष्णभावनाभावित कर्म
  3. अध्याय आठ — भगवत्प्राप्ति
  4. अध्याय दस — श्रीभगवान् का ऐश्वर्य

अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् ।
साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः ।। 30 ।।

अपि — भी; चेत् — यदि; सु-दुराचारः — अत्यन्त गर्हित कर्म करने वाला; भजते — सेवा करता है; माम् — मेरी; अनन्य-भाक् — बिना विचलित हुए; साधुः — साधु पुरुष; एव — निश्चय ही; सः — वह; मन्तव्यः — मानने योग्य; सम्यक् — पूर्णतया; व्यवसितः — संकल्प वाला; हि — निश्चय ही; सः — वह। 

तात्पर्य — यदि कोई जघन्य से जघन्य कर्म करता है, किन्तु यदि वह भक्ति में रत रहता है तो उसे साधु मानना चाहिए, क्योंकि वह अपने संकल्प में अडिग रहता है।

 क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति ।
कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति ।। 31 ।।

क्षिप्रम् — शीघ्र; भवति — बन जाता है; धर्म-आत्मा — धर्मपरायण; शश्वत्-शान्तिम् — स्थायी शान्ति को; निगच्छति — प्राप्त करता है; कौन्तेय — हे कुन्तीपुत्र; प्रतिजानीहि — घोषित कर दो; न — कभी नहीं; मे — मेरा; भक्तः — भक्त; प्रणश्यति — नष्ट होता है। 

तात्पर्य — वह तुरन्त धर्मात्मा बन  और स्थायी शान्ति को प्राप्त होता है। हे कुन्तीपुत्र ! निडर होकर घोषणा कर दो कि मेरे भक्त का कभी विनाश नहीं होता है।

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